PESA नियमावली के खिलाफ बीजेपी का हमला, बाबूलाल मरांडी बोले– आदिवासियों को गुमराह कर रही है सरकार
झारखंड में लागू PESA नियमावली को लेकर सियासत तेज हो गई है. बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने इसे आदिवासी समाज के अधिकारों के खिलाफ बताते हुए सरकार पर लोगों को गुमराह करने का आरोप लगाया है.


Samir Kumar
रांची: झारखंड में लागू की गई PESA नियमावली को लेकर सियासत तेज हो गई है. झारखंड बीजेपी के अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने इसे आदिवासी समाज के अधिकारों के खिलाफ बताते हुए सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं. रांची में आयोजित एक प्रेस वार्ता में बाबूलाल मरांडी ने कहा कि राज्य सरकार PESA कानून की आड़ में लोगों को भ्रमित कर रही है.
‘PESA के नाम पर भ्रम फैलाया जा रहा है’
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान बाबूलाल मरांडी ने कहा कि PESA कानून की मूल भावना को कमजोर किया जा रहा है. उन्होंने आरोप लगाया कि नियमावली बनाते समय न तो ग्रामसभा की सही भागीदारी सुनिश्चित की गई और न ही आदिवासी समाज से व्यापक सलाह ली गई. मरांडी ने कहा, “यह नियमावली आदिवासियों को अधिकार देने के बजाय उन्हें गुमराह करने का जरिया बन गई है.”
गांव-गांव जाकर लोगों को जागरूक करेगी बीजेपी
बाबूलाल मरांडी ने ऐलान किया कि बीजेपी अब इस मुद्दे पर गांव-गांव जाकर अभियान चलाएगी. पार्टी कार्यकर्ता और नेता PESA नियमावली की खामियों को आम लोगों तक पहुंचाएंगे और उन्हें सही जानकारी देंगे. उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज को यह समझना जरूरी है कि यह नियमावली उनके हित में है या उनके अधिकारों को सीमित कर रही है.
धर्मांतरण को लेकर भी सरकार पर उठाए सवाल
प्रेस वार्ता के दौरान बाबूलाल मरांडी ने अप्रत्यक्ष रूप से धर्मांतरण के मुद्दे पर भी सरकार को घेरा. उन्होंने कहा कि मौजूदा PESA नियमावली में ऐसे प्रावधान शामिल किए गए हैं, जिनका लाभ उन लोगों को भी मिलेगा, जिन्होंने आदिवासी समाज की पारंपरिक आस्था, रीति-रिवाज और सामाजिक प्रथाओं को छोड़ दिया है. मरांडी ने इसे आदिवासी संस्कृति और पहचान के खिलाफ बताते हुए कहा कि PESA कानून का उद्देश्य उन समुदायों को सशक्त करना था, जो आज भी अपनी परंपराओं और ग्रामसभा व्यवस्था से जुड़े हैं, न कि उन लोगों को, जिन्होंने इन तथ्यों और प्रथाओं से खुद को अलग कर लिया है.
PESA नियमावली पर बढ़ता सियासी टकराव
गौरतलब है कि PESA नियमावली को लेकर झारखंड में पहले से ही विवाद बना हुआ है. विपक्ष लगातार इसे आदिवासी विरोधी बता रहा है, जबकि सरकार इसे ग्रामसभा को सशक्त बनाने की पहल बता रही है. बाबूलाल मरांडी के इस बयान के बाद राज्य की राजनीति में टकराव और तेज होने के आसार हैं.

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