JPSC-JSSC नियुक्ति रद्द मामले में हाईकोर्ट की सुनवाई, 2700 नियुक्तियों पर कोर्ट ने जताई चिंता
“झारखंड हाईकोर्ट में JPSC-JSSC नियुक्ति रद्द मामले पर सुनवाई हुई. कोर्ट ने करीब 2700 नियुक्तियों को एक साथ रद्द करने पर चिंता जताई और कहा कि सभी नियुक्तियों को गलत नहीं माना जा सकता. फिलहाल नियुक्तियां रद्द करने के सरकारी आदेश पर रोक जारी रहेगी.”

Ranchi: झारखंड में JPSC और JSSC की विभिन्न परीक्षाओं के जरिए हुई नियुक्तियों को राज्य सरकार द्वारा रद्द किए जाने के मामले में शुक्रवार को झारखंड हाईकोर्ट में सुनवाई हुई. जस्टिस दीपक रौशन की अदालत में हुई सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने कोर्ट के निर्देश के अनुसार अपना काउंटर एफिडेविट दाखिल किया. अदालत ने मामले की जांच और हजारों नियुक्तियों को एक साथ रद्द किए जाने के प्रभाव को लेकर कई अहम टिप्पणियां कीं. कोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया सभी नियुक्तियों को गलत नहीं माना जा सकता. अदालत ने जांच की निगरानी के लिए हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जज गौतम कुमार चौधरी को नोडल अधिकारी बनाए जाने का निर्देश दिया. फिलहाल नियुक्तियां रद्द करने के सरकारी आदेश पर लगी रोक जारी रहेगी और अगली सुनवाई 7 अक्टूबर को होगी.
सरकार ने हाईकोर्ट में दाखिल किया काउंटर एफिडेविट
राज्य सरकार की ओर से मामले में हाईकोर्ट के पूर्व निर्देश के तहत काउंटर एफिडेविट दाखिल किया गया. इससे पहले अदालत ने सरकार को अपना जवाब दाखिल करने के लिए 48 घंटे का समय दिया था. सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से नियुक्तियों को रद्द करने के आधार और मामले में चल रही जांच से संबंधित पक्ष अदालत के सामने रखा गया. कोर्ट ने सरकार से यह भी कहा कि परीक्षा और नियुक्ति प्रक्रिया को रद्द करने का आधार स्पष्ट रूप से समराइज कर अदालत के समक्ष रखा जाए. मामले में JPSC की ओर से भी जवाब दाखिल किया गया. याचिकाकर्ताओं की ओर से नियुक्तियों को रद्द किए जाने के सरकारी फैसले को चुनौती दी गई है. उनका कहना है कि पूरी चयन प्रक्रिया को एक साथ प्रभावित करने से उन अभ्यर्थियों और नियुक्त कर्मियों पर भी असर पड़ रहा है, जिनकी नियुक्ति में किसी तरह की अनियमितता सामने नहीं आई है.
2700 नियुक्तियों को एक साथ रद्द करने पर कोर्ट की चिंता
सुनवाई के दौरान अदालत ने करीब 2700 नियुक्तियों को एक साथ रद्द किए जाने के प्रभाव को लेकर चिंता जताई. कोर्ट ने कहा कि किसी परीक्षा से लेकर नियुक्ति की पूरी प्रक्रिया में आमतौर पर दो से तीन साल तक का समय लग सकता है. ऐसे में एक साथ हजारों नियुक्तियों को रद्द करने का सीधा असर उन अधिकारियों और कर्मचारियों पर पड़ सकता है, जो लंबे समय से अपनी सेवाएं दे रहे हैं. अदालत ने प्रथम दृष्टया यह टिप्पणी भी की कि सभी नियुक्तियां 100 प्रतिशत सही नहीं हो सकतीं, लेकिन इसका यह अर्थ भी नहीं है कि सभी नियुक्तियां गलत हैं. कोर्ट ने यह सवाल भी उठाया कि बिना किसी शोकॉज नोटिस के करीब 2700 लोगों को किस आधार पर सेवा से बाहर किया जा सकता है. अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि जांच में यदि किसी व्यक्ति की भूमिका नहीं है तो निर्दोष लोगों को अनावश्यक रूप से परेशान नहीं किया जाना चाहिए.
