मिसाइल हमले में बच्चों की मौत, ईरान के अखबार ने ट्रंप को दिखाई तस्वीरें: “इनकी आंखों में देखो”
ईरान के दक्षिणी शहर Minab में एक लड़कियों के स्कूल पर हुए भीषण मिसाइल हमले को लेकर विवाद गहरा गया है. ईरान के अंग्रेजी अखबार Tehran Times ने इस घटना पर अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump के बयानों की कड़ी आलोचना की है.

ईरान-अमेरिका तनाव के बीच एक तस्वीर ने पूरी दुनिया का ध्यान खींच लिया है. ईरान के सरकारी समर्थन वाले अंग्रेजी अखबार Tehran Times ने अपने फ्रंट पेज पर उन बच्चों की तस्वीरें प्रकाशित की हैं, जिनकी मौत दक्षिणी शहर Minab के एक प्राथमिक स्कूल पर हुए मिसाइल हमले में हुई थी. तस्वीरों के ऊपर बड़े अक्षरों में लिखा था—“Trump, look them in the eyes”, यानी “ट्रंप, इनकी आंखों में देखो.” अखबार ने इस हेडलाइन के जरिए सीधे तौर पर अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump को निशाने पर लिया है. रिपोर्टों के मुताबिक इस हमले में बड़ी संख्या में स्कूली बच्चों की जान चली गई. इसी मुद्दे को लेकर अखबार ने अमेरिका पर गंभीर सवाल उठाए हैं और युद्ध के दौरान नागरिकों की मौत को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी है.
तेहरान टाइम्स ने क्या लिखा है, पढ़िए हिंदी में
“इनकी आंखों में देखो ट्रंप”
तेहरान: अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump द्वारा ईरान पर जारी सैन्य हमले को लेकर दिए गए बयान बार-बार झूठे दावों, अत्याचारों की जिम्मेदारी से बचने की कोशिश और कूटनीतिक समाधान को खुले तौर पर ठुकराने के आरोपों से घिरे हुए हैं.
हमले के आठवें दिन Air Force One से पत्रकारों से बातचीत करते हुए ट्रंप ने दक्षिणी ईरान के Minab में एक लड़कियों के स्कूल पर हुए भीषण हमले से जुड़े सवालों से बचते हुए कई अपुष्ट दावे दोहराए.
ट्रंप के विवादित बयान का मुख्य आधार यह दावा था कि मिनाब में हुए स्कूल नरसंहार के लिए खुद ईरान जिम्मेदार है. हालांकि लगातार सामने आ रहे सबूत इस ओर इशारा करते हैं कि यह हमला अमेरिका के नेतृत्व वाली बमबारी से जुड़ा हो सकता है. इसके बावजूद ट्रंप ने बार-बार यही दावा दोहराया, जिसे आलोचक साफ तौर पर झूठा बता रहे हैं.
इस हमले में लगभग 170 प्राथमिक स्कूल की छात्राओं की मौत हो गई थी. यह घटना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक निंदा का कारण बनी. विवाद को और बढ़ाते हुए अमेरिकी रक्षा मंत्री ने भी ट्रंप के दावे का समर्थन करते हुए कहा कि “नागरिकों को निशाना बनाने वाला केवल ईरान ही है.” यह बयान व्हाइट हाउस की पहले की सावधानीपूर्ण प्रतिक्रिया से बिल्कुल अलग माना जा रहा है और इस हमले के नैतिक तथा कानूनी पहलुओं को और गंभीर बना देता है.
महत्वपूर्ण बात यह है कि आठ प्रमुख विदेशी मीडिया संस्थानों ने स्वतंत्र रूप से इस हमले में अमेरिका की संभावित भूमिका पर रिपोर्ट प्रकाशित की है.
CNN ने रिपोर्ट दी कि हमले से हुई भारी तबाही ऐसे नुकसान से मेल खाती है जो निर्देशित हथियारों के इस्तेमाल से होता है और इसके आधार पर अमेरिका की भूमिका की संभावना जताई गई.
