यूनुस के फैसलों पर कैंची, तारिक रहमान की नई लाइन से भारत-बांग्लादेश रिश्तों में पिघलने लगी बर्फ
“बांग्लादेश में नई सरकार बनने के साथ ही भारत के साथ रिश्तों में बदलाव के साफ संकेत दिखाई देने लगे हैं। प्रधानमंत्री बने तारिक रहमान ने पूर्ववर्ती मोहम्मद यूनुस सरकार के कई विवादित फैसलों को पलटना शुरू कर दिया है, जिससे दिल्ली और ढाका के बीच जमी बर्फ पिघलती नजर आ रही है।”

बांग्लादेश की सत्ता में बदलाव के साथ ही दक्षिण एशिया की राजनीति में नई हलचल तेज हो गई है। प्रधानमंत्री बनने के बाद तारिक रहमान ने कई ऐसे फैसले लेने शुरू कर दिए हैं, जिन्हें उनके पूर्ववर्ती मोहम्मद यूनुस के विवादित निर्णयों से अलग माना जा रहा है। इन बदलावों का सीधा असर भारत-बांग्लादेश संबंधों पर पड़ सकता है। नई दिल्ली की ओर से भी सकारात्मक संकेत सामने आए हैं—वीजा सेवाओं को चरणबद्ध तरीके से बहाल करने की बात हो रही है और उच्च स्तरीय राजनीतिक संवाद भी तेज हुआ है। हालांकि, दोनों देशों के बीच बीते महीनों में पैदा हुई दूरी को पूरी तरह खत्म करना आसान नहीं होगा। सीमा, सुरक्षा, व्यापार और कूटनीतिक संतुलन जैसे कई मुद्दे अभी भी संवेदनशील बने हुए हैं। ऐसे में सवाल यही है कि क्या तारिक रहमान का दौर रिश्तों को पटरी पर ला पाएगा या फिर नई चुनौतियाँ सामने आएंगी।
यूनुस के फैसलों की उलटबांसी: नई सरकार का अलग रुख
तारिक रहमान के प्रधानमंत्री बनने के बाद सबसे बड़ा संकेत यह मिला है कि वे अपने पूर्ववर्ती दौर की कई नीतियों को पलट रहे हैं। यूनुस के कार्यकाल में भारत को लेकर जो सख्त रुख अपनाया गया था, उससे दोनों देशों के बीच कूटनीतिक दूरी बढ़ी थी। अब नई सरकार उस माहौल को बदलने की कोशिश में दिख रही है। भारत की ओर से भी सकारात्मक प्रतिक्रिया सामने आई है, जिसमें वीजा सेवाओं को धीरे-धीरे बहाल करने और संवाद बढ़ाने की पहल शामिल है। ढाका और नई दिल्ली के बीच राजनयिक संपर्क बढ़ना इस बात का संकेत है कि दोनों देश टकराव के बजाय सहयोग की दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं।
BNP की रणनीति और क्षेत्रीय संतुलन की
तारिक रहमान की पार्टी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) लंबे समय से क्षेत्रीय संतुलन की राजनीति करती रही है। पार्टी यह मानती है कि भारत और पाकिस्तान के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है, लेकिन साथ ही भारत की सुरक्षा और सीमा संबंधी संवेदनशीलताओं को समझना भी उतना ही अहम है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि BNP के भीतर कई धड़े ऐसे भी हैं, जिनके रुख भारत के प्रति हमेशा सकारात्मक नहीं रहे। इसके बावजूद नई सरकार के शुरुआती संकेत बताते हैं कि वह आर्थिक और कूटनीतिक स्थिरता के लिए भारत के साथ सहयोग बनाए रखना चाहती है। बांग्लादेश की मौजूदा आर्थिक स्थिति भी इस सहयोग को और जरूरी बनाती है।
रिश्तों की मरम्मत का रास्ता
भारत और बांग्लादेश के बीच कई अहम मुद्दे अभी भी लंबित हैं, जिनमें गंगा जल समझौते का नवीनीकरण, सीमा सुरक्षा, अवैध आव्रजन, व्यापार और मेडिकल वीजा शामिल हैं। इन सभी क्षेत्रों में प्रगति तभी संभव है जब दोनों देशों के बीच भरोसा मजबूत हो। यूनुस सरकार के दौरान चीन और पाकिस्तान के साथ बढ़ती नजदीकियों ने नई दिल्ली की चिंताओं को बढ़ाया था। अब तारिक रहमान के सामने चुनौती यह है कि वे इन संतुलनों को कैसे संभालते हैं और भारत के साथ रिश्तों को किस दिशा में ले जाते हैं। शुरुआती संकेत सकारात्मक जरूर हैं, लेकिन स्थायी सुधार के लिए निरंतर राजनीतिक इच्छाशक्ति और ठोस कूटनीतिक प्रयास जरूरी होंगे।

