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Home»झारखंड»क्या जनसंख्या के नए गणित में कमजोर पड़ जाएगा आदिवासी प्रतिनिधित्व! परिसीमन से बदल जाएगा झारखंड का राजनीतिक नक्शा?
झारखंड

क्या जनसंख्या के नए गणित में कमजोर पड़ जाएगा आदिवासी प्रतिनिधित्व! परिसीमन से बदल जाएगा झारखंड का राजनीतिक नक्शा?

“2026 के बाद प्रस्तावित परिसीमन को लेकर झारखंड में आदिवासी समाज की चिंता बढ़ गई है. रांची में आयोजित सेमिनार में ST सीटों में संभावित कटौती, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों की सुरक्षा और आदिवासी अधिकारों पर गंभीर सवाल उठाए गए. ”

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Satya MishraEditorial Desk
Published May 31, 2026 · 9:32 AM· 7 min read
क्या जनसंख्या के नए गणित में कमजोर पड़ जाएगा आदिवासी प्रतिनिधित्व! परिसीमन से बदल जाएगा झारखंड का राजनीतिक नक्शा?

विषय सूची (Contents)

  • 1.आखिर क्या होता है परिसीमन और क्यों बढ़ी चिंता?
  • 2.जब 2002 के परिसीमन प्रस्ताव ने खड़ी कर दी थी बड़ी चुनौती
  • 3.आदिवासी समाज ने पूछा था – विस्थापन की सजा आखिर क्यों?
  • 4.2008 में कैसे बचीं आदिवासी सीटें?
  • 5.अब 2026 के बाद आखिर खतरा क्या है?
  • 6.सीटें बढ़ेंगी, लेकिन क्या आदिवासी हिस्सेदारी घट जाएगी?
  • 7.पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों की राजनीतिक ताकत पर भी चिंता
  • 8.सेमिनार से निकलीं पांच बड़ी मांगें
  • 9.1. ST सीटों में किसी भी प्रकार की कमी स्वीकार नहीं
  • 10.2. कुल सीट बढ़े तो ST सीट भी उसी अनुपात में बढ़े
  • 11.3. पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों को विशेष सुरक्षा मिले
  • 12.4. राष्ट्रीय उच्चस्तरीय समिति का गठन हो
  • 13.5. संसद से संवैधानिक गारंटी मिले
  • 14.अमित शाह के बयान का भी हुआ उल्लेख
  • 15.स्पष्ट संदेश: राजनीतिक अस्तित्व से कोई समझौता नहीं

क्या 2026 के बाद झारखंड की राजनीति का नक्शा बदल जाएगा? क्या परिसीमन के नाम पर आदिवासी समाज की राजनीतिक हिस्सेदारी घट सकती है? क्या जिन सीटों को बचाने के लिए 2008 में बड़ा आंदोलन हुआ था, उन पर फिर खतरा मंडरा रहा है? रांची में आयोजित 'परिसीमन का आदिवासी समाज पर प्रभाव एवं संभावित समाधान' विषयक सेमिनार में यही सवाल सबसे ज्यादा गूंजे. वक्ताओं ने साफ कहा कि यह सिर्फ सीटों के बंटवारे का मामला नहीं है, बल्कि आदिवासी समाज के राजनीतिक अस्तित्व, संवैधानिक अधिकारों और लोकतांत्रिक भविष्य का सवाल है.

सेमिनार में पेश दस्तावेजों में चेतावनी दी गई कि अगर 2026 के बाद होने वाले परिसीमन में केवल जनसंख्या को आधार बनाया गया, तो झारखंड के आदिवासी बहुल क्षेत्रों की राजनीतिक ताकत कमजोर हो सकती है. वहीं आदिवासी संगठनों ने दो टूक कहा है—'सीट बढ़ेगी तो आदिवासी सीट भी बढ़ेगी, लेकिन आदिवासी प्रतिनिधित्व में किसी तरह की कटौती स्वीकार नहीं होगी.' आखिर 2008 में ऐसा क्या हुआ था कि केंद्र सरकार को विशेष कानून लाकर झारखंड की ST सीटें बचानी पड़ीं? 2026 के बाद खतरा कितना बड़ा है? और आदिवासी समाज इसकी काट के लिए क्या मांग कर रहा है? आइए विस्तार से समझते हैं...

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आखिर क्या होता है परिसीमन और क्यों बढ़ी चिंता?

