बेटी ने पिता के बयान से पल्ला झाड़ा, बाबूलाल ने राहुल को घेरा; योगेंद्र साव के मोर्चे से कांग्रेस में नई बेचैनी
“योगेंद्र साव के सरकार विरोधी बयानों से झारखंड की सियासत फिर गरमा गई है।.अंबा प्रसाद ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पर अपने पिता की व्यक्तिगत टिप्पणी से असहमति जताई, वहीं बाबूलाल मरांडी ने योगेंद्र साव के आरोपों को लेकर राहुल गांधी से सवाल किया है.”

झारखंड की राजनीति में योगेंद्र साव एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़े हैं, जहां मामला सिर्फ उनके और सरकार के बीच टकराव का नहीं रह गया है. हजारीबाग के हुरहुरू की 50 डिसमिल खासमहल जमीन पर प्रशासनिक कार्रवाई के बीच साव के सरकार विरोधी तेवर ने कांग्रेस के भीतर भी असहजता पैदा कर दी है. एक तरफ नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने योगेंद्र साव के आरोपों को आधार बनाकर राहुल गांधी से सवाल किया है कि अगर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ही सरकार की कार्यशैली पर गंभीर आरोप लगा रहे हैं, तो केंद्रीय नेतृत्व उसका समर्थन क्यों कर रहा है. दूसरी तरफ योगेंद्र साव की बेटी और कांग्रेस नेता अंबा प्रसाद ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पर की गई अपने पिता की व्यक्तिगत टिप्पणी से सार्वजनिक रूप से असहमति जताई है. यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि योगेंद्र साव का सरकार से टकराव नया नहीं है. मार्च 2026 में उन्हें कांग्रेस से तीन साल के लिए निष्कासित किया गया था, लेकिन करीब तीन महीने बाद ही जून में निष्कासन वापस ले लिया गया. अब सवाल सिर्फ जमीन का नहीं, बल्कि साव परिवार, कांग्रेस संगठन और झामुमो-कांग्रेस गठबंधन के बीच बदलते रिश्तों का भी है.
साव के आरोप से सियासत गरम
मौजूदा विवाद की शुरुआत हुरहुरू की 50 डिसमिल जमीन पर प्रशासनिक कार्रवाई से जरूर दिख रही है, लेकिन राजनीतिक असर उससे कहीं बड़ा है. 18 सितंबर को प्रशासनिक टीम जेसीबी के साथ जमीन पर पहुंची तो योगेंद्र साव और अधिकारियों के बीच तीखी बहस हुई. प्रशासन का पक्ष है कि कैंटोनमेंट मौजा की यह जमीन खासमहल की सरकारी भूमि है और उस पर अवैध कब्जे/निर्माण के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है. दूसरी ओर साव जमीन पर अपने दावे के समर्थन में दस्तावेज और एग्रीमेंट का हवाला देते रहे हैं.
यह विवाद अचानक पैदा नहीं हुआ. 2023 में भी इसी 50 डिसमिल जमीन को लेकर प्रशासन ने निर्माण रोकने और नोटिस देने की कार्रवाई की थी. उस समय उपलब्ध रिपोर्टों में जमीन का कुल क्षेत्रफल 25, 15 और 10 डिसमिल के हिस्सों में दर्ज होने तथा इसे खासमहल भूमि बताया गया था. योगेंद्र साव और अंबा प्रसाद के नाम से जुड़े विवाद को लेकर एफआईआर की बात भी सामने आई थी. यानी 2026 में जेसीबी की कार्रवाई किसी एक दिन की घटना नहीं है. जून और अगस्त में भी प्रशासनिक हस्तक्षेप की खबरें आईं और सितंबर में पांचवीं कार्रवाई का उल्लेख हुआ. यही वजह है कि अब यह विवाद प्रशासन बनाम साव से आगे बढ़कर राजनीतिक सवाल बन चुका है.
अंबा ने क्यों खींची दूरी?
सबसे दिलचस्प राजनीतिक तस्वीर यहां बनती है. अंबा प्रसाद ने अपने पिता के पूरे राजनीतिक आरोपों को खारिज नहीं किया है, लेकिन मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पर की गई व्यक्तिगत टिप्पणी से साफ तौर पर असहमति जताई है. उनकी सोशल मीडिया पोस्ट का केंद्र जमीन का स्वामित्व नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री पर व्यक्तिगत टिप्पणी और संवैधानिक शिष्टाचार रहा.
इसे सिर्फ एक पारिवारिक असहमति मानना भी पूरी तस्वीर नहीं होगी. मार्च 2026 में जब योगेंद्र साव को कांग्रेस से तीन साल के लिए निष्कासित किया गया था, तब अंबा प्रसाद ने खुलकर अपने पिता का बचाव किया था. उन्होंने पार्टी नेतृत्व के खिलाफ सवाल उठाए और आरोप लगाया था कि कार्रवाई उचित प्रक्रिया के बिना की गई. उस समय उन्होंने केंद्रीय नेतृत्व तक मामला ले जाने की बात भी कही थी. लेकिन जून में कांग्रेस ने योगेंद्र साव का निष्कासन वापस ले लिया. पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष केशव महतो कमलेश ने तत्काल प्रभाव से निष्कासन रद्द कर दिया. यानी तीन साल की कार्रवाई लगभग तीन महीने में समाप्त हो गई.
