परिसीमन को लेकर आदिवासी संगठनों की चेतावनी, कहा- 1971 के अनुपात से कम हुआ प्रतिनिधित्व तो होगा बड़ा आंदोलन
झारखंड में प्रस्तावित परिसीमन को लेकर आदिवासी संगठनों की चिंता लगातार बढ़ती जा रही है. इसी कड़ी में बुधवार को रांची में राजी पड़हा सरना प्रार्थना सभा, आदिवासी छात्र संघ और सरना धर्म सूत्र समिति की संयुक्त बैठक आयोजित की गई.

Ranchi: झारखंड में प्रस्तावित परिसीमन को लेकर आदिवासी संगठनों की चिंता लगातार बढ़ती जा रही है. इसी कड़ी में बुधवार को रांची में राजी पड़हा सरना प्रार्थना सभा, आदिवासी छात्र संघ और सरना धर्म सूत्र समिति की संयुक्त बैठक आयोजित की गई. बैठक में विभिन्न आदिवासी संगठनों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया और परिसीमन से आदिवासी राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों पर विस्तार से चर्चा की. वक्ताओं ने साफ कहा कि यदि परिसीमन की प्रक्रिया में आदिवासी समाज के अधिकारों और प्रतिनिधित्व को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की गई तो राज्यभर में चरणबद्ध आंदोलन शुरू किया जाएगा. संगठनों ने मांग की कि झारखंड की विशेष सामाजिक और ऐतिहासिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए 1971 की जनगणना के अनुपात को आधार बनाया जाए और आदिवासियों के राजनीतिक अधिकारों से किसी प्रकार का समझौता न किया जाए.
बाहर से बसने वालों की गणना की मांग
बैठक में वक्ताओं ने कहा कि पिछले चार-पांच दशकों के दौरान झारखंड में बड़ी संख्या में बाहरी लोग आकर बसे हैं. उनका दावा था कि कई क्षेत्रों में अवैध तरीके से भी बसावट हुई है, जिससे राज्य की जनसांख्यिकीय संरचना प्रभावित हुई है. संगठनों ने मांग की कि परिसीमन से पहले ऐसे लोगों की पहचान और गणना की जाए. उनका कहना था कि केवल वर्तमान जनसंख्या के आंकड़ों के आधार पर परिसीमन करने से आदिवासी समाज के साथ अन्याय हो सकता है, क्योंकि इससे उनकी आबादी का वास्तविक और ऐतिहासिक अनुपात परिलक्षित नहीं होगा.
2007 के परिसीमन का हवाला, फिर दोहराया पुराना डर
बैठक में नेताओं ने वर्ष 2007 के परिसीमन विवाद का भी उल्लेख किया. वक्ताओं ने कहा कि उस समय भी परिसीमन आयोग के प्रस्तावों को लेकर व्यापक विरोध हुआ था. आदिवासी संगठनों को आशंका थी कि अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित विधानसभा सीटों की संख्या घट सकती है. इसी विरोध के कारण झारखंड को उस समय परिसीमन प्रक्रिया से अलग रखा गया था. नेताओं ने कहा कि आज भी वही स्थिति दोबारा पैदा होती दिखाई दे रही है, इसलिए समाज को अभी से सतर्क और संगठित रहने की जरूरत है.
28 से घटकर 22 सीटें होने की आशंका
बैठक में यह आशंका भी जताई गई कि यदि परिसीमन मौजूदा जनसंख्या के आधार पर किया गया तो झारखंड विधानसभा में एसटी आरक्षित सीटों की संख्या वर्तमान 28 से घटकर 22 तक पहुंच सकती है. वक्ताओं ने कहा कि यह केवल सीटों की संख्या का सवाल नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की राजनीतिक भागीदारी और निर्णय लेने की प्रक्रिया में उनकी हिस्सेदारी का मुद्दा है. उनका कहना था कि झारखंड राज्य के गठन के पीछे आदिवासी पहचान और अधिकारों की लंबी लड़ाई रही है, इसलिए किसी भी परिस्थिति में उनके प्रतिनिधित्व को कमजोर नहीं होने दिया जाएगा.
चरणबद्ध आंदोलन की तैयारी
बैठक में परिसीमन के मुद्दे पर जनजागरण अभियान चलाने और विभिन्न जिलों में बैठकों के आयोजन का निर्णय लिया गया. संगठनों ने कहा कि यदि उनकी मांगों को नजरअंदाज किया गया तो राज्यव्यापी आंदोलन शुरू किया जाएगा. वक्ताओं ने कहा कि यह सिर्फ राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि आदिवासी अस्तित्व, पहचान और संवैधानिक अधिकारों का प्रश्न है. इसलिए समाज के सभी वर्गों को एकजुट होकर इस मुद्दे पर आवाज उठानी होगी. बैठक में मौजूद नेताओं ने स्पष्ट किया कि आदिवासी हितों के खिलाफ किसी भी परिसीमन फार्मूले का पुरजोर विरोध किया जाएगा.

specializes in local and regional stories, bringing simple, factual, and timely updates to readers.



Leave a comment