New Delhi: केंद्रीय बजट के दिन हर साल वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की साड़ी चर्चा में रहती है. इस बार भी बजट भाषण के बीच और उसके बाद उनके पहनावे को लेकर सवाल किए गए, जिस पर उन्होंने साफ शब्दों में प्रतिक्रिया दी. सीतारमण ने कहा कि “आप बजट के दिन क्या पहनने वाली हैं?” जैसे सवाल सार्वजनिक जीवन में महिलाओं के प्रति मौजूद पूर्वाग्रहों को दिखाते हैं. उनके मुताबिक, ऐसी टिप्पणियां अक्सर दुर्भावना से नहीं होतीं, लेकिन वे महिलाओं को उनके विचारों और काम की जगह कपड़ों से आंकने की आदत को उजागर करती हैं. 124 मिनट के लंबे बजट भाषण के बाद आई उनकी यह प्रतिक्रिया बजट की नीतियों के साथ-साथ लैंगिक नजरिए पर भी बहस छेड़ गई. उन्होंने कहा कि हर साल बजट के समय उनकी साड़ी पर चर्चा होना इस बात का संकेत है कि समाज में महिलाओं को लेकर सोच अभी पूरी तरह बदली नहीं है.
बजट वाली साड़ी पर सवाल क्यों उठते हैं
निर्मला सीतारमण ने कहा कि बजट के दिन उनके पहनावे को लेकर होने वाली बातचीत कोई नई बात नहीं है. हर साल साड़ी के रंग, डिजाइन और प्रतीकात्मकता पर सवाल पूछे जाते हैं. उनके अनुसार, यह ध्यान अक्सर अनायास जाता है और बातचीत का हिस्सा बन जाता है, लेकिन यही आदत दिखाती है कि सार्वजनिक पदों पर मौजूद महिलाओं को काम से पहले उनके रूप-रंग के आधार पर देखा जाता है. उन्होंने कहा कि पुरुष नेताओं से शायद ही कभी पूछा जाता है कि वे किसी बड़े दिन क्या पहनेंगे. साड़ी पर केंद्रित सवाल दरअसल महिलाओं को उनकी भूमिका और फैसलों से हटाकर बाहरी पहचान में सीमित कर देते हैं, जो बराबरी की सोच के खिलाफ है.
‘कपड़ों से नहीं, विचारों से पहचान’ का संदेश
वित्त मंत्री ने जोर देकर कहा कि किसी महिला को उसके कपड़ों से नहीं, बल्कि उसके विचारों और क्षमताओं से आंका जाना चाहिए. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि रोजमर्रा की बातचीत में “वह क्या पहन रही है?” या “वह क्या कर रही है?” जैसे सवाल यह बताते हैं कि महिलाओं को किस नजरिए से देखा जाता है. सीतारमण के मुताबिक, यह सोच अनजाने में भी सामने आ जाती है और लोग इसे सामान्य मान लेते हैं. उन्होंने कहा कि यही वजह है कि ऐसे सवालों को चुनौती देना जरूरी है, ताकि सार्वजनिक विमर्श में महिलाओं को उनके काम और फैसलों के आधार पर जगह मिले.
सीधे चुनौती देने की इच्छा क्यों होती है
सीतारमण ने माना कि कई बार उनका मन करता है कि ऐसे सवालों को सीधे चुनौती दें. उन्होंने कहा कि अगर किसी पुरुष से यह नहीं पूछा जाता कि वह किसी अहम दिन क्या पहन रहा है, तो महिला से यह सवाल क्यों किया जाए. उनके मुताबिक, यह फर्क दिखाता है कि समाज में बराबरी का विचार अभी व्यवहार में पूरी तरह नहीं उतरा है. उन्होंने यह भी कहा कि अक्सर लोग बुरे इरादे से ऐसी बातें नहीं करते, लेकिन छिपे हुए पूर्वाग्रह अनजाने में सामने आ जाते हैं. ऐसे में सवाल पूछने के तरीके और संदर्भ पर भी सोचने की जरूरत है.
बजट भाषण और साड़ी की चर्चा का विरोधाभास
इस बार का बजट भाषण 124 मिनट तक चला और इसमें सरकार की आर्थिक प्राथमिकताओं, पूंजीगत खर्च और राजकोषीय घाटे पर विस्तार से बात की गई. इसके बावजूद, चर्चा का एक हिस्सा फिर से साड़ी तक सिमट गया. सीतारमण ने कहा कि यह विरोधाभास बताता है कि महिला नेतृत्व के साथ आज भी अलग तरह का व्यवहार होता है. जहां एक ओर नीतियों और आंकड़ों पर चर्चा होनी चाहिए, वहीं दूसरी ओर पहनावे पर ध्यान चला जाता है. उन्होंने इसे सार्वजनिक जीवन में महिलाओं के सामने आने वाली चुनौतियों का उदाहरण बताया.
समाज में जड़ें जमाए पूर्वाग्रहों की बात
वित्त मंत्री ने कहा कि ऐसे सवाल समाज में गहराई से जड़ें जमाए पूर्वाग्रहों को दर्शाते हैं. यह सोच जानबूझकर नहीं पनपती, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही आदतों का नतीजा होती है. उन्होंने कहा कि जब तक इन छोटी-छोटी बातों पर ध्यान नहीं दिया जाएगा, तब तक बराबरी का लक्ष्य अधूरा रहेगा. बजट वाली साड़ी पर बार-बार होने वाली चर्चा इसी मानसिकता की झलक है, जहां महिला की पहचान उसके काम से ज्यादा उसके पहनावे से जोड़ दी जाती है.
सार्वजनिक जीवन में महिलाओं के लिए संदेश
सीतारमण की प्रतिक्रिया सिर्फ एक टिप्पणी का जवाब नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन में महिलाओं के लिए एक व्यापक संदेश है. उन्होंने कहा कि महिलाएं हर क्षेत्र में जिम्मेदारियां निभा रही हैं और उन्हें उसी नजर से देखा जाना चाहिए. बजट जैसी गंभीर प्रक्रिया के दिन साड़ी पर सवाल उठना यह दिखाता है कि सोच में बदलाव की अभी जरूरत है. उन्होंने उम्मीद जताई कि समय के साथ बातचीत का फोकस कपड़ों से हटकर काम और फैसलों पर आएगा, ताकि नेतृत्व में लैंगिक बराबरी को सही मायनों में स्वीकार किया जा सके.