यहीं से आज की स्थिति को समझना जरूरी है. एक समय बेटी पिता के साथ खड़ी थीं, पार्टी नेतृत्व से भिड़ रही थीं; अब वही बेटी पिता की मुख्यमंत्री पर की गई व्यक्तिगत टिप्पणी से सार्वजनिक दूरी बना रही हैं. यह योगेंद्र साव के राजनीतिक तेवर और कांग्रेस की गठबंधन राजनीति के बीच बढ़ते तनाव का संकेत जरूर है, हालांकि इसे कांग्रेस के भीतर किसी औपचारिक विभाजन का प्रमाण कहना अभी जल्दबाजी होगी.
बाबूलाल ने राहुल को घेरा
इसी जगह नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने पूरे विवाद को राज्य की सत्ता और कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व से जोड़ दिया है. उन्होंने योगेंद्र साव के आरोपों को आधार बनाकर राहुल गांधी से पूछा कि अगर कांग्रेस के ही वरिष्ठ नेता सरकार की कार्यशैली पर गंभीर आरोप लगा रहे हैं, तो कांग्रेस नेतृत्व सरकार का समर्थन क्यों कर रहा है. मरांडी ने पत्थर, बालू, कोयला और लौह अयस्क के कथित अवैध खनन, टेंडर में कमीशन और ट्रांसफर-पोस्टिंग से कथित आर्थिक लाभ जैसे आरोप भी उठाए. ये बाबूलाल मरांडी के आरोप हैं, स्थापित तथ्य नहीं; उपलब्ध रिपोर्ट में इन आरोपों के समर्थन में कोई न्यायिक निष्कर्ष या स्वतंत्र जांच का परिणाम प्रस्तुत नहीं किया गया है. इसलिए इन दावों को आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए.
राजनीतिक तौर पर बाबूलाल का निशाना सिर्फ हेमंत सरकार नहीं है. उनका सवाल राहुल गांधी तक पहुंच रहा है—यानी कांग्रेस और झामुमो के गठबंधन में कांग्रेस की राजनीतिक जिम्मेदारी क्या है? योगेंद्र साव कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं, सरकार के खिलाफ बोल रहे हैं और फिर भी पार्टी के सदस्य हैं. ऐसे में विपक्ष के लिए यह सवाल उठाना स्वाभाविक राजनीतिक मुद्दा बन गया है कि कांग्रेस अपने ही नेता के आरोपों को किस तरह देखती है. लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है. किसी नेता का सरकार पर आरोप लगा देना अपने आप में आरोपों को सत्य साबित नहीं करता. इसलिए योगेंद्र साव के दावों और बाबूलाल मरांडी के सवालों के बीच तथ्यात्मक जांच और दस्तावेजी प्रमाण का महत्व सबसे ज्यादा है.
साव की कहानी सिर्फ आज की नहीं
योगेंद्र साव की राजनीति का आधार हजारीबाग-बड़कागांव क्षेत्र में लंबे समय से जमीन, विस्थापन और कोयला परियोजनाओं के विरोध से जुड़ा रहा है. बड़कागांव विधानसभा क्षेत्र में उनके परिवार की राजनीतिक पकड़ भी पुरानी रही है. 2009 में योगेंद्र साव, 2014 में उनकी पत्नी निर्मला देवी और 2019 में उनकी बेटी अंबा प्रसाद कांग्रेस के टिकट पर इस क्षेत्र से जीत चुकी हैं. हालांकि 2024 में अंबा प्रसाद को भाजपा के रोशन लाल चौधरी ने 31,393 वोटों से हराया. साव परिवार का राजनीतिक संघर्ष खासकर एनटीपीसी की कोयला परियोजनाओं और जमीन अधिग्रहण के सवाल पर लंबे समय से दिखाई देता है. 2016 के बड़कागांव-चिरूडीह आंदोलन के दौरान हिंसा और पुलिस फायरिंग में चार लोगों की मौत हुई थी. इसी मामले में योगेंद्र साव और उनकी पत्नी निर्मला देवी को निचली अदालत ने सजा सुनाई थी. बाद में योगेंद्र साव को हाईकोर्ट से जमानत मिली और 2022 में वे जेल से बाहर आए.
हालांकि उनके पूरे कानूनी रिकॉर्ड को एक ही रंग में देखना भी सही नहीं होगा. अगस्त 2026 में झारखंड हाईकोर्ट ने 2010 के एनटीपीसी कार्यालय हंगामा मामले में उन्हें बरी कर दिया. अदालत ने अभियोजन के साक्ष्यों की समीक्षा के बाद मारपीट या भीड़ को उकसाने का ठोस प्रमाण नहीं पाया. यानी योगेंद्र साव की राजनीति में एक तरफ आंदोलन, विस्थापन और स्थानीय जमीन के सवाल हैं, तो दूसरी तरफ लंबे समय से चले आ रहे कानूनी और प्रशासनिक विवाद भी हैं. यही पृष्ठभूमि आज के हुरहुरू विवाद को ज्यादा संवेदनशील बनाती है.
