कांग्रेस के साथ हो गया खेला!, JMM दोनों सीटों पर लड़ने को तैयार, प्रणव झा की बढ़ी मुश्किल
“झारखंड राज्यसभा चुनाव को लेकर सियासी हलचल लगातार तेज होती जा रही है. कांग्रेस ने दिल्ली से संगठन के भरोसेमंद चेहरे प्रणव झा को उम्मीदवार घोषित कर दिया है, लेकिन अब झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की तरफ से आए ताजा संकेतों ने कांग्रेस की चिंता बढ़ा दी है.”

Ranchi: झारखंड राज्यसभा चुनाव को लेकर सियासी हलचल लगातार तेज होती जा रही है. कांग्रेस ने दिल्ली से संगठन के भरोसेमंद चेहरे प्रणव झा को उम्मीदवार घोषित कर दिया है, लेकिन अब झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की तरफ से आए ताजा संकेतों ने कांग्रेस की चिंता बढ़ा दी है. JMM की बैठक के बाद मंत्री योगेंद्र प्रसाद ने साफ कहा कि पार्टी के मंत्री और विधायक चाहते हैं कि दोनों राज्यसभा सीटों पर झामुमो अपने उम्मीदवार उतारे. ऐसे में सवाल उठने लगा है कि क्या कांग्रेस ने उम्मीदवार घोषित करने में जल्दबाजी कर दी और क्या राज्यसभा चुनाव में उसके साथ बड़ा राजनीतिक खेला हो गया है?
JMM का समर्थन अभी भी अधर में
गुरुवार रात कांग्रेस हाईकमान ने झारखंड की एक राज्यसभा सीट के लिए प्रणव झा के नाम की घोषणा कर दी. कांग्रेस के भीतर लंबे समय से कई नामों पर चर्चा चल रही थी. पूर्व सांसद फुरकान अंसारी, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष राजेश ठाकुर समेत कई नेताओं के नाम रेस में बताए जा रहे थे. लेकिन अंतिम समय में दिल्ली ने प्रणव झा पर दांव खेल दिया. प्रणव झा कांग्रेस संगठन के पुराने और भरोसेमंद नेता माने जाते हैं. उनका नाम कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की कोर टीम में लिया जाता है. नासिर हुसैन और गौरव वल्लभ के साथ वे लंबे समय से संगठनात्मक जिम्मेदारियां संभालते रहे हैं. झारखंड के बोकारो में जन्मे प्रणव झा का राजनीतिक सफर NSUI से शुरू हुआ और वे कांग्रेस संगठन के कई महत्वपूर्ण पदों पर काम कर चुके हैं. लेकिन राजनीतिक जानकारों का कहना है कि कांग्रेस ने उम्मीदवार तो घोषित कर दिया, मगर जीत की गारंटी अभी भी उसके पास नहीं है.
JMM ने बदल दिया पूरा समीकरण
शुक्रवार को JMM की बैठक के बाद मंत्री योगेंद्र प्रसाद ने मीडिया से बातचीत में कहा कि पार्टी के सभी मंत्री और विधायक चाहते हैं कि दोनों सीटों पर झामुमो चुनाव लड़े. हालांकि अंतिम फैसला मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को लेना है और पार्टी की ओर से अभी तक उम्मीदवारों के नाम घोषित नहीं किए गए हैं, लेकिन इस बयान ने कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. दरअसल, अब तक माना जा रहा था कि महागठबंधन के भीतर एक सीट JMM और एक सीट कांग्रेस के खाते में जाएगी. कांग्रेस ने इसी भरोसे पर अपना उम्मीदवार भी घोषित कर दिया. लेकिन JMM के भीतर दोनों सीटों पर दावा करने की आवाज उठने के बाद तस्वीर पूरी तरह बदल गई है.
