चीन और बांग्लादेश के बीच एक महत्वपूर्ण रक्षा समझौता ने दक्षिण एशिया के सुरक्षा समीकरण को नई दिशा दी है, जिसमें ढाका में यूएवी/ड्रोन निर्माण संयंत्र स्थापित करने की योजना है. इसके तहत बांग्लादेश एयरफोर्स और चीनी रक्षा कंपनियों के बीच आधिकारिक समझौता किया गया है, जो संयुक्त निर्माण, तकनीकी हस्तांतरण और क्षमता निर्माण पर केंद्रित है. भारत के लिए यह कदम कई स्तरों पर चिंता का विषय बन रहा है — भू-राजनीतिक, सामरिक और क्षेत्रीय संतुलन की दृष्टि से. बांग्लादेश-चीन का यह गहरा मिलन सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) विशेष रूप से संवेदनशील है, जो भारत के पूर्वोत्तर को मुख्य भू-भाग से जोड़ता है. यह रिपोर्ट डील के विवरण, बांग्लादेश के बयान, और भारत-चीन-बांग्लादेश के बीच सुरक्षा विसंगतियों का विश्लेषण करती है, साथ ही इस बात की समीक्षा भी करती है कि यह किस प्रकार क्षेत्रीय सामरिक दृष्टिकोण को प्रभावित कर सकता है.
ड्रोन निर्माण डील: समझौते की खास बातें
बांग्लादेश ने जनवरी 2026 में एक सरकार-से-सरकार (G-to-G) समझौता किया है, जिसमें चीन के China Electronics Technology Group Corporation International (CETC) के साथ मिलकर बांग्लादेश में UAV (ड्रोन) उत्पादन और असेम्बली सुविधाओं की स्थापना शामिल है.
इस परियोजना का लक्ष्य केवल ड्रोन उपलब्ध कराना नहीं है, बल्कि बांग्लादेश को डिफेंस-टेक्नोलॉजी में स्वावलंबी बनाना भी है. समझौते के तहत तकनीकी हस्तांतरण, क्षमता निर्माण और स्थानीय श्रम/औद्योगिक कौशल को विकसित किया जाएगा.
रिपोर्टों के मुताबिक, परियोजना में MALE (Medium Altitude Long Endurance) और VTOL (Vertical Take-Off and Landing) जैसे UAV मॉडल शामिल होने की संभावना है, जो निगरानी, टोही और सैन्य उपयोग के लिए उपयुक्त हैं.
क्यों यह डील भारत के लिए रणनीतिक चिंता का विषय है
भारत-बांग्लादेश सीमा लगभग 4,096 किलोमीटर लंबी है और इसमें पूर्वोत्तर के लिए सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) एक संवेदनशील जंक्शन है, जो भारत के मुख्य भूभाग को उत्तर-पूर्वी राज्यों से जोड़ता है.
इस डील से भारत को कई सिक्योरिटी चिंताएं हैं — जैसे कि
• ड्रोन तकनीक के माध्यम से निगरानी: उच्च-तकनीकी UAVs भारत के सीमा इलाके में निगरानी और इलेक्ट्रॉनिक डेटा एकत्र कर सकते हैं, जो सुरक्षा खुफिया के लिए चुनौतीपूर्ण है.
• चीनी रक्षा उद्योग का विस्तार: यह केवल व्यापारिक समझौता नहीं है, बल्कि चीन का प्रत्यक्ष सैन्य-औद्योगिक विस्तार है, जो भारत के सीमावर्ती क्षेत्र के पास तकनीकी पहुंच बनाने की दिशा में एक कदम है.
• चिकन नेक को खतरा: जैसे की कई विश्लेषकों ने बताया है, सिलीगुड़ी कॉरिडोर एक आकर्षक रणनीतिक बिंदु है और किसी भी दुश्मन के दृष्टिकोण से संवेदनशील बनाया जा सकता है.
