झारखंड राज्यसभा चुनाव: क्या दोहराया जाएगा बिहार वाला खेल? क्या जयराम महतो बन सकते हैं किंगमेकर, कांग्रेस की सीट पर क्यों मंडरा रहा खतरा?
झारखंड में राज्यसभा चुनाव की आहट के साथ राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं. संख्या बल के आधार पर महागठबंधन दोनों सीटें जीतने की स्थिति में दिखाई देता है, लेकिन बिहार में हाल ही में हुए राज्यसभा चुनाव के घटनाक्रम ने झारखंड की राजनीति में भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं.

Ranchi: झारखंड में राज्यसभा चुनाव की आहट के साथ राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं. संख्या बल के आधार पर महागठबंधन दोनों सीटें जीतने की स्थिति में दिखाई देता है, लेकिन बिहार में हाल ही में हुए राज्यसभा चुनाव के घटनाक्रम ने झारखंड की राजनीति में भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं. सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या झारखंड में भी बिहार जैसा कोई राजनीतिक खेल हो सकता है? और अगर समीकरण बदले, तो क्या जयराम महतो किंगमेकर की भूमिका में उभर सकते हैं?
हेमंत सोरेन का उम्मीदवार लगभग सुरक्षित
झारखंड विधानसभा में कुल 81 विधायक हैं. राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए 28 वोटों की जरूरत होगी. महागठबंधन के पास फिलहाल 56 विधायक हैं. इनमें झामुमो के 34, कांग्रेस के 16, राजद के 4 और माले के 2 विधायक शामिल हैं. वहीं एनडीए के पास भाजपा, आजसू, जदयू और लोजपा (आर) को मिलाकर कुल 24 विधायक हैं. संख्या बल के हिसाब से देखा जाए तो झामुमो के लिए एक सीट निकालना मुश्किल नहीं है. 34 विधायकों के दम पर पार्टी अपना एक उम्मीदवार आसानी से राज्यसभा भेज सकती है. ऐसे में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन जिस उम्मीदवार को चुनेंगे, उसकी जीत लगभग तय मानी जा रही है.
असली लड़ाई दूसरी सीट की
राजनीतिक विश्लेषकों की नजर दूसरी सीट पर है. झामुमो यदि अपनी सीट निकाल लेती है, तो उसके पास 6 अतिरिक्त वोट बचेंगे. कांग्रेस के पास 16 विधायक हैं. जीत के लिए उसे 12 अतिरिक्त वोटों की जरूरत होगी. यानी कांग्रेस की जीत झामुमो के अतिरिक्त वोट, राजद के 4 और माले के 2 विधायकों के समर्थन पर निर्भर करेगी. यही वह बिंदु है जहां चुनाव का गणित दिलचस्प हो जाता है.
बिहार वाला खेल क्यों चर्चा में है?
बिहार राज्यसभा चुनाव में महागठबंधन के पास एक अतिरिक्त सीट जीतने का अवसर था, लेकिन मतदान के दौरान कांग्रेस के तीन और राजद के एक विधायक अनुपस्थित रहे. इसका फायदा एनडीए को मिला और पांचवीं सीट भी उसके खाते में चली गई. झारखंड में भी अब इसी उदाहरण की चर्चा हो रही है. राजनीतिक गलियारों में सवाल उठ रहा है कि क्या राज्यसभा चुनाव में सिर्फ संख्या बल काफी होगा या फिर आखिरी वक्त का राजनीतिक प्रबंधन निर्णायक साबित होगा?
बीजेपी की नजर कहां?
एनडीए के पास 24 विधायक हैं. उसे जीत के लिए चार अतिरिक्त वोटों की जरूरत होगी. भाजपा पहले ही संकेत दे चुकी है कि वह चुनाव को हल्के में नहीं ले रही है. प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी ने साफ कहा है कि उनकी पार्टी पूरी ताकत से चुनाव लड़ेगी. ऐसे में भाजपा की रणनीति सिर्फ अपने विधायकों को एकजुट रखने की नहीं होगी, बल्कि वह महागठबंधन के भीतर संभावित असंतोष, नाराजगी या राजनीतिक असहजता पर भी नजर रखेगी.
क्या जयराम महतो बन सकते हैं किंगमेकर?
राज्यसभा चुनाव की चर्चा में एक नाम तेजी से उभर रहा है—जयराम महतो. वर्तमान परिस्थितियों में उनका सिर्फ एक वोट दिखाई देता है, लेकिन अगर चुनावी समीकरण किसी कारण से बदलते हैं, क्रॉस वोटिंग होती है, कोई विधायक अनुपस्थित रहता है या किसी सहयोगी दल में असंतोष पैदा होता है, तो यही एक वोट बेहद महत्वपूर्ण हो सकता है. ऐसी स्थिति में जयराम महतो का रुख राजनीतिक रूप से काफी अहम हो जाएगा. वे किस उम्मीदवार का समर्थन करते हैं या मतदान के समय क्या रणनीति अपनाते हैं, इस पर भी नजर रहेगी.