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Home»देश-विदेश»खामेनेई की मौत के बाद भड़का मिडिल ईस्ट: रूस-चीन क्यों पीछे, ड्रोन-लेजर और साइबर वॉर से बदल रहा युद्ध का गणित
देश-विदेश

खामेनेई की मौत के बाद भड़का मिडिल ईस्ट: रूस-चीन क्यों पीछे, ड्रोन-लेजर और साइबर वॉर से बदल रहा युद्ध का गणित

“मिडिल ईस्ट में छिड़ा ईरान-इजरायल संघर्ष अब एक बड़े भू-राजनीतिक मोड़ पर पहुंच चुका है. युद्ध के छठे दिन ईरान के सर्वोच्च नेता Ali Khamenei की मौत के बाद स्थिति और विस्फोटक हो गई. ”

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Satya MishraEditorial Desk
Published Mar 5, 2026 · 1:48 PM· 6 min read
खामेनेई की मौत के बाद भड़का मिडिल ईस्ट: रूस-चीन क्यों पीछे, ड्रोन-लेजर और साइबर वॉर से बदल रहा युद्ध का गणित

मिडिल ईस्ट में छिड़ा ईरान-इजरायल संघर्ष अब एक बड़े भू-राजनीतिक मोड़ पर पहुंच चुका है. युद्ध के छठे दिन ईरान के सर्वोच्च नेता Ali Khamenei की मौत के बाद स्थिति और विस्फोटक हो गई. इसके जवाब में Iran ने पूरे क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन से हमले शुरू कर दिए. खाड़ी क्षेत्र में तनाव तेजी से बढ़ा और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नया सवाल खड़ा हो गया—क्या ईरान इस लड़ाई में अकेला पड़ गया है? ईरान के दो बड़े रणनीतिक साझेदार Russia और China ने इस हमले की निंदा जरूर की, लेकिन किसी भी तरह की सैन्य मदद देने से दूरी बना ली. दूसरी ओर अमेरिका और इजरायल उन्नत तकनीक—ड्रोन, लेजर और साइबर वॉर—के जरिए ईरानी हथियारों को बेअसर करने की कोशिश कर रहे हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि यह संघर्ष सिर्फ दो देशों के बीच की लड़ाई नहीं, बल्कि आधुनिक युद्ध की बदलती रणनीति का भी संकेत है.

रूस क्यों नहीं उतरा ईरान के समर्थन में

यह भी पढ़ें:भारत-चीन के बीच 6 साल बाद फिर शुरू होगी सीधी फ्लाइट, मोदी- जिनपिंग मुलाकात से पहले बड़ा कदम

ईरान और रूस पिछले कुछ वर्षों में काफी करीब आए हैं. दोनों देशों ने रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने के लिए समझौते भी किए हैं. लेकिन यह साझेदारी औपचारिक सैन्य गठबंधन जैसी नहीं है. रूसी राष्ट्रपति Vladimir Putin ने ईरान के शीर्ष नेता की हत्या को अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया, लेकिन इसके बावजूद रूस ने सीधे युद्ध में उतरने का संकेत नहीं दिया. इसके पीछे कई वजहें मानी जा रही हैं. सबसे बड़ा कारण यह है कि रूस पहले से ही Russia–Ukraine War में गहराई से उलझा हुआ है. यूक्रेन के साथ लंबे संघर्ष के कारण उसकी सैन्य और आर्थिक क्षमता पहले से ही दबाव में है. विशेषज्ञों के मुताबिक रूस के पास फिलहाल मिडिल ईस्ट में नया मोर्चा खोलने की रणनीतिक क्षमता भी सीमित है. यही वजह है कि मॉस्को फिलहाल कूटनीतिक समर्थन और संयुक्त राष्ट्र में विरोध तक ही खुद को सीमित रख रहा है.

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चीन की दूरी के पीछे आर्थिक रणनीति

ईरान के साथ मजबूत आर्थिक और ऊर्जा संबंध होने के बावजूद Xi Jinping के नेतृत्व वाला चीन भी इस संघर्ष में सीधे शामिल होने से बच रहा है. चीन की रणनीति हमेशा से वैश्विक व्यापार और आर्थिक स्थिरता पर केंद्रित रही है. मिडिल ईस्ट उसके लिए ऊर्जा आपूर्ति का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र है. अगर युद्ध व्यापक हो जाता है तो तेल सप्लाई और वैश्विक व्यापार पर बड़ा असर पड़ सकता है. खास चिंता Strait of Hormuz को लेकर है. यह समुद्री मार्ग फारस की खाड़ी से अरब सागर तक जाने का प्रमुख रास्ता है और दुनिया के तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा यहीं से गुजरता है. अगर इस मार्ग पर संकट गहराता है तो चीन की ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो सकती है. यही कारण है कि बीजिंग इस संघर्ष में सैन्य भूमिका लेने के बजाय कूटनीतिक समाधान की बात कर रहा है.