इन कारकों के संयोजन से भारत यह मानता है कि सिर्फ ड्रोन्स का निर्माण ही नहीं बल्कि द्विपक्षीय सैन्य सहयोग एक गंभीर भू-सामरिक कदम है.
ढाका का पक्ष: आत्मनिर्भरता और आधुनिक रक्षा
बांग्लादेश सरकार ने इस डील का सकारात्मक पक्ष भी स्पष्ट किया है. विदेश मामलों के सलाहकार Md Touhid Hossain ने कहा कि यह निर्णय देश की रक्षा औद्योगिक क्षमता और आत्मनिर्भरता में मदद करेगा और किसी की प्रतिक्रिया इससे प्रभावित नहीं करेगी. ढाका का दावा है कि यह परियोजना मानवीय सहायता, आपदा प्रबंधन और सुरक्षा संचालन दोनों के लिए स्थानीय UAV निर्माण क्षमता प्रदान करेगी. इसके अलावा, बांग्लादेश एक डिफेंस इकोनॉमिक जोन स्थापित करने के लिए भी योजना बना रहा है, जिससे वे आने वाले वर्षों में रक्षा प्रणालियों, सॉफ्टवेयर और अर्थव्यवस्था को मजबूत कर सकें.
विस्तृत सुरक्षा परिदृश्य
भारत ने पहले से ही इस अत्यंत संकीर्ण गलियारे की सुरक्षा को सुदृढ़ करने के लिए कई कदम उठाये हैं. इसमें
• अंडरग्राउंड रेलवे रूट का निर्माण,
• सीमा सुरक्षा बल (BSF) द्वारा नई कंसर्टिना फेंसिंग,
• वायु रक्षा सिस्टम जैसे S-400 और राफेल तैनाती शामिल है.
ये उपाय ऐसे समय में उठाये गए हैं जब बांग्लादेश-चीन रक्षा सहयोग तेजी से गहराता जा रहा है और भारत के पूर्वोत्तर की सुरक्षा चुनौतियाँ बढ़ रही हैं.
चीन का विस्तार और दक्षिण एशिया में रणनीतिक बढ़त
चीन की भूमिका केवल ड्रोन संयंत्र तक सीमित नहीं है. ढाका की लालमनिरहाट एयरबेस की पुनः सक्रियता पर चीनी जांच और सहायता से यह संकेत मिलता है कि चीन बांग्लादेश के सैन्य बुनियादी ढांचे में गहरा घुस रहा है. बांग्लादेश ने पहले ही कई चीनी रक्षा उपकरण, नौसैनिक संसाधन, और साझा तकनीकी सहयोग में वृद्धि की है, जिससे चीनी रक्षा घराने की उपस्थिति और मजबूत होती गई है. इस व्यापक प्रतिरक्षा जाल के भीतर, ड्रोन संयंत्र को सिर्फ एक उपकरण के रूप में नहीं बल्कि दीर्घकालिक सामरिक स्थिरता के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है.
भारत की प्रतिक्रिया और सतर्कता
भारत ने इस बढ़ते दबाव के बीच हिमालयी राज्य हल्दिया में नौसेना बेस का विस्तार किया है. साथ ही प्राथमिक रूप से हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी के सामने सुरक्षा प्लेटफॉर्म के रूप में और पूर्वोत्तर तक पहुंच को सुरक्षित रखने के लिए सिलीगुड़ी कॉरिडोर की सुरक्षा के लिए भारी निवेश किया है. विश्लेषकों के मुताबिक, चीन-बांग्लादेश साझेदारी केवल दो देशों के बीच समझौता नहीं है, बल्कि क्षेत्रीय सामरिक संतुलन को बदलने वाले कदमों का हिस्सा है. भारत को इस बदलते सुरक्षा परिदृश्य में रणनीतिक, तकनीकी और कूटनीतिक तयारी दोनों का संलयन करना जरूरी है.