 

परिसीमन (Delimitation) वह प्रक्रिया है जिसके तहत जनसंख्या के आधार पर लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं तथा सीटों की संख्या का पुनर्निर्धारण किया जाता है. भारत में यह प्रक्रिया समय-समय पर की जाती रही है और संविधान के अनुच्छेद 82 एवं 170 में इसकी व्यवस्था की गई है. लेकिन झारखंड के संदर्भ में यह सिर्फ जनसंख्या का गणित नहीं है. यहां अनुसूचित जनजातियों को संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 के तहत विशेष राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिला हुआ है. वहीं पांचवीं अनुसूची आदिवासी बहुल क्षेत्रों की सुरक्षा और प्रशासनिक संरक्षण सुनिश्चित करती है. यही कारण है कि परिसीमन का सवाल सीधे-सीधे आदिवासी राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़ जाता है.

 

यह भी पढ़ें:तीनपहाड़ स्टेशन पर यात्रियों को बताया गया RailOne App का आसान तरीका

जब 2002 के परिसीमन प्रस्ताव ने खड़ी कर दी थी बड़ी चुनौती

 

सेमिनार में याद दिलाया गया कि 2002 में गठित परिसीमन आयोग ने 2001 की जनगणना के आधार पर झारखंड में ST आरक्षित सीटों में बड़ी कटौती का प्रस्ताव दिया था.

प्रस्ताव के अनुसार:

  • विधानसभा की 81 सीटों में ST आरक्षित सीटें 28 से घटाकर 22 करने का सुझाव दिया गया था.
  • लोकसभा की 14 सीटों में ST आरक्षित सीटें 5 से घटाकर 4 करने की बात कही गई थी.

इस प्रस्ताव के सामने आते ही पूरे झारखंड में विरोध शुरू हो गया. आदिवासी संगठनों, सामाजिक संस्थाओं और जनप्रतिनिधियों ने आरोप लगाया कि आयोग ने केवल जनसंख्या के आंकड़ों को आधार बनाया और आदिवासी क्षेत्रों की वास्तविक परिस्थितियों को नजरअंदाज कर दिया.

 

आदिवासी समाज ने पूछा था – विस्थापन की सजा आखिर क्यों?

 

विरोध कर रहे संगठनों का तर्क था कि आदिवासी क्षेत्रों में जनसंख्या वृद्धि दर कम होने के पीछे कई ऐतिहासिक और सामाजिक कारण हैं. खनन परियोजनाओं, उद्योगों, बड़े बांधों और विकास योजनाओं के कारण लाखों लोग विस्थापित हुए. रोजगार की तलाश में बड़े पैमाने पर पलायन हुआ. कई इलाकों में भौगोलिक परिस्थितियों के कारण जनसंख्या घनत्व भी कम रहा. ऐसे में सवाल उठाया गया कि जिन कारणों से आदिवासी समाज पहले ही प्रभावित हुआ है, उन्हीं कारणों के आधार पर उसकी राजनीतिक हिस्सेदारी क्यों कम की जाए? उस समय आंदोलनकारियों का एक नारा काफी चर्चित हुआ था:

"विस्थापन और पलायन की सजा आदिवासी समाज को राजनीतिक प्रतिनिधित्व घटाकर नहीं दी जा सकती."

 

2008 में कैसे बचीं आदिवासी सीटें?

 

व्यापक आंदोलन और राजनीतिक दबाव के बाद केंद्र सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ा. वर्ष 2008 में Delimitation Act, 2002 में संशोधन कर Section 10B जोड़ा गया. यह प्रावधान झारखंड के संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है.

इस संशोधन के तहत:

  • 30 अप्रैल 2007 और 17 अगस्त 2007 को जारी परिसीमन आदेशों को प्रभावहीन कर दिया गया.
  • झारखंड की पुरानी निर्वाचन क्षेत्र व्यवस्था को 2026 तक जारी रखने का निर्णय लिया गया.
  • विधानसभा में 28 ST सीटें और लोकसभा में 5 ST सीटें बरकरार रहीं.

सेमिनार में इसे भारतीय संसदीय इतिहास का एक ऐतिहासिक निर्णय बताया गया.

 

अब 2026 के बाद आखिर खतरा क्या है?

 

सेमिनार में सबसे अधिक चर्चा इसी विषय पर हुई. प्रतिनिधियों ने आशंका जताई कि 2026 के बाद होने वाले नए परिसीमन में यदि केवल जनसंख्या को आधार बनाया गया, तो आदिवासी बहुल क्षेत्रों को नुकसान उठाना पड़ सकता है.

