चार दशक से जंगल में बना रहा बड़ा नाम, अब असीम मंडल के आत्मसमर्पण के बाद माओवादी नेटवर्क की कितनी परतें खुलेंगी?
“चार दशक से माओवादी संगठन में सक्रिय असीम मंडल ने पश्चिम बंगाल में आत्मसमर्पण किया. CPI (Maoist) की सेंट्रल कमेटी के सदस्य असीम पर झारखंड और ओडिशा सरकार ने कुल ₹2.20 करोड़ का इनाम रखा था. अब उसके आत्मसमर्पण के बाद झारखंड-बंगाल-ओडिशा में फैले माओवादी नेटवर्क और पुराने संपर्कों पर कई सवाल उठ रहे हैं.”

Ranchi: चार दशक तक माओवादी संगठन के साथ जंगलों में सक्रिय रहने वाला एक ऐसा नाम, जिसके सिर पर झारखंड और ओडिशा सरकार ने मिलकर ₹2.20 करोड़ का इनाम रखा था, अब पुलिस के सामने है. CPI (Maoist) की सेंट्रल कमेटी के सदस्य असीम मंडल उर्फ आकाश ने 17 सितंबर को पश्चिम बंगाल में कोलकाता STF के सामने आत्मसमर्पण किया. उसके ऊपर झारखंड में ₹1 करोड़ और ओडिशा में ₹1.20 करोड़ का इनाम था. करीब 55 मामलों में उसका नाम दर्ज होने की बात सामने आई है. लेकिन असीम मंडल की कहानी सिर्फ इनाम, केस और आत्मसमर्पण तक सीमित नहीं है. वह संगठन के उस ऊपरी ढांचे का हिस्सा रहा, जिसने झारखंड-बंगाल सीमा से लेकर सारंडा और जंगलमहल तक माओवादी गतिविधियों को लंबे समय तक प्रभावित किया. अब उसके सामने आने के साथ सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या असीम मंडल के पास उस नेटवर्क की ऐसी जानकारी है, जो माओवादी संगठन के कई पुराने राज खोल सकती है?
असीम मंडल सिर्फ जंगल में घूमने वाला माओवादी नहीं था
असीम मंडल उर्फ आकाश, तिमिर, मनोज, दीपक और राकेश जैसे नामों से संगठन में सक्रिय रहा. पश्चिम मेदिनीपुर इलाके से निकला यह चेहरा धीरे-धीरे माओवादी संगठन के ऊपरी नेतृत्व तक पहुंचा. वह CPI (Maoist) की सेंट्रल कमेटी का सदस्य रहा और पश्चिम बंगाल स्टेट कमेटी-I की जिम्मेदारी भी संभाली. यानी उसकी भूमिका केवल किसी स्थानीय दस्ते के संचालन तक सीमित नहीं थी. संगठन के भीतर उसकी स्थिति ऐसी थी कि उसके पास अलग-अलग इलाकों में सक्रिय कैडरों, संपर्कों और गतिविधियों की जानकारी होने की संभावना है. करीब चार दशक तक भूमिगत रहकर काम करने वाले असीम ने कई बार अपना ठिकाना बदला. यही वजह है कि उसका आत्मसमर्पण एक सामान्य कैडर के पुलिस के सामने आने की घटना नहीं है. यह संगठन के एक पुराने और ऊपरी स्तर के चेहरे का सामने आना है.
किशनजी के बाद बदला ठिकाना, फिर सारंडा के जंगल बने ठिकाना
असीम मंडल की कहानी पश्चिम बंगाल के जंगलमहल से निकलकर झारखंड के सारंडा तक पहुंचती है. वर्ष 2011 में माओवादी नेता किशनजी के मारे जाने के बाद असीम मंडल के जंगलमहल से हटकर पश्चिमी सिंहभूम के सारंडा के घने जंगलों में जाने की जानकारी मिलती है. इसके बाद लंबे समय तक उसका नाम झारखंड के कोल्हान और सारंडा इलाके में माओवादी गतिविधियों से जुड़ा रहा. बंगाल और झारखंड की सीमा से लगे जंगल उसके लिए सिर्फ छिपने की जगह नहीं थे, बल्कि संगठन की गतिविधियों के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र भी रहे. समय के साथ सुरक्षा बलों का दबाव बढ़ा तो माओवादी नेटवर्क को अपने पुराने इलाकों में टिके रहना मुश्किल होता गया. असीम का चार दशक लंबा सफर इसी बदलती तस्वीर के बीच आगे बढ़ता रहा.
₹2.20 करोड़ का इनाम और 55 मामले, क्यों था असीम इतना अहम?
