दो दिन में दो फेसबुक पोस्ट, मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने मचाया सियासी गदर, प्रदेश नेतृत्व पर बड़े सवाल
झारखंड कांग्रेस के भीतर जारी खींचतान अब खुलकर सामने आने लगी है. राज्य सरकार में मंत्री Radhakrishna Kishore ने लगातार दो दिन फेसबुक पोस्ट के जरिए पार्टी नेतृत्व और संगठन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए हैं.

Ranchi: झारखंड कांग्रेस के भीतर जारी खींचतान अब खुलकर सामने आने लगी है. राज्य सरकार में मंत्री Radhakrishna Kishore ने लगातार दो दिन फेसबुक पोस्ट के जरिए पार्टी नेतृत्व और संगठन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए हैं. खास बात यह है कि यह बयान किसी बाहरी नेता का नहीं, बल्कि सरकार के अंदर बैठे वरिष्ठ मंत्री का है. पहले पोस्ट में उन्होंने संगठन के फैसलों में असमानता का मुद्दा उठाया था, तो वहीं दूसरे पोस्ट में उन्होंने सीधे तौर पर प्रदेश कांग्रेस की कार्यप्रणाली, मुद्दों पर चुप्पी और प्रतिनिधित्व पर सवाल खड़े किए. इस पूरे घटनाक्रम को पार्टी के भीतर बढ़ते असंतोष और संभावित सियासी बदलाव के संकेत के रूप में देखा जा रहा है.
लगातार दो फेसबुक पोस्ट से गरमाई सियासत
झारखंड की राजनीति में उस वक्त हलचल तेज हो गई, जब Radhakrishna Kishore ने दो दिन के भीतर फेसबुक पर अपनी बात खुलकर रखी. आमतौर पर इस तरह की असहमति पार्टी के अंदर ही सीमित रहती है, लेकिन सार्वजनिक मंच पर आने के बाद यह अब बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया है. विश्लेषकों का मानना है कि जब सत्ता में बैठे नेता इस तरह खुलकर बोलते हैं, तो यह सिर्फ व्यक्तिगत राय नहीं, बल्कि अंदरूनी असंतोष का संकेत होता है.
पहला पोस्ट: फैसलों में दोहरे मापदंड पर सवाल
पहले फेसबुक पोस्ट में मंत्री ने संगठन की कार्यशैली पर सीधा हमला बोला. उन्होंने कहा कि पार्टी के भीतर “एक आंख में सुरमा और दूसरे में काजल” जैसी स्थिति बन गई है. उन्होंने उदाहरण देते हुए पूर्व मंत्री योगेंद्र साव के निष्कासन का जिक्र किया और पूछा कि आखिर उनका दोष क्या था. इसके साथ ही उन्होंने रमा खलको को संगठन में जिम्मेदारी दिए जाने पर भी सवाल उठाया. इस पोस्ट के जरिए उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की कि पार्टी के भीतर फैसले एक समान तरीके से नहीं लिए जा रहे हैं, जिससे कार्यकर्ताओं में असंतोष बढ़ सकता है.
दूसरा पोस्ट: संगठन, मुद्दों और नेतृत्व पर बड़ा हमला
दूसरे दिन किए गए फेसबुक पोस्ट में Radhakrishna Kishore का रुख और ज्यादा आक्रामक दिखा. उन्होंने साफ कहा कि प्रदेश कांग्रेस कमिटी की संख्या 314 से बढ़ाकर 628 कर देने से भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा, अगर पार्टी जमीनी मुद्दों पर सक्रिय नहीं होती.
इस पोस्ट में उन्होंने एक-एक कर कई बड़े मुद्दे उठाए—
- महिला आरक्षण जैसे राष्ट्रीय मुद्दे को राज्य स्तर पर प्रभावी तरीके से नहीं उठाया गया
- JTET से मगही और भोजपुरी भाषाओं को हटाने पर पार्टी नेतृत्व चुप रहा
- अनुसूचित जाति से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर कोई ठोस पहल नहीं दिखी
- हजारीबाग की घटनाओं पर संगठन की प्रतिक्रिया कमजोर रही
- अल्पसंख्यकों से जुड़े मामलों पर भी सक्रियता नजर नहीं आई
इसके अलावा उन्होंने संगठन में प्रतिनिधित्व पर भी सवाल उठाया और पूछा कि दलित, पिछड़े, आदिवासी और अल्पसंख्यक वर्गों को कमिटी में कितना स्थान दिया गया है. सबसे अहम बात— उन्होंने यह भी कहा कि अगर उनके द्वारा उठाए गए मुद्दों को पार्टी विरोधी माना जाता है, तो वह किसी भी निर्णय को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं. इसे सीधे तौर पर नेतृत्व को खुली चुनौती के रूप में देखा जा रहा है.
क्या यह असंतोष व्यक्तिगत है या व्यापक?
इस पूरे घटनाक्रम को सिर्फ एक नेता की नाराजगी के तौर पर देखना आसान होगा, लेकिन इसके संकेत इससे कहीं बड़े हैं. लगातार दो दिन सार्वजनिक पोस्ट के जरिए सवाल उठाना यह दर्शाता है कि संगठन के भीतर कुछ गंभीर मुद्दे हैं, जिन पर खुलकर चर्चा नहीं हो पा रही है. ऐसे मामलों में अक्सर यह देखा गया है कि एक आवाज के बाद अन्य नेता भी अपनी बात रखने लगते हैं, जिससे मामला और बड़ा रूप ले सकता है.
चुनावी माहौल और बढ़ता दबाव
इस घटनाक्रम का समय भी महत्वपूर्ण है. देशभर में बदलते राजनीतिक समीकरण और चुनावी माहौल के बीच इस तरह के बयान सामने आना दबाव की राजनीति का संकेत माना जा रहा है. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि चुनावी नतीजों के बाद पार्टियों के भीतर आत्ममंथन शुरू होता है, और उसी दौरान नेतृत्व पर सवाल भी उठते हैं.
संगठन में बदलाव या बढ़ेगी टकराव की स्थिति
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि पार्टी नेतृत्व इस मामले को कैसे देखता है. क्या इसे अनुशासनहीनता माना जाएगा, या फिर इसे सुधार के संकेत के तौर पर लिया जाएगा? अगर इस तरह के बयान आगे भी आते रहे, तो यह झारखंड कांग्रेस के भीतर बड़े बदलाव या फिर खुले टकराव की स्थिति पैदा कर सकता है. फिलहाल इतना तय है कि झारखंड कांग्रेस के अंदर की हलचल अब खुलकर सामने आ चुकी है, और आने वाले दिनों में इसका असर राज्य की राजनीति पर साफ दिखाई दे सकता है.

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