ईरान की तकनीक से बना अमेरिकी हथियार

यह भी पढ़ें:BRICS Business Forum में बोले पीएम मोदी, समुद्री मार्गों की सुरक्षा के बिना वैश्विक व्यापार अधूरा

इस युद्ध में एक दिलचस्प मोड़ तब आया जब यह खुलासा हुआ कि अमेरिका ने ईरान के ही ड्रोन मॉडल से प्रेरित तकनीक विकसित कर ली है. ईरान लंबे समय से कम लागत वाले आत्मघाती ड्रोन विकसित करता रहा है. इनमें सबसे चर्चित हैं Shahed 136 drone और Shahed 131 drone. इन ड्रोन की खासियत यह है कि वे लक्ष्य क्षेत्र के ऊपर लंबे समय तक मंडरा सकते हैं और फिर सीधे टारगेट से टकराकर विस्फोट कर देते हैं. इनका इस्तेमाल पहले यमन और बाद में यूक्रेन युद्ध में भी देखा गया. अब अमेरिका ने इसी तकनीक का अध्ययन करके नया ड्रोन विकसित किया है जिसे Lucas drone कहा जा रहा है. इन ड्रोन की कीमत अपेक्षाकृत कम है लेकिन बड़ी संख्या में इस्तेमाल किए जाने पर ये दुश्मन के रडार सिस्टम को भ्रमित कर सकते हैं. इससे महंगे मिसाइल या एयर स्ट्राइक के लिए रास्ता साफ किया जा सकता है.

लेजर और साइबर वॉर से बदलता युद्ध का चेहरा

मिडिल ईस्ट के इस संघर्ष में आधुनिक तकनीक की भूमिका बेहद अहम हो गई है. अमेरिका और इजरायल ने मिलकर एक बड़े सैन्य अभियान की शुरुआत की है जिसे Operation Epic Fury कहा जा रहा है. इस ऑपरेशन में पारंपरिक हथियारों के साथ-साथ उन्नत तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है. इसमें सैटेलाइट निगरानी, साइबर हमले और लेजर हथियार शामिल हैं. अमेरिकी नौसेना के जहाजों पर तैनात HELIOS laser weapon system ड्रोन और मिसाइलों को हवा में ही नष्ट करने में सक्षम है. यह हाई-एनर्जी लेजर बीम के जरिए कुछ सेकंड में लक्ष्य को निष्क्रिय कर सकता है. इसी तरह इजरायल की ओर से विकसित लेजर आधारित रक्षा प्रणाली को भी युद्ध क्षेत्र में परीक्षण के तौर पर इस्तेमाल किए जाने की चर्चा है. विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले वर्षों में युद्ध का स्वरूप तेजी से बदलने वाला है. महंगे लड़ाकू विमान और भारी मिसाइलों की जगह बड़ी संख्या में सस्ते लेकिन घातक ड्रोन इस्तेमाल किए जाएंगे.

क्या यह युद्ध वैश्विक संतुलन बदल देगा?

मिडिल ईस्ट का यह संघर्ष केवल क्षेत्रीय राजनीति का मामला नहीं है. इसमें शामिल देशों की ताकत और रणनीति पूरी दुनिया के शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकती है. एक तरफ अमेरिका और उसके सहयोगी उन्नत तकनीक के जरिए युद्ध की नई रणनीति विकसित कर रहे हैं. दूसरी ओर ईरान कम लागत वाले हथियारों और ड्रोन तकनीक के जरिए मुकाबला करने की कोशिश कर रहा है. लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर रूस और चीन जैसे बड़े देश सीधे तौर पर इस संघर्ष में शामिल नहीं होते, तो क्या ईरान लंबे समय तक इस दबाव का सामना कर पाएगा? विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह संघर्ष केवल सैन्य शक्ति नहीं बल्कि कूटनीति, अर्थव्यवस्था और तकनीक की लड़ाई भी बन सकता है.

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