पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने देश के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ खुला मोर्चा खोल दिया है. चुनाव आयोग की ओर से चल रही स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया को लेकर वह न सिर्फ लगातार सवाल उठा रही हैं, बल्कि इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में खुद वकीलों की तरह बहस भी कर चुकी हैं. सोमवार को भी उनके फिर से अदालत में दलीलें देने की संभावना है. तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष की नाराजगी इतनी बढ़ चुकी है कि वह मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से हटाने की संभावना तक पर बात करने लगी हैं. हालांकि, खुद ममता बनर्जी मानती हैं कि मौजूदा संसद के संख्या बल में यह मुमकिन नहीं है.
CEC को हटाने का राजनीतिक संदेश देना चाहती हैं ममता
ममता बनर्जी ने स्वीकार किया है कि संसद में विपक्ष के पास इतने सांसद नहीं हैं कि वे मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया को अंजाम तक पहुँचा सकें. इसके बावजूद, वह इस पहल के ज़रिए एक राजनीतिक और संवैधानिक संदेश देना चाहती हैं. उनका कहना है कि भले ही प्रस्ताव पास न हो, लेकिन यह रिकॉर्ड का हिस्सा बनेगा और जनता के सामने मुद्दा स्पष्ट होगा.
CEC के खिलाफ प्रस्ताव लाने की बात
दिल्ली में चुनाव आयोग से मुलाकात के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में ममता बनर्जी से कांग्रेस नेता राहुल गांधी की उस टिप्पणी पर सवाल किया गया, जिसमें उन्होंने चुनाव आयुक्तों पर कार्रवाई के लिए रेट्रोस्पेक्टिव कानून लाने की बात कही थी. इस पर ममता ने कहा, “अगर यह जनता के हित में है तो हम चाहते हैं कि उनके खिलाफ प्रस्ताव लाया जाए. हमारे पास संख्या बल नहीं है, लेकिन यह रिकॉर्ड में तो जाएगा. अगर ऐसा कुछ लाया जाता है, तो मैं उसका समर्थन करूंगी.”
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया
भारत के संविधान के अनुच्छेद 324(5) में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का प्रावधान है. इसके तहत CEC को उसी प्रक्रिया से हटाया जा सकता है, जिस प्रक्रिया से सुप्रीम कोर्ट के किसी न्यायाधीश को हटाया जाता है. संविधान के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त को केवल “सिद्ध दुर्व्यवहार या अक्षमता” के आधार पर ही पद से हटाया जा सकता है.
सुप्रीम कोर्ट के जज को कैसे हटाया जाता है?
सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायाधीशों, मुख्य चुनाव आयुक्त और नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) को हटाने की प्रक्रिया अनुच्छेद 124(4) में दी गई है. इसके लिए संसद के दोनों सदनों में एक विशेष प्रस्ताव पास करना होता है, जिसमें:
- सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सांसदों का दो-तिहाई बहुमत, और
- सदन की कुल सदस्य संख्या का कम से कम 50% समर्थन आवश्यक होता है.
ध्यान देने वाली बात यह है कि इस प्रक्रिया को तकनीकी रूप से महाभियोग नहीं कहा जाता. महाभियोग शब्द केवल राष्ट्रपति को हटाने की प्रक्रिया के लिए प्रयुक्त होता है.
मौजूदा संख्या बल में क्यों संभव नहीं है CEC को हटाना?
वर्तमान संसद के आंकड़ों पर नज़र डालें तो:
- लोकसभा (543 सदस्य): एनडीए के पास 293 सांसद हैं
- राज्यसभा (245 सदस्य): सत्ताधारी गठबंधन को 134 सांसदों का समर्थन प्राप्त है
इसके अलावा, कुछ तटस्थ दल भी हैं जो ज़रूरत पड़ने पर सरकार के पक्ष में खड़े होते रहे हैं. ऐसे में न केवल ममता बनर्जी, बल्कि कांग्रेस और पूरे INDIA गठबंधन के लिए भी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने का प्रयास मौजूदा हालात में सफल होता नहीं दिखता.