असीम मंडल पर सिर्फ झारखंड में ही इनाम नहीं था. झारखंड सरकार ने ₹1 करोड़ और ओडिशा सरकार ने ₹1.20 करोड़ का इनाम घोषित किया था. दोनों राज्यों को मिलाकर इनाम की रकम ₹2.20 करोड़ पहुंचती है. उसके खिलाफ झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में करीब 55 मामले दर्ज होने की जानकारी रिपोर्टों में दी गई है. उसका नाम सुरक्षा बलों पर हुए कई हमलों और माओवादी गतिविधियों से जुड़े मामलों में आया. 11 जनवरी 2023 को तुंबाहाका इलाके में IED विस्फोट में CoBRA के नौ जवान घायल हुए थे और रिपोर्टों में इस घटना को भी असीम के दस्ते से जोड़ा गया. यानी उसके खिलाफ कार्रवाई सिर्फ एक पुराने वांछित व्यक्ति की तलाश नहीं थी. तीन राज्यों में फैले नेटवर्क और लंबे आपराधिक रिकॉर्ड ने उसे सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ा लक्ष्य बना रखा था.
मिसिर बेसरा के बाद असीम मंडल, डेढ़ महीने में दो बड़े नामों की कहानी
असीम मंडल का आत्मसमर्पण ऐसे वक्त हुआ है जब झारखंड में माओवादी संगठन के बड़े चेहरों पर लगातार कार्रवाई हो रही है. 29 जुलाई 2026 को माओवादी पोलित ब्यूरो सदस्य मिसिर बेसरा की गिरफ्तारी हुई थी. मिसिर बेसरा पर भी झारखंड और ओडिशा में कुल ₹2.20 करोड़ का इनाम था. अब करीब डेढ़ महीने बाद सेंट्रल कमेटी सदस्य असीम मंडल का आत्मसमर्पण सामने आया है. इन दोनों घटनाओं के बीच एक बड़ा फर्क जरूर है—एक मामले में गिरफ्तारी हुई और दूसरे में आत्मसमर्पण. लेकिन दोनों घटनाएं उस पुराने माओवादी नेतृत्व की स्थिति पर सवाल जरूर खड़े करती हैं, जो लंबे समय तक झारखंड और आसपास के जंगलों में संगठन की गतिविधियों का अहम हिस्सा रहा. अब सवाल यह है कि बड़े चेहरों के हटने के बाद संगठन की जमीन पर मौजूद संरचना कितनी बची है.
जंगलों से ज्यादा नेटवर्क की जानकारी होगी अहम
असीम मंडल के सामने आने के बाद सुरक्षा एजेंसियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा उसकी पूछताछ है. उससे संगठन के पुराने और मौजूदा संपर्कों, सक्रिय कैडरों, ठिकानों, हथियारों और अलग-अलग राज्यों के बीच बने नेटवर्क को लेकर जानकारी जुटाई जा सकती है. खासकर सारंडा और आसपास के जंगलों में पुराने माओवादी ठिकानों और हथियारों के भंडार से जुड़ी जानकारी जांच एजेंसियों के लिए अहम हो सकती है. कुछ रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि झारखंड पुलिस की टीम उससे पूछताछ करेगी. हालांकि पूछताछ में वास्तव में कौन-कौन सी जानकारी सामने आती है, यह जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा. फिलहाल असीम मंडल की चार दशक लंबी संगठनात्मक भूमिका को देखते हुए उसकी जानकारी सुरक्षा एजेंसियों के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है.
चार दशक का सफर खत्म हुआ, लेकिन कहानी का असली हिस्सा अब शुरू होगा
असीम मंडल का आत्मसमर्पण उसके भूमिगत सफर का अंत जरूर है, लेकिन इससे जुड़े सवाल यहीं खत्म नहीं होते. वह किन लोगों के संपर्क में रहा? झारखंड के जंगलों से बंगाल और ओडिशा तक संगठन का नेटवर्क कैसे चलता था? कौन से ठिकाने लंबे समय तक इस्तेमाल होते रहे? उसके साथ काम करने वाले कितने लोग अब भी सक्रिय हैं? और क्या उसके पास संगठन के ऐसे संपर्कों की जानकारी है, जो अभी सुरक्षा एजेंसियों की पहुंच से बाहर हैं? इन सवालों के जवाब उसकी पूछताछ और आगे की जांच से निकलेंगे. असीम मंडल के लिए चार दशक का भूमिगत सफर अब खत्म हो चुका है, लेकिन उसके पास मौजूद जानकारी माओवादी संगठन की उस कहानी का अगला अध्याय लिख सकती है, जिसकी कई परतें अभी बाकी हैं.




