संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान की हालिया भारत यात्रा के बाद कूटनीतिक हलकों में एक शब्द सबसे ज्यादा चर्चा में है— न्यूक्लियर अंब्रेला. दिल्ली में हुए द्विपक्षीय समझौतों के बीच परमाणु सहयोग से जुड़े कुछ शब्दों और टर्मिनोलॉजी ने ऐसी अटकलों को जन्म दिया कि क्या भारत अब अपनी रणनीतिक परमाणु सुरक्षा नीति को खाड़ी देशों तक बढ़ाने जा रहा है. इन चर्चाओं का असर सिर्फ भारत-UAE रिश्तों तक सीमित नहीं है. क्षेत्रीय संतुलन पर नजर रखने वाले देशों, खासकर पाकिस्तान और सऊदी अरब, में भी इस संभावित बदलाव को लेकर बेचैनी देखी जा रही है. लेकिन बड़ा सवाल यही है— क्या यह सचमुच ‘न्यूक्लियर अंब्रेला’ है, या फिर तकनीकी सहयोग को रणनीतिक सुरक्षा कवच के रूप में पेश किया जा रहा है?
‘न्यूक्लियर अंब्रेला’ का मतलब क्या होता है?
अंतरराष्ट्रीय रणनीति की भाषा में न्यूक्लियर अंब्रेला का अर्थ होता है Extended Nuclear Deterrence. इसका सीधा मतलब यह है कि कोई परमाणु शक्ति अपने सहयोगी देश को यह आश्वासन देती है कि यदि उस सहयोगी पर परमाणु हमला हुआ, तो वह उसे अपने परमाणु हथियारों के जरिए सुरक्षा प्रदान करेगी. यह व्यवस्था आमतौर पर औपचारिक सैन्य गठबंधनों में देखने को मिलती है, जैसे अमेरिका द्वारा NATO देशों को दिया गया सुरक्षा कवच. इसमें केवल तकनीक साझा करना नहीं, बल्कि परमाणु युद्ध की जिम्मेदारी साझा करना शामिल होता है. यही कारण है कि ऐसी व्यवस्थाएं बेहद संवेदनशील, गोपनीय और कूटनीतिक रूप से जटिल मानी जाती हैं.
भारत–UAE परमाणु समझौते में वास्तव में क्या है?
प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से जारी आधिकारिक जानकारी के अनुसार, भारत और UAE के बीच जिस परमाणु सहयोग पर सहमति बनी है, उसका फोकस एडवांस न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी पर है. इसमें Small Modular Reactors, न्यूक्लियर पावर प्लांट ऑपरेशन, मेंटेनेंस और सेफ्टी प्रोटोकॉल जैसे विषय शामिल हैं. यह सहयोग मुख्य रूप से न्यूक्लियर सेफ्टी से जुड़ा है, यानी परमाणु संयंत्रों को तकनीकी दुर्घटनाओं, रेडिएशन लीक और ऑपरेशनल जोखिमों से सुरक्षित रखने पर केंद्रित है. UAE के बराकाह न्यूक्लियर पावर प्लांट के संचालन में भारत का दशकों का अनुभव तकनीकी मदद के रूप में उपयोगी हो सकता है.
‘न्यूक्लियर सेफ्टी’ बनाम ‘न्यूक्लियर सिक्योरिटी’
यहां सबसे अहम अंतर समझना जरूरी है— Nuclear Safety और Nuclear Security एक जैसी चीजें नहीं हैं. न्यूक्लियर सेफ्टी का संबंध दुर्घटनाओं से बचाव, रेडिएशन नियंत्रण और परमाणु कचरे के सुरक्षित निपटान से होता है. वहीं न्यूक्लियर सिक्योरिटी या Physical Protection बाहरी हमलों, आतंकवादी खतरे और सैन्य हमले से सुरक्षा से जुड़ी होती है. सरकारी बयानों में जिस भाषा का इस्तेमाल हुआ है, वह तकनीकी सुरक्षा तक सीमित नजर आती है. कहीं भी यह स्पष्ट संकेत नहीं मिलता कि भारत किसी सैन्य या परमाणु जवाबी हमले की जिम्मेदारी लेने जा रहा है.
भारत के लिए ‘न्यूक्लियर अंब्रेला’ देना क्यों मुश्किल है?
भारत की परमाणु नीति की बुनियाद उसकी No First Use डॉक्ट्रिन है. इस नीति के तहत भारत यह घोषित करता है कि वह परमाणु हथियारों का इस्तेमाल पहले नहीं करेगा, बल्कि केवल जवाबी कार्रवाई में ही करेगा. अगर भारत किसी देश को ‘न्यूक्लियर अंब्रेला’ देता है, तो इसका अर्थ होगा कि उस देश पर हमला भारत पर हमला माना जाएगा. यह न सिर्फ भारत की मौजूदा नीति में बुनियादी बदलाव होगा, बल्कि अमेरिका जैसे रणनीतिक साझेदारों के साथ संतुलन को भी प्रभावित कर सकता है, क्योंकि UAE की सुरक्षा व्यवस्था में पहले से अमेरिकी भूमिका मौजूद है.
फिलहाल उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह कहना जल्दबाजी होगी कि भारत UAE को औपचारिक रूप से ‘न्यूक्लियर अंब्रेला’ देने जा रहा है. हालांकि, यह जरूर साफ है कि भारत-UAE रणनीतिक संबंध अब ऊर्जा और व्यापार से आगे बढ़कर उच्च-स्तरीय तकनीकी और सुरक्षा सहयोग की दिशा में प्रवेश कर चुके हैं.



