सुप्रीम कोर्ट से पवन खेड़ा को राहत, मानहानि मामले में मिली अंतरिम जमानत
पवन खेड़ा को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है, जहां उन्हें मानहानि और जालसाजी से जुड़े मामले में अंतरिम जमानत प्रदान की गई. यह मामला हिमंता बिस्वा सरमा की पत्नी रिनिकी भुइयां को लेकर दिए गए कथित विवादित बयानों से जुड़ा है.

Guwahati: पवन खेड़ा को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है, जहां उन्हें मानहानि और जालसाजी से जुड़े मामले में अंतरिम जमानत प्रदान की गई. यह मामला हिमंता बिस्वा सरमा की पत्नी रिनिकी भुइयां को लेकर दिए गए कथित विवादित बयानों से जुड़ा है. अदालत ने जमानत देते हुए कुछ सख्त शर्तें भी लगाई हैं, जिनमें जांच में सहयोग करना और सबूतों से छेड़छाड़ न करना शामिल है. कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह राहत केवल अंतरिम है और मामले के अंतिम निर्णय को प्रभावित नहीं करेगी. इस फैसले को राजनीतिक और कानूनी दोनों दृष्टिकोण से अहम माना जा रहा है, क्योंकि इसमें व्यक्तिगत स्वतंत्रता और राजनीतिक अभिव्यक्ति के बीच संतुलन का सवाल भी जुड़ा हुआ है.
सुप्रीम कोर्ट का फैसला और शर्तें
सुप्रीम कोर्ट ने पवन खेड़ा को अंतरिम जमानत देते हुए स्पष्ट किया कि उन्हें जांच एजेंसियों के साथ पूरा सहयोग करना होगा. अदालत ने निर्देश दिया कि जब भी पुलिस उन्हें बुलाएगी, उन्हें उपस्थित होना अनिवार्य होगा. इसके अलावा, खेड़ा किसी भी तरह से सबूतों को प्रभावित या नष्ट नहीं कर सकते. कोर्ट ने यह भी शर्त रखी कि वे बिना अनुमति देश से बाहर यात्रा नहीं करेंगे. ट्रायल कोर्ट को जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त शर्तें लगाने का अधिकार भी दिया गया है. अदालत ने यह भी कहा कि जमानत आदेश में की गई टिप्पणियां अंतिम सुनवाई को प्रभावित नहीं करेंगी.
मामला क्या है?
यह विवाद उस समय शुरू हुआ जब पवन खेड़ा ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में हिमंता बिस्वा सरमा की पत्नी पर कई विदेशी पासपोर्ट और विदेशों में अघोषित संपत्तियों के आरोप लगाए. इन बयानों के बाद उनके खिलाफ मानहानि, जालसाजी और आपराधिक साजिश का मामला दर्ज किया गया. खेड़ा का कहना है कि उनके बयान राजनीतिक संदर्भ में दिए गए थे और उन्हें गलत तरीके से पेश किया गया. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि यह एफआईआर राजनीतिक प्रतिशोध के तहत दर्ज की गई है. वहीं शिकायतकर्ता पक्ष ने इन आरोपों को पूरी तरह झूठा बताया है.
गुवाहाटी हाई कोर्ट का रुख
सुप्रीम कोर्ट से पहले, गुवाहाटी हाई कोर्ट ने पवन खेड़ा की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी. हाई कोर्ट ने कहा था कि मामले की गंभीरता को देखते हुए हिरासत में पूछताछ जरूरी है. अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि खेड़ा ने एक ‘निर्दोष महिला’ को विवाद में घसीटा है, जो उचित नहीं है. कोर्ट के अनुसार, खेड़ा द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों की सत्यता की जांच करना आवश्यक है और इसके लिए कस्टोडियल इंटरोगेशन जरूरी हो सकता है. इसी आधार पर उनकी याचिका को खारिज कर दिया गया था.
असम सरकार का पक्ष
असम सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल ने खेड़ा की जमानत का विरोध किया. उनका कहना था कि खेड़ा ने फर्जी और छेड़छाड़ किए गए दस्तावेज पेश किए हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि खेड़ा फरार रहते हुए वीडियो जारी कर रहे थे और जांच में सहयोग नहीं कर रहे थे. सरकार ने यह भी कहा कि विदेशी कंपनियों और पासपोर्ट से जुड़े दस्तावेज संदिग्ध हैं और इनकी जांच के लिए हिरासत में पूछताछ जरूरी है. साथ ही यह भी आशंका जताई गई कि इस मामले में विदेशी तत्वों की भूमिका हो सकती है, जिसकी गहराई से जांच आवश्यक है.

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