आंखों में आंसू थे, सामने पाकिस्तान था… झारखंड की बिनिमा ने दागा गोल, फिर बनीं एशिया चैंपियन
“झारखंड की हॉकी खिलाड़ी बिनिमा धान ने आर्थिक मुश्किलों से निकलकर भारतीय जूनियर महिला हॉकी टीम तक का सफर तय किया. कभी हॉकी खेलने जाने के लिए ऑटो का किराया जुटाना भी मुश्किल था, लेकिन लगातार मेहनत और खेलो इंडिया से मिले अवसरों के बाद वह अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचीं.”

Ranchi: झारखंड की हॉकी खिलाड़ी बिनिमा धान की कहानी उस संघर्ष की है, जहां मंजिल से पहले रास्ते की मुश्किलें बड़ी थीं. कभी हॉकी खेलने जाने के लिए ऑटो का किराया जुटाना मुश्किल होता था. फिर वही बिनिमा भारतीय जूनियर महिला हॉकी टीम तक पहुंचीं और चीन में एशिया कप चैंपियन बनीं. पाकिस्तान के खिलाफ क्वार्टर फाइनल से पहले पुराना संघर्ष याद कर बिनिमा भावुक हो गईं. आंखों से आंसू निकल आए, लेकिन मैदान पर उतरते ही तस्वीर बदल गई. भारत ने पाकिस्तान को 19-0 से हराया और बिनिमा ने भी गोल दागा. इसके बाद भारत ने फाइनल में मेजबान चीन को 1-0 से हराकर लगातार तीसरी बार एएचएफ महिला जूनियर एशिया कप का खिताब जीत लिया. इस पूरी कहानी में बिनिमा का सफर सबसे अलग नजर आता है.
जब हॉकी तक पहुंचना ही सबसे बड़ी चुनौती थी
बिनिमा के लिए हॉकी का सफर किसी आसान मैदान से शुरू नहीं हुआ. उनके सामने शुरुआत में ही ऐसी आर्थिक मुश्किलें थीं, जिन्हें आज उनकी अंतरराष्ट्रीय सफलता के सामने रखकर देखना जरूरी है. हॉकी खेलने के लिए आने-जाने का ऑटो किराया जुटाना तक मुश्किल था. लेकिन खेल को लेकर उनका सपना इतना मजबूत था कि इन परेशानियों ने उन्हें पीछे नहीं किया. वह लगातार खेलती रहीं और आगे बढ़ती गईं. यही वह दौर था जिसने उनके भीतर संघर्ष करने की आदत पैदा की. आज जब वह भारतीय टीम की जर्सी पहनकर अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में उतरती हैं, तो उस पुराने दौर की तस्वीर बिल्कुल अलग दिखाई देती है. एक तरफ कभी ऑटो के किराए की चिंता थी, दूसरी तरफ अब चीन के मैदान पर भारत का प्रतिनिधित्व करने का मौका. बिनिमा की कहानी में यही बदलाव सबसे बड़ा पड़ाव है.
खेलो इंडिया से खुला आगे बढ़ने का रास्ता
बिनिमा का सफर धीरे-धीरे उन्हें उस मुकाम तक लेकर गया, जहां राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने का मौका मिला. खेलो इंडिया से जुड़े सफर ने उनके लिए आगे के रास्ते खोले और हॉकी में आगे बढ़ने का अवसर मिला. छोटी शुरुआत से निकलकर वह जूनियर भारतीय टीम तक पहुंचीं. यह बदलाव एक दिन में नहीं आया. इसके पीछे लगातार अभ्यास, प्रतियोगिताओं में प्रदर्शन और टीम में अपनी जगह बनाने की प्रक्रिया रही. बिनिमा के लिए खेल अब सिर्फ स्थानीय मैदान तक सीमित नहीं था. उनका नाम भारतीय हॉकी के जूनियर स्तर पर पहुंच चुका था. इसके बाद चीन में एएचएफ महिला जूनियर एशिया कप में भारतीय टीम का हिस्सा बनना उनके करियर का बड़ा मौका बना. जिस खिलाड़ी के लिए कभी मैदान तक पहुंचने का खर्च चुनौती था, वही खिलाड़ी अब देश के लिए अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट खेल रही थी.
पाकिस्तान के मुकाबले से पहले क्यों भर आईं आंखें?
पाकिस्तान के खिलाफ क्वार्टर फाइनल से पहले बिनिमा भावुक हो गईं. मुकाबले के दौरान नहीं, बल्कि उससे पहले उनके जेहन में पुराना संघर्ष लौट आया था. वह उन दिनों को याद कर रही थीं जब हॉकी खेलने के लिए आने-जाने तक की परेशानी होती थी. टीम के कोच ने खिलाड़ियों से कहा कि उन्हें मुकाबले पर पूरा ध्यान देना है और अपने खेल के जरिए अगले दौर में जगह बनानी है. ऐसे समय में बिनिमा के लिए भावनाएं संभालना आसान नहीं था. उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े. लेकिन इसके बाद मैदान पर उन्हें अपनी भावनाओं को खेल में बदलना था. पाकिस्तान के खिलाफ मुकाबला शुरू हुआ तो भारतीय टीम ने शुरुआत से दबाव बनाया और अंत तक स्कोरबोर्ड पर एकतरफा तस्वीर दिखाई दी. बिनिमा ने भी इस मुकाबले में भारत के लिए गोल किया.
