झारखंड विधानसभा में मीडिया पर बैरिकेड, पत्रकारों का कवरेज बायकॉट, नए नियमों से रिपोर्टिंग पर बड़ा संकट
झारखंड विधानसभा के नए सुरक्षा नियमों को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है. जिससे पत्रकारों ने कवरेज का बहिष्कार कर दिया. पत्रकारों का आरोप है कि हर सत्र में नए नियम बनाकर मीडियाकर्मियों को परेशान किया जाता है. विरोध के बाद प्रबंधन ने नरमी दिखाई, लेकिन नियमों पर विवाद बरकरार है.

झारखंड विधानसभा में मीडिया के साथ हो रहा व्यवहार एक बार फिर सवालों के घेरे में है. लोकतंत्र के इस सबसे महत्वपूर्ण संस्थान में पारदर्शिता और जवाबदेही की जगह अगर नियमों की आड़ लेकर पत्रकारों को हाशिये पर धकेला जाएगा, तो यह सिर्फ मीडिया का नहीं बल्कि जनता के अधिकारों का भी अपमान है. बुधवार को विधानसभा सत्र की शुरुआत के साथ जो दृश्य सामने आया, उसने इसी चिंता को और गहरा कर दिया.
जैसे ही मीडियाकर्मी विधानसभा पहुंचे, मुख्य द्वार पर लगे बैरिकेड ने सभी को हैरान कर दिया. पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था कि सीढ़ियों के पास इस तरह से रोक लगा दी जाए. परंपरा यह रही है कि विधायक और मंत्री सीढ़ियों से बाहर आते थे और वहीं पत्रकार उनसे सवाल पूछते थे, बाइट लेते थे. इस प्रक्रिया में थोड़ी बहुत अव्यवस्था जरूर होती थी, लेकिन न तो कभी विधायकों ने और न ही मंत्रियों ने इस पर गंभीर आपत्ति जताई. अब अचानक इसे “अव्यवस्था” बताकर मीडिया को अलग कर देना कई सवाल खड़े करता है.
विधानसभा प्रबंधन का तर्क है कि मीडिया को अब सामने बने पोडियम पर ही बाइट लेनी होगी. लेकिन यह तर्क व्यवहारिक नहीं है. सदन में 81 विधायक हैं—क्या सभी पोडियम तक आएंगे? क्या सभी मंत्री मीडिया से बातचीत करेंगे? जाहिर है ऐसा नहीं होगा, और इसका सीधा मतलब है कि कई महत्वपूर्ण आवाजें जनता तक नहीं पहुंच पाएंगी. यानी नियमों के नाम पर कवरेज सीमित करने की कोशिश साफ दिखती है.
इसी मनमानी के खिलाफ बुधवार को मीडियाकर्मियों ने कवरेज का बहिष्कार किया. पूरा दिन विधानसभा के बाहर रहकर उन्होंने न किसी मंत्री से बातचीत की और न ही किसी विधायक का इंटरव्यू लिया. यह विरोध सिर्फ बैरिकेड का नहीं था, बल्कि उस सोच का था जो मीडिया को नियंत्रित करने की कोशिश करती है. पीआरओ द्वारा समझाने की कोशिश की गई, लेकिन पत्रकार अपने रुख पर अड़े रहे. आखिरकार प्रबंधन को नरमी दिखानी पड़ी—यह बताता है कि दबाव पड़ने पर नियम बदले जा सकते हैं, तो फिर पहले ऐसे फैसले क्यों लिए जाते हैं?
मामला सिर्फ बैरिकेड का नहीं है. हर सत्र से पहले पास वितरण को लेकर भी वही पुरानी “पिक एंड चूज” नीति लागू होती है. बड़े अखबारों और चैनलों को आसानी से पास मिल जाता है, लेकिन यूट्यूब चैनल और वेब पोर्टल्स को संदेह की नजर से देखा जाता है. पास देने का आधार कंटेंट की गुणवत्ता या दर्शकों की संख्या नहीं, बल्कि यह होता है कि उस संस्थान का मालिक या संपादक कौन है. यह साफ तौर पर भेदभाव है और मीडिया के नए स्वरूप को नकारने जैसा है.
सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह समस्या नई नहीं है. हर सत्र से पहले नए नियम, नई पाबंदियां और फिर कुछ दिनों बाद सब सामान्य—यह एक पैटर्न बन चुका है. कभी सुरक्षा जांच के नाम पर, कभी पास के नाम पर और अब बैरिकेड के नाम पर मीडियाकर्मियों को अपमानित किया जाता है.
लोकतंत्र में मीडिया कोई दुश्मन नहीं होता, बल्कि वह जनता और सत्ता के बीच पुल का काम करता है. अगर इसी पुल को कमजोर किया जाएगा, तो सबसे बड़ा नुकसान जनता का ही होगा. झारखंड विधानसभा प्रबंधन को यह समझना होगा कि नियम बनाना जरूरी है, लेकिन उन नियमों का उद्देश्य पारदर्शिता और सहयोग होना चाहिए, न कि नियंत्रण और भेदभाव.

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