गाजियाबाद में तीन नाबालिग बहनों की मौत ने पूरे देश को झकझोर दिया, लेकिन इस त्रासदी का सबसे डरावना पहलू उनकी मौत नहीं, बल्कि वो शब्द हैं जो उन्होंने मरने से पहले लिखे. पुलिस को घटनास्थल से जो आठ पन्नों का सुसाइड नोट और निजी डायरी मिली, वह किसी एक पल का भावनात्मक विस्फोट नहीं, बल्कि लंबे समय से पनप रही मानसिक उलझन और पहचान के संकट की कहानी कहती है. इन पन्नों में बच्चियों ने न सिर्फ अपनी भावनाएं लिखीं, बल्कि यह भी बताया कि वे खुद को किस दुनिया का हिस्सा मानती थीं, किससे जुड़ाव महसूस करती थीं और किससे पूरी तरह कट चुकी थीं. सुसाइड नोट में बार-बार दो बातें उभरकर सामने आती हैं — “हम इंडियन नहीं हैं” और “हमारी दुनिया कोरिया है”. यही पंक्तियां इस पूरे मामले को एक सामान्य पारिवारिक त्रासदी से आगे ले जाकर एक सामाजिक चेतावनी में बदल देती हैं.
सुसाइड नोट में क्या लिखा था
डायरी के शुरुआती पन्नों में बच्चियों ने खुद को भारतीय मानने से साफ इनकार किया.
उन्होंने लिखा —
“हम इंडियन नहीं हैं.
हम कोरियन हैं.
हमारी सोच, हमारी दुनिया, हमारा सपना कोरिया है.”
यह सिर्फ किसी देश के प्रति लगाव नहीं था, बल्कि अपनी मौजूदा पहचान को पूरी तरह नकार देना था. बच्चियों ने खुद को कोरियन नामों से संबोधित किया और अपनी असली पहचान से दूरी बनाते हुए एक काल्पनिक लेकिन भावनात्मक रूप से मजबूत दुनिया में खुद को स्थापित किया.
मोबाइल और सोशल मीडिया छिनने का दर्द
सुसाइड नोट में सबसे भावनात्मक हिस्से तब आते हैं, जब बच्चियां मोबाइल फोन और सोशल मीडिया अकाउंट बंद किए जाने की बात लिखती हैं.
उन्होंने लिखा कि—
“हमारी दुनिया हमसे छीन ली गई.”
“फोन ही हमारा सब कुछ था.”
डायरी में यह साफ दिखता है कि मोबाइल सिर्फ एक डिवाइस नहीं था, बल्कि उनका इमोशनल सहारा, पहचान और आज़ादी का माध्यम बन चुका था. जब परिवार ने यह दुनिया अचानक बंद कर दी, तो बच्चियों के लिए यह किसी सज़ा से कम नहीं था.
मार खाने के लिए जिएं?
"तीन बहनों ने सुसाइड नोट में यह भी लिखा कि हम क्या तुम्हारी मार खाने के लिये जिएं इस दुनिया में… नहीं भाई नहीं… मार से बढ़िया तो हमें मौत ही अच्छी लगेगी. शादी के नाम से तो हमारे दिल में टेंशन होती थी. हम पसन्द और प्यार करते थे कोरियन से और शादी इंडिया के आदमी से… कभी नहीं. ऐसे तो हमें खुद से भी उम्मीद नहीं थी… इसलिये हमने खुदखुशी कर ली…. सॉरी पापा."
कोरियन ड्रामा, K-Pop और काल्पनिक दुनिया
डायरी के कई पन्नों में कोरियन एक्टर्स, म्यूज़िक और ड्रामा का ज़िक्र है.
उन्होंने लिखा कि—
“कोरियन लोग हमें समझते हैं.”
“वहां की कहानियां हमारी तरह हैं.”
यहां साफ दिखता है कि बच्चियां असल ज़िंदगी के रिश्तों से ज़्यादा जुड़ाव स्क्रीन पर दिखाई देने वाली परफेक्ट, इमोशनल कहानियों से महसूस कर रही थीं. यह जुड़ाव धीरे-धीरे वास्तविक दुनिया से पलायन में बदल गया.
परिवार से शिकायत नहीं, दूरी का बयान
सुसाइड नोट की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि उसमें सीधे तौर पर माता-पिता पर कोई गुस्सा नहीं दिखता. कहीं कोई आरोप नहीं, कहीं कोई चीख नहीं — बस एक दूरी है.
उन्होंने लिखा कि—
“हमें कोई समझ नहीं पाया.”
“हमारी बात किसी ने नहीं सुनी.”
यह शब्द बताते हैं कि बच्चियों का दर्द टकराव का नहीं, बल्कि अनदेखे रह जाने का था.
भविष्य को लेकर निराशा
डायरी में कहीं भी भविष्य की कोई ठोस योजना नहीं दिखती. न पढ़ाई का ज़िक्र, न करियर का, न किसी उम्मीद का. एक जगह उन्होंने लिखा —
“यह दुनिया हमारे लिए नहीं है.”
यही लाइन बताती है कि बच्चियों के मन में यह भावना घर कर चुकी थी कि उनके लिए इस समाज में कोई जगह नहीं बची है.
सुसाइड नोट क्या इशारा करता है
यह सुसाइड नोट किसी एक वजह की कहानी नहीं है. यह एक साथ कई सवाल खड़े करता है. सवाल ये कि क्या बच्चियां अपनी असली पहचान से कट चुकी थीं? डिजिटल दुनिया ने उनकी भावनात्मक ज़रूरतें पूरी कर दी थीं, लेकिन असल दुनिया खाली रह गई? क्या अचानक रोक-टोक ने उनके भीतर टूटन को और तेज कर दिया? यह डायरी बताती है कि आत्महत्या का फैसला अचानक नहीं, बल्कि धीरे-धीरे तैयार हुआ मानसिक अंत था.
एक चेतावनी, एक सवाल
गाजियाबाद की तीन बहनों का सुसाइड नोट सिर्फ उनकी मौत का दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि यह उस पीढ़ी की चुप चीख है जो स्क्रीन पर तो जुड़ी है, लेकिन असल ज़िंदगी में अकेली पड़ती जा रही है. यह नोट बताता है कि बच्चों की दुनिया को समझे बिना, सिर्फ नियंत्रण लगाना कभी-कभी अंतिम धक्का बन सकता है. यह कहानी अपराध या सनसनी से ज्यादा समझ और संवेदनशीलता की मांग करती है.