इसके पीछे कई कारण बताए गए:

  • आदिवासी क्षेत्रों से लगातार पलायन
  • अपेक्षाकृत कम जनसंख्या वृद्धि दर
  • वन एवं पहाड़ी क्षेत्रों में कम जनसंख्या घनत्व
  • खनन और औद्योगिक परियोजनाओं से विस्थापन

दूसरी ओर शहरी क्षेत्रों और गैर-आदिवासी आबादी वाले क्षेत्रों में जनसंख्या तेजी से बढ़ी है. ऐसी स्थिति में केवल जनसंख्या आधारित परिसीमन आदिवासी राजनीतिक प्रतिनिधित्व को प्रभावित कर सकता है.

 

सीटें बढ़ेंगी, लेकिन क्या आदिवासी हिस्सेदारी घट जाएगी?

 

सेमिनार में एक महत्वपूर्ण उदाहरण भी रखा गया. मान लीजिए भविष्य में झारखंड विधानसभा की सीटें 81 से बढ़कर 122 हो जाती हैं. यदि ST आरक्षित सीटों की संख्या उसी अनुपात में नहीं बढ़ी, तो कुल प्रतिनिधित्व में आदिवासी हिस्सेदारी का प्रतिशत स्वतः कम हो जाएगा. यानी संख्या भले बढ़े, लेकिन राजनीतिक प्रभाव घट सकता है. इसी संभावना को लेकर आदिवासी समाज चिंता जता रहा है.

 

पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों की राजनीतिक ताकत पर भी चिंता

 

वक्ताओं ने कहा कि परिसीमन के दौरान केवल जनसंख्या नहीं, बल्कि पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों की सामाजिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक विशेषताओं को भी ध्यान में रखना होगा.

यदि आदिवासी बहुल क्षेत्रों का विभाजन हुआ तो:

  • पारंपरिक सामाजिक संरचना प्रभावित होगी.
  • क्षेत्रीय नेतृत्व कमजोर होगा.
  • स्थानीय मुद्दों की आवाज कम हो सकती है.
  • संवैधानिक सुरक्षा का व्यावहारिक प्रभाव घट सकता है.

इसलिए पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों को विशेष संरक्षण देने की मांग जोरदार तरीके से उठाई गई.

 

सेमिनार से निकलीं पांच बड़ी मांगें

 

1. ST सीटों में किसी भी प्रकार की कमी स्वीकार नहीं

मौजूदा आरक्षित सीटों को न्यूनतम संवैधानिक सुरक्षा के रूप में संरक्षित रखा जाए.

 

2. कुल सीट बढ़े तो ST सीट भी उसी अनुपात में बढ़े

यदि विधानसभा या लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ती है तो आदिवासी सीटों की संख्या भी समान अनुपात में बढ़ाई जाए.

 

3. पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों को विशेष सुरक्षा मिले

आदिवासी बहुल क्षेत्रों की भौगोलिक और सांस्कृतिक एकता को बनाए रखा जाए.

 

4. राष्ट्रीय उच्चस्तरीय समिति का गठन हो

संवैधानिक विशेषज्ञों, जनजातीय मामलों के विशेषज्ञों, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग, सांसदों, विधायकों और सामाजिक संगठनों को शामिल कर विशेष समिति बनाई जाए.

 

5. संसद से संवैधानिक गारंटी मिले

ऐसी व्यवस्था की जाए कि किसी भी परिसीमन प्रक्रिया के कारण अनुसूचित जनजातियों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व कम न हो.

 

अमित शाह के बयान का भी हुआ उल्लेख

 

सेमिनार में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के उस बयान का भी जिक्र किया गया जिसमें उन्होंने कहा था कि परिसीमन प्रक्रिया में किसी भी राज्य को नुकसान नहीं होने दिया जाएगा. साथ ही राजनीतिक सहमति बनने पर राज्यों की सीटों में लगभग 50 प्रतिशत तक वृद्धि की संभावना पर भी विचार किया जा सकता है. हालांकि वक्ताओं का कहना था कि सीटों की संख्या बढ़ाने से ज्यादा महत्वपूर्ण यह सुनिश्चित करना है कि आदिवासी प्रतिनिधित्व सुरक्षित रहे.

 

स्पष्ट संदेश: राजनीतिक अस्तित्व से कोई समझौता नहीं

सेमिनार का निष्कर्ष बेहद स्पष्ट था. आदिवासी समाज लोकतांत्रिक सुधारों और प्रतिनिधित्व के विस्तार का स्वागत करता है, लेकिन अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी में कमी स्वीकार नहीं करेगा. वक्ताओं ने याद दिलाया कि 2008 में जिस तरह आदिवासी समाज ने ST सीटों में कटौती के प्रस्ताव को रोकने में सफलता हासिल की थी, उसी तरह भविष्य में भी अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष जारी रहेगा.

 

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