पुलिस जांच पर कोर्ट ने जताया भरोसा
मामले की जांच को लेकर सुनवाई के दौरान जस्टिस दीपक रौशन की अदालत ने कहा कि फिलहाल इनवेस्टिगेशन पुलिस के द्वारा किया जा रहा है और अदालत को पुलिस की जांच पर पूरा विश्वास है. हालांकि, अदालत ने यह भी संकेत दिया कि इतनी बड़ी संख्या में नियुक्तियों से जुड़े मामले की जांच को निष्पक्ष और समयबद्ध तरीके से आगे बढ़ाना जरूरी है. कोर्ट की ओर से यह भी कहा गया कि जांच जल्द किसी निष्कर्ष तक पहुंचे, लेकिन इस प्रक्रिया में निर्दोष लोगों को परेशानी नहीं होनी चाहिए. अदालत ने परीक्षा और नियुक्ति प्रक्रिया को रद्द करने के आधार को स्पष्ट रूप से सामने रखने को कहा है. इससे यह संकेत मिलता है कि कोर्ट अलग-अलग नियुक्तियों और उनके आधार की परिस्थितियों को भी देखना चाहता है. मामले में जांच जारी है और अगली सुनवाई के दौरान अदालत के सामने जांच की स्थिति और सरकार के कदमों को लेकर आगे की तस्वीर स्पष्ट हो सकती है.
जांच की निगरानी करेंगे रिटायर्ड जज गौतम कुमार चौधरी
हाईकोर्ट ने मामले की जांच की निगरानी के लिए अपने सेवानिवृत्त न्यायाधीश गौतम कुमार चौधरी को नियुक्त करने का निर्देश दिया है. अदालत के अनुसार, जांच की मॉनिटरिंग के लिए स्वतंत्र व्यवस्था होने से प्रक्रिया को निष्पक्ष और समयबद्ध तरीके से आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है. सुनवाई के दौरान अदालत ने स्वतंत्र बॉडी के माध्यम से जांच की निगरानी की आवश्यकता पर भी टिप्पणी की. सेवानिवृत्त जज को मामले में नोडल अधिकारी बनाए जाने का उद्देश्य जांच की प्रगति पर नजर रखना और प्रक्रिया को निर्धारित दिशा में आगे बढ़ाना है. अदालत ने इस दौरान यह भी स्पष्ट किया कि जांच के दौरान ऐसे लोगों को अनावश्यक परेशानी नहीं होनी चाहिए, जिनके खिलाफ किसी तरह की अनियमितता सामने नहीं आती है. अब मामले में जांच की प्रगति और मॉनिटरिंग से जुड़ी जानकारी अगली सुनवाई में महत्वपूर्ण हो सकती है.
नियुक्तियां रद्द करने के सरकारी आदेश पर रोक जारी
हाईकोर्ट ने फिलहाल नियुक्तियां रद्द करने के राज्य सरकार के आदेश पर लगी रोक को बरकरार रखा है. इसका मतलब है कि मामले में अंतिम निर्णय होने तक प्रभावित नियुक्त कर्मियों और अधिकारियों को फिलहाल अदालत से मिली राहत जारी रहेगी. JPSC और JSSC की अलग-अलग परीक्षाओं के माध्यम से हुई नियुक्तियों को राज्य सरकार द्वारा रद्द किए जाने के बाद प्रभावित अभ्यर्थियों और कर्मचारियों ने हाईकोर्ट में याचिकाएं दाखिल की थीं. इन याचिकाओं में सरकार के फैसले को चुनौती दी गई है. सुनवाई के दौरान अदालत ने नियुक्तियों को एक साथ रद्द करने के व्यापक प्रभाव पर भी ध्यान दिया. कोर्ट ने कहा कि चयन प्रक्रिया पूरी होने में वर्षों का समय लग सकता है और ऐसे में हजारों नियुक्तियों को एक साथ प्रभावित करने का असर गंभीर हो सकता है. हालांकि, मामले में अंतिम फैसला अभी नहीं आया है और नियुक्तियों की वैधता से जुड़े सभी पहलुओं पर आगे सुनवाई जारी रहेगी.
इंटरवेनर की IA पर अदालत ने नहीं दी अनुमति
सुनवाई के दौरान मामले में हस्तक्षेप के लिए दाखिल की गई इंटरवेनर की IA को अदालत ने स्वीकार नहीं किया. कोर्ट का मानना था कि इस तरह के हस्तक्षेप से मामले की सुनवाई और आगे की प्रक्रिया में अतिरिक्त समय लग सकता है. हालांकि, इंटरवेनर की ओर से पेश अधिवक्ता को अपना पक्ष रखने की अनुमति दी गई. सुनवाई में राज्य सरकार, JPSC और याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने अदालत के सामने अपनी-अपनी दलीलें रखीं. JPSC की ओर से भी मामले में जवाब दाखिल किया गया. अदालत अब सरकार और अन्य पक्षों की ओर से रखे गए तथ्यों तथा जांच की प्रगति को देखते हुए मामले पर आगे सुनवाई करेगी. फिलहाल अदालत ने नियुक्तियां रद्द करने के आदेश पर लगी रोक को जारी रखा है. मामले की अगली सुनवाई 7 अक्टूबर को निर्धारित की गई है, जिसमें जांच और नियुक्तियों से जुड़े मुद्दों पर आगे की दिशा स्पष्ट हो सकती है.