आंकड़ों का गणित कांग्रेस के खिलाफ
राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए 28 वोटों की जरूरत है. झामुमो के पास अकेले 34 विधायक हैं. यानी वह अपनी एक सीट आसानी से निकाल सकती है. दूसरी तरफ कांग्रेस के पास सिर्फ 16 विधायक हैं. ऐसी स्थिति में कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा की जीत JMM, राजद और माले के समर्थन पर निर्भर करती है. महागठबंधन के पास कुल मिलाकर पर्याप्त संख्या बल है, लेकिन अगर JMM दोनों सीटों पर दावा ठोक देती है तो कांग्रेस के सामने बड़ी राजनीतिक चुनौती खड़ी हो सकती है. यही वजह है कि कांग्रेस लगातार अपने सहयोगी दलों को साधने की कोशिश में जुटी हुई है. रांची में कांग्रेस पॉलिटिकल अफेयर्स कमेटी की बैठक भी इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है.
कांग्रेस के भीतर भी उठ रहे विरोध के स्वर
राज्यसभा उम्मीदवार घोषित होने के बाद कांग्रेस के अंदर भी असंतोष खुलकर सामने आने लगा है. पूर्व सांसद फुरकान अंसारी ने सोशल मीडिया पर एक भावुक पोस्ट लिखकर अपनी नाराजगी जाहिर की. उन्होंने कहा कि पूरी जिंदगी कांग्रेस को मजबूत करने में लगा दी, संघर्ष किया, संगठन को सींचा, लेकिन हालिया फैसले से उन्हें गहरी चोट पहुंची है. उन्होंने लिखा कि दुख पद नहीं मिलने का नहीं, बल्कि दशकों के योगदान को नजरअंदाज किए जाने का है.
फुरकान अंसारी का यह बयान राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है. हालांकि नाराजगी के बावजूद वे कांग्रेस की बैठक में शामिल हुए, जिससे यह संकेत भी मिला कि फिलहाल वे खुला विरोध करने के मूड में नहीं हैं. उधर पूर्व प्रदेश अध्यक्ष राजेश ठाकुर की सोशल मीडिया पोस्ट ने भी राजनीतिक अटकलों को हवा दे दी. उन्होंने "सहयोग, समर्थन और सम्मान" के लिए धन्यवाद देते हुए एक पोस्ट किया, जिसके बाद समर्थकों ने इसे राज्यसभा टिकट से जोड़कर देखना शुरू कर दिया.
क्या महागठबंधन में बढ़ रही है खटास?
राज्यसभा चुनाव को लेकर सिर्फ कांग्रेस ही नहीं, बल्कि महागठबंधन के अन्य सहयोगी दलों में भी नाराजगी दिखाई दे रही है. राजद पहले ही यह सवाल उठा चुका है कि राज्यसभा चुनाव को लेकर उससे कोई औपचारिक चर्चा नहीं की गई. वहीं माले भी महागठबंधन की बैठक बुलाने की मांग कर चुका है. ऐसे में राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि फिलहाल महागठबंधन टूटने की स्थिति नहीं है, लेकिन राज्यसभा चुनाव के बहाने गठबंधन के भीतर ताकत और हिस्सेदारी की लड़ाई जरूर खुलकर सामने आ गई है.
अब नजर हेमंत सोरेन पर
फिलहाल पूरे घटनाक्रम का केंद्र मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन हैं. कांग्रेस ने अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया है. JMM के भीतर दोनों सीटों पर चुनाव लड़ने की मांग उठ रही है. कांग्रेस के भीतर नाराजगी भी दिख रही है और सहयोगी दल भी पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं. ऐसे में अंतिम फैसला हेमंत सोरेन को ही लेना है. अगर JMM दोनों सीटों पर उम्मीदवार उतारती है तो महागठबंधन के भीतर बड़ा राजनीतिक संकट खड़ा हो सकता है. वहीं अगर कांग्रेस को एक सीट देने पर सहमति बनती है तो प्रणव झा की राह आसान हो सकती है. फिलहाल इतना तय है कि झारखंड का राज्यसभा चुनाव अब सिर्फ सांसद चुनने का चुनाव नहीं रह गया है. यह महागठबंधन के भीतर शक्ति संतुलन, राजनीतिक हैसियत और नेतृत्व की प्रतिष्ठा की लड़ाई बन चुका है. आने वाले दो-तीन दिनों में हेमंत सोरेन का फैसला तय करेगा कि कांग्रेस का दांव सफल होता है या फिर राज्यसभा चुनाव में उसके साथ सचमुच बड़ा खेला हो जाता है.