घर पर बुलडोजर, पार्टी से दूरी
2026 ने योगेंद्र साव के लिए पहले ही बड़ा राजनीतिक और व्यक्तिगत संघर्ष खड़ा कर दिया था. एनटीपीसी की चट्टी बरियातू परियोजना के विस्तार के लिए उनके पुश्तैनी मकान पर प्रशासन ने कार्रवाई की. अधिकारियों के मुताबिक जमीन परियोजना के लिए जरूरी थी और मुआवजे से जुड़े विवाद के कारण कब्जा लेने में दिक्कत आ रही थी. रिपोर्टों के अनुसार मुआवजे की रकम करीब 1.97 करोड़ रुपये बताई गई थी. साव पक्ष ने कार्रवाई और मुआवजे को लेकर अलग आपत्तियां उठाईं. इसके बाद मार्च में कांग्रेस ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के खिलाफ उनके बयानों को अनुशासनहीनता और गठबंधन विरोधी आचरण मानते हुए तीन साल के निष्कासन का फैसला किया.
लेकिन जून में वही निष्कासन वापस ले लिया गया. इस घटनाक्रम से यह साफ है कि कांग्रेस के लिए योगेंद्र साव को पूरी तरह राजनीतिक दायरे से बाहर करना आसान फैसला नहीं था. बड़कागांव और हजारीबाग क्षेत्र में साव परिवार की पुरानी राजनीतिक मौजूदगी, स्थानीय मुद्दों पर उनकी सक्रियता और संगठन के भीतर उनके संबंध इस पूरे प्रकरण की पृष्ठभूमि का हिस्सा हैं. अब सितंबर में फिर वही टकराव सामने है—एक तरफ सरकार और प्रशासन, दूसरी तरफ योगेंद्र साव. फर्क इतना है कि इस बार परिवार के भीतर से भी एक अलग आवाज सुनाई दे रही है.
असली लड़ाई जमीन से आगे
हुरहुरू की 50 डिसमिल जमीन इस समय विवाद का सबसे दिखाई देने वाला चेहरा है, लेकिन इसके पीछे तीन अलग-अलग राजनीतिक रेखाएं खिंच रही हैं. पहली रेखा योगेंद्र साव बनाम प्रशासन की है. जमीन सरकारी खासमहल है या साव पक्ष का दावा कितना वैध है, इसका अंतिम निर्धारण दस्तावेजों और कानूनी-प्रशासनिक प्रक्रिया से होगा. फिलहाल दोनों पक्षों के दावे अलग हैं.
दूसरी रेखा योगेंद्र साव बनाम गठबंधन सरकार की है. साव पहले भी सरकार और मुख्यमंत्री के खिलाफ मुखर रहे हैं. इसी कारण मार्च में कांग्रेस की अनुशासनात्मक कार्रवाई हुई थी और अब फिर उनके बयानों ने सरकार को राजनीतिक रक्षात्मक स्थिति में लाने का अवसर विपक्ष को दिया है.
तीसरी और सबसे दिलचस्प रेखा साव परिवार बनाम राजनीतिक परिस्थिति की है. अंबा प्रसाद का ताजा बयान बताता है कि पिता-बेटी के राजनीतिक रास्ते हर मुद्दे पर एक जैसे नहीं हैं. मार्च में उन्होंने पिता के निष्कासन के खिलाफ मोर्चा खोला था, जबकि सितंबर में मुख्यमंत्री पर व्यक्तिगत टिप्पणी से दूरी बना ली. यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अंबा खुद अब विधायक नहीं हैं और 2024 में बड़कागांव सीट हार चुकी हैं.
इस पूरे घटनाक्रम में फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि किसने किस पर बयान दिया. असली सवाल यह है कि क्या योगेंद्र साव का लगातार सरकार विरोधी रुख कांग्रेस के लिए फिर से राजनीतिक संकट बनेगा, या पार्टी इस बार भी संगठन के भीतर असहमति और गठबंधन की मजबूरी के बीच कोई रास्ता निकाल लेगी? और विपक्ष के लिए सवाल अलग है—क्या वह साव के आरोपों को सिर्फ राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करेगा या उन आरोपों के पीछे मौजूद दस्तावेज, जांच और संस्थागत जवाबदेही के सवालों को भी सामने लाएगा? फिलहाल हुरहुरू की जमीन पर चल रही जेसीबी ने सिर्फ एक भूखंड का विवाद नहीं खोला है; उसने कांग्रेस, झामुमो गठबंधन और साव परिवार के बीच पुराने तनाव की कई परतें फिर से सामने ला दी हैं.