19-0 का स्कोर, पाकिस्तान के खिलाफ भारत का तूफानी प्रदर्शन
पाकिस्तान के खिलाफ क्वार्टर फाइनल में भारत ने 19-0 से जीत दर्ज की. मुकाबले में भारतीय टीम का दबदबा ऐसा रहा कि पाकिस्तान पूरे मैच में वापसी का मौका नहीं बना सका. बिनिमा ने भी इस बड़ी जीत में गोल करके अपना योगदान दिया. यह वही मुकाबला था, जिसके पहले वह अपने संघर्ष को याद करके रोई थीं. यानी कुछ देर पहले तक जिन यादों ने उन्हें भावुक कर दिया था, उसी मुकाबले में उन्होंने मैदान पर अपना योगदान दिया. इस टूर्नामेंट में यह बिनिमा का पहला प्रभावशाली प्रदर्शन नहीं था. इससे पहले मलेशिया के खिलाफ भारत की 11-1 की जीत में भी उन्होंने गोल किया था. इस तरह टूर्नामेंट आगे बढ़ने के साथ बिनिमा टीम के अभियान में अपनी मौजूदगी दर्ज कराती रहीं और भारत लगातार अगले मुकाबलों की ओर बढ़ता गया.
फाइनल में चीन को हराकर भारत ने रचा इतिहास
सेमीफाइनल के बाद भारतीय जूनियर महिला हॉकी टीम खिताबी मुकाबले में पहुंची, जहां सामने मेजबान चीन था. चीन में खेले गए एएचएफ महिला जूनियर एशिया कप 2026 के फाइनल में भारत और चीन के बीच मुकाबला हुआ. भारत ने 1-0 से जीत दर्ज कर लगातार तीसरी बार खिताब अपने नाम किया. इस टीम का हिस्सा बिनिमा धान भी थीं. उनके साथ झारखंड की रौशनी आईंद और पार्वती टोपनो भी भारतीय टीम में शामिल थीं. यानी झारखंड की तीन खिलाड़ियों ने उस भारतीय टीम के साथ एशिया कप का खिताब जीता, जिसने फाइनल में मेजबान टीम को हराया. बिनिमा के लिए टूर्नामेंट का सफर खास रहा—मलेशिया के खिलाफ गोल, पाकिस्तान के खिलाफ गोल और फिर चैंपियन टीम का हिस्सा बनने तक उनका सफर पहुंचा.
अब रेलवे की नौकरी, डीएसपी बनने के सवाल पर भी जवाब
हॉकी के मैदान पर सफलता के साथ बिनिमा ने अपने करियर में नौकरी को भी जगह दी है. वह फिलहाल रेलवे में नौकरी कर रही हैं. उनसे जब पूछा गया कि अगर झारखंड में डीएसपी बनने का अवसर मिलता है तो क्या वह यह जिम्मेदारी संभालना चाहेंगी, तो उन्होंने अपनी प्राथमिकता स्पष्ट की. उनका कहना है कि उन्हें रेलवे की नौकरी पसंद है और फिलहाल वह वहीं रहना चाहती हैं. इसका मतलब यह है कि अंतरराष्ट्रीय हॉकी में पहचान बनाने के बाद भी उनका करियर सिर्फ खेल तक सीमित नहीं है. रेलवे की नौकरी उनके वर्तमान जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है. दूसरी तरफ भारतीय हॉकी टीम के साथ एशिया कप जीतना उनके खेल करियर की बड़ी उपलब्धि बन चुका है. दोनों रास्ते अब उनकी कहानी का हिस्सा हैं—एक तरफ मैदान और दूसरी तरफ नौकरी.
झारखंड की तीन बेटियां, एशिया कप की चैंपियन टीम
चीन में खिताब जीतने वाली भारतीय जूनियर महिला हॉकी टीम में झारखंड की बिनिमा धान, रौशनी आईंद और पार्वती टोपनो शामिल थीं. यह तथ्य बिनिमा की व्यक्तिगत कहानी को झारखंड की हॉकी से भी जोड़ता है. राज्य से निकलने वाली खिलाड़ियों के लिए अंतरराष्ट्रीय टीम तक पहुंचना अपने आप में बड़ा पड़ाव है. बिनिमा के मामले में यह सफर आर्थिक मुश्किलों से शुरू होकर भारतीय टीम और फिर एशिया कप की चैंपियन टीम तक पहुंचा. खास बात यह भी रही कि टूर्नामेंट के दौरान उनका नाम गोल करने वाली खिलाड़ियों में आया. मलेशिया के खिलाफ उन्होंने गोल किया और पाकिस्तान के खिलाफ भी स्कोर किया. अंत में भारत ने चीन को हराकर खिताब जीता. इस तरह बिनिमा के लिए यह सिर्फ एक टूर्नामेंट नहीं रहा, बल्कि उनके पुराने संघर्ष से लेकर अंतरराष्ट्रीय सफलता तक के सफर का सबसे बड़ा पड़ाव बन गया.