The New York Times ने स्पष्ट रूप से लिखा कि मिनाब के लड़कियों के स्कूल पर अमेरिकी हमले में 175 से अधिक लोगों की मौत हुई.
Reuters ने अमेरिकी सैन्य अधिकारियों की जांच के आधार पर कहा कि इस मामले में अमेरिका की ओर से संभावित इनकार की उम्मीद की जा सकती है.
इसी तरह The Wall Street Journal ने अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) बलों को जिम्मेदार बताया, जबकि Middle East Eye ने रिपोर्ट दी कि स्कूल पर दो बार हमला हुआ, जिससे बचे हुए लोगों और बचावकर्मियों की भी मौत हो गई.
Al Jazeera ने इस घटना को “संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा किया गया अपराध” बताया.
इन प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों की रिपोर्टों से सामने आ रहे तथ्यों का यह मेल इस दावे को मजबूत करता है कि मिनाब की त्रासदी में कम से कम अमेरिका की भूमिका से इनकार करना मुश्किल है और यह ट्रंप के उस दावे को चुनौती देता है जिसमें उन्होंने ईरान को जिम्मेदार बताया था.
कुर्द हस्तक्षेप को खारिज करना
आक्रामक बयानबाजी के अपने पैटर्न को जारी रखते हुए ट्रंप ने ईरान में संभावित कुर्द हस्तक्षेप की संभावना को भी खारिज कर दिया. उन्होंने कहा कि अमेरिका के कुर्दों के साथ “बहुत अच्छे संबंध” हैं, लेकिन युद्ध को और बढ़ने से रोकने के लिए किसी भी तरह की भागीदारी से बचना जरूरी है.
यह रुख इस बात की ओर इशारा करता है कि अमेरिका ईरान के खिलाफ किसी संभावित संतुलन शक्ति को मजबूत करने में खास दिलचस्पी नहीं रखता और उसकी रणनीति सीधे अमेरिकी सैन्य कार्रवाई पर केंद्रित हो सकती है.
कुर्द भागीदारी को पूरी तरह खारिज करना इस बात का संकेत देता है कि प्राथमिकता युद्ध की कहानी पर नियंत्रण बनाए रखने और संभावित जटिलताओं से बचने की है, न कि सहयोगी बलों के वास्तविक हितों की चिंता.
ट्रंप ने कहा कि “कुर्दों की भागीदारी के बिना ही यह युद्ध काफी जटिल है.”
उन्होंने यह भी कहा कि ईरान का राजनीतिक नक्शा शायद नहीं बदलेगा, जिसे कई लोग ईरान की मजबूत राष्ट्रीय पहचान और प्रतिरोध के इतिहास की समझ की कमी के रूप में देखते हैं.
रूस, पेट्रोल की कीमतें और जीत की विकृत तस्वीर
मिनाब घटना के अलावा ट्रंप ने संघर्ष को लेकर कई अन्य अपुष्ट दावे भी किए.
उन्होंने रूस द्वारा ईरान को खुफिया सहायता दिए जाने की आशंकाओं को खारिज करते हुए कहा कि उन्हें ऐसे किसी सहयोग का कोई संकेत नहीं मिला है. उन्होंने यह भी कहा कि अगर रूस से कोई मदद मिली भी हो तो वह ईरान के लिए ज्यादा उपयोगी नहीं रही.
तेल की बढ़ती कीमतों को लेकर उन्होंने चिंता को खारिज करते हुए कहा कि यह केवल अस्थायी है और जल्द ही कीमतें कम हो जाएंगी. यह बयान वैश्विक बाजार की अस्थिरता और भू-राजनीतिक दबावों की वास्तविकता से अलग माना जा रहा है.
साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि अगर 47 साल पहले कार्रवाई की गई होती तो शायद आज की स्थिति पैदा ही नहीं होती. आलोचकों का कहना है कि यह बयान मौजूदा संघर्ष की जिम्मेदारी से ध्यान हटाने की कोशिश है.
