UGC के नए नियमों पर बढ़ी सियासी गर्मी, निशिकांत दुबे बोले—सवर्णों को डरने की जरूरत नहीं
UGC के इक्विटी रेगुलेशन 2026 को लेकर सियासी बहस तेज हो गई है. BJP सांसद निशिकांत दुबे ने कहा—पीएम मोदी के रहते सवर्ण छात्रों को कोई नुकसान नहीं होगा.

UGC के नए Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026 ने देश में शिक्षा और राजनीति दोनों को एक बार फिर आमने-सामने ला दिया है. यह बहस अब सिर्फ नीति तक सीमित नहीं रही, बल्कि सोशल मीडिया के ज़रिये जाति, समानता और अधिकारों के बड़े विमर्श में बदल गई है. खास तौर पर सवर्ण समाज के कुछ वर्गों में यह आशंका जताई जा रही है कि नए नियमों से उच्च शिक्षण संस्थानों में संतुलन प्रभावित हो सकता है. इसी बीच गोड्डा से भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने खुलकर इस मुद्दे पर अपनी बात रखी है. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सवर्ण छात्रों के हितों को कोई नुकसान नहीं पहुंचने दिया जाएगा. उनका यह बयान UGC गाइडलाइंस को लेकर चल रही बहस का केंद्र बन गया है.
UGC के नए इक्विटी रेगुलेशन को लेकर क्यों मचा है हंगामा
UGC द्वारा लागू किए गए नए इक्विटी रेगुलेशन का उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव की शिकायतों को एक औपचारिक और पारदर्शी ढांचे में लाना बताया गया है. हालांकि, सोशल मीडिया पर इसे लेकर अलग-अलग व्याख्याएं सामने आ रही हैं. कुछ समूह इसे आरक्षण व्यवस्था से जोड़कर देख रहे हैं, जबकि जानकारों का कहना है कि यह नियम मुख्य रूप से प्रशासनिक जवाबदेही और शिकायत निवारण प्रणाली को मजबूत करता है. विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में समान अवसर सुनिश्चित करने की बात पहले भी होती रही है, लेकिन अब इसे कानूनी और संरचनात्मक रूप दिया गया है. यही बदलाव इस बहस की असली वजह बन गया है.
निशिकांत दुबे का बयान और सवर्ण समाज को संदेश
इस मुद्दे पर भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने सोशल मीडिया के माध्यम से स्पष्ट शब्दों में कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रहते सवर्ण समाज के छात्रों को डरने की जरूरत नहीं है. उन्होंने कहा कि यह कानून किसी जाति विशेष के खिलाफ नहीं है, बल्कि सभी वर्गों को समान सुरक्षा देने के लिए लाया गया है. दुबे ने यह भी याद दिलाया कि मोदी सरकार ने आर्थिक रूप से कमजोर सवर्ण वर्ग के लिए 10 प्रतिशत EWS आरक्षण लागू किया, जिसे संवैधानिक मान्यता भी मिली. उनके अनुसार, सरकार का उद्देश्य समाज में टकराव पैदा करना नहीं, बल्कि व्यवस्था को अधिक न्यायपूर्ण बनाना है.
OBC को शामिल करने से बदला नियमों का दायरा
नए UGC रेगुलेशन में एक अहम बदलाव यह है कि अब अन्य पिछड़ा वर्ग यानी OBC को भी स्पष्ट रूप से इसके दायरे में शामिल किया गया है. पहले ऐसे प्रावधान मुख्यतः अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति तक सीमित माने जाते थे. अब यदि किसी OBC छात्र, शिक्षक या कर्मचारी को जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ता है, तो वह औपचारिक शिकायत दर्ज करा सकता है. जानकारों के मुताबिक, यह कदम उच्च शिक्षा में समान अवसर की अवधारणा को और व्यापक बनाता है. हालांकि, इसी विस्तार को लेकर कुछ वर्गों में भ्रम और आशंका भी देखी जा रही है.
समान अवसर प्रकोष्ठ और बढ़ी संस्थानों की जवाबदेही
नियमों के तहत हर उच्च शिक्षण संस्थान में Equal Opportunity Cell और एक Equity Committee का गठन अनिवार्य किया गया है. इस समिति में महिलाओं, दिव्यांगों, SC, ST और OBC वर्गों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की बात कही गई है. समिति को हर छह महीने में अपनी रिपोर्ट UGC को सौंपनी होगी. इससे विश्वविद्यालयों और कॉलेजों की जवाबदेही पहले से कहीं अधिक बढ़ जाएगी. समर्थकों का कहना है कि यह व्यवस्था भेदभाव रोकने में मददगार होगी, जबकि आलोचक इसे अतिरिक्त प्रशासनिक दबाव के रूप में देख रहे हैं. फिलहाल, UGC के ये नए नियम शिक्षा नीति के साथ-साथ राजनीतिक बहस का भी बड़ा मुद्दा बन चुके हैं.

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