अपने ही जजों ने ट्रंप को दिया झटका, सुप्रीम कोर्ट ने टैरिफ पर लगाई रोक, व्हाइट हाउस में बढ़ा गुस्सा
अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है, जहां 6-3 के फैसले में उनके ग्लोबल रेसिप्रोकल टैरिफ को अवैध ठहराया गया. खास बात यह रही कि बहुमत में शामिल कुछ जज वही थे जिन्हें ट्रंप ने खुद नियुक्त किया था.

अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ग्लोबल रेसिप्रोकल टैरिफ नीति को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। US Supreme Court ने 6-3 के बहुमत से फैसला सुनाते हुए इमरजेंसी कानून के तहत लगाए गए टैरिफ को अवैध करार दिया। दिलचस्प बात यह रही कि बहुमत में शामिल जजों में वे न्यायाधीश भी थे जिन्हें ट्रंप ने खुद अपने पहले कार्यकाल में नियुक्त किया था। फैसले के बाद व्हाइट हाउस में ट्रंप ने नाराजगी जाहिर करते हुए कुछ जजों की आलोचना की और कहा कि यह निर्णय निराशाजनक है। इस फैसले ने न केवल ट्रंप की व्यापार नीति को झटका दिया है, बल्कि यह भी संकेत दिया है कि अमेरिकी न्यायपालिका राष्ट्रपति की शक्तियों की सीमा तय करने में स्वतंत्र और सक्रिय भूमिका निभा रही है।
बहुमत का फैसला और ट्रंप के अपने जजों की भूमिका
सुप्रीम कोर्ट के 6-3 फैसले में तीन जजों ने टैरिफ के पक्ष में और छह ने विरोध में मतदान किया। ट्रंप द्वारा नियुक्त जस्टिस नील गोरसच और एमी कोनी बैरेट बहुमत के साथ खड़े हुए और टैरिफ को अवैध ठहराने के पक्ष में फैसला दिया। वहीं ट्रंप द्वारा नियुक्त ही जस्टिस ब्रेट कैवनॉ राष्ट्रपति के आदेश के समर्थन में रहे। इस घटनाक्रम ने राजनीतिक गलियारों में बहस छेड़ दी कि अदालत ने साफ संदेश दिया है कि राष्ट्रपति की आपात शक्तियां भी सीमित हैं और उनका इस्तेमाल कानून के दायरे में ही होना चाहिए।
ट्रंप की तीखी प्रतिक्रिया और न्यायपालिका से टकराव
फैसले के बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने खुलकर नाराजगी जताई और कहा कि उन्हें कुछ जजों के रुख पर शर्म महसूस होती है। उन्होंने विशेष रूप से उन जजों पर टिप्पणी की जिन्हें उन्होंने स्वयं नियुक्त किया था। हालांकि उन्होंने डेमोक्रेटिक नियुक्त जजों के फैसले पर आश्चर्य नहीं जताया, लेकिन अपने ही नियुक्त जजों के खिलाफ उनका बयान चर्चा का विषय बन गया। इससे पहले भी ट्रंप और अदालत के बीच कई मामलों में टकराव देखने को मिला है। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी राष्ट्रपति द्वारा अदालत की आलोचना करना सामान्य है, लेकिन व्यक्तिगत टिप्पणी करना संस्थागत संतुलन के लिहाज से उचित नहीं माना जाता।
कानूनी चुनौती और व्यापारिक समूहों की भूमिका
इस टैरिफ नीति को अदालत में चुनौती केवल विपक्षी राजनीतिक खेमे से नहीं मिली थी। लिबर्टेरियन विचारधारा से जुड़े लिबर्टी जस्टिस सेंटर ने याचिका दाखिल कर इस मुद्दे को अदालत तक पहुंचाया। इसके अलावा यूएस चैंबर ऑफ कॉमर्स जैसे बड़े व्यापारिक संगठनों ने भी टैरिफ के खिलाफ आवाज उठाई थी। उनका तर्क था कि इस तरह के शुल्क अंतरराष्ट्रीय व्यापार और अमेरिकी कंपनियों के हितों को नुकसान पहुंचाते हैं। अदालत ने इन दलीलों पर विचार करते हुए स्पष्ट किया कि इमरजेंसी कानून का उपयोग अनियंत्रित आर्थिक निर्णयों के लिए नहीं किया जा सकता।
आगे की राजनीति पर असर
ट्रंप और चीफ जस्टिस जॉन रॉबर्ट्स के बीच संबंध पहले से ही तनावपूर्ण रहे हैं। रॉबर्ट्स अतीत में न्यायपालिका पर ट्रंप की टिप्पणियों का विरोध कर चुके हैं। इस फैसले के बाद भी ट्रंप ने बिना नाम लिए कुछ जजों पर “राजनीतिक रूप से सही दिखने” का आरोप लगाया। आने वाले दिनों में स्टेट ऑफ द यूनियन संबोधन के दौरान सुप्रीम कोर्ट के जजों की मौजूदगी इस तनाव को और प्रतीकात्मक रूप दे सकती है। कुल मिलाकर, यह फैसला अमेरिकी लोकतंत्र में न्यायपालिका की स्वतंत्रता और राष्ट्रपति की सीमित शक्तियों को एक बार फिर रेखांकित करता है।

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