घायल सैनिकों का स्वागत करते हुए और संभावित जमीनी हमले को लेकर अस्पष्ट संकेत देते हुए ट्रंप ने हिंसा के और बढ़ने की संभावना को भी खुला रखा. जब उनसे जमीनी हमले के बारे में पूछा गया तो उन्होंने सीधा जवाब देने से बचते हुए कहा कि अगर “मजबूत कारण” होगा तो इस विकल्प पर विचार किया जा सकता है.
उन्होंने ईरान के तटीय तेल प्रतिष्ठानों पर संभावित हमलों को लेकर भी अटकलों को खारिज किया, लेकिन उनके बयान से गुप्त सैन्य कार्रवाई की संभावना के संकेत मिलते हैं.
“बिना शर्त आत्मसमर्पण” की मांग और बातचीत से इनकार
ट्रंप की तीखी बयानबाजी के केंद्र में “अनकंडीशनल सरेंडर” यानी बिना शर्त आत्मसमर्पण की मांग है. उन्होंने इसे किसी बातचीत के जरिए समाधान के रूप में नहीं बल्कि ईरान की युद्ध क्षमता को पूरी तरह खत्म करने के रूप में पेश किया.
यह रुख यह दर्शाता है कि वह सार्थक बातचीत के लिए तैयार नहीं हैं और ईरानी जनता की मूल चिंताओं को भी नजरअंदाज कर रहे हैं.
ट्रंप का यह दावा कि ईरानी “मामला सुलझाना चाहते हैं” बातचीत की प्रक्रिया की बहुत सीमित समझ को दर्शाता है और कूटनीतिक समझौते की संभावना को नजरअंदाज करता है.
उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका “भारी अंतर से युद्ध जीत रहा है”, जबकि कई विश्लेषकों का कहना है कि ईरान का प्रतिरोध अभी भी मजबूत बना हुआ है.
ट्रंप ने यह भी कहा कि यह संघर्ष “जब तक जरूरी होगा तब तक जारी रहेगा.” आलोचकों का कहना है कि यह बयान कूटनीतिक समाधान से दूरी और युद्ध को लंबा खींचने की मानसिकता को दर्शाता है.
जल शुद्धिकरण संयंत्र पर हमला
एक पत्रकार ने जब ईरानी अधिकारियों के उस आरोप के बारे में पूछा जिसमें अमेरिका पर जल शुद्धिकरण संयंत्र पर हमला करने का आरोप लगाया गया था, तो ट्रंप ने कहा कि वह ऐसे ठिकानों पर और हमलों का रास्ता भी खोल सकते हैं.
अमेरिकी राष्ट्रपति ने मानवाधिकारों का हवाला देते हुए कहा,
“7 अक्टूबर की घटनाओं को देखिए. पिछले 47 वर्षों में जो कुछ हुआ उसे देखिए. मुझे जल शुद्धिकरण संयंत्र के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है, लेकिन अगर वे इसकी शिकायत करते हैं तो हम भी मानवाधिकारों की बात करेंगे.”
संयुक्त राज्य अमेरिका और इजरायल द्वारा इस्लामी गणराज्य ईरान के खिलाफ की गई संयुक्त सैन्य कार्रवाई उस समय हुई जब क्षेत्र के कई देशों की मध्यस्थता में अप्रत्यक्ष वार्ताएं चल रही थीं.
विश्लेषकों का मानना है कि यह कार्रवाई दिखाती है कि अमेरिका व्यवहार में संवाद, भरोसा निर्माण और शांतिपूर्ण समाधान की अपनी प्रतिबद्धता को पूरा नहीं कर रहा है और राजनीतिक दबाव के साधन के रूप में सैन्य विकल्प का इस्तेमाल जारी रखे हुए है.
ईरान पर हमले को लेकर ट्रंप के बयान झूठे दावों, स्वयं के पक्ष में तर्क गढ़ने और अंतरराष्ट्रीय कानून तथा कूटनीतिक समाधान की अनदेखी के एक चिंताजनक पैटर्न को दर्शाते हैं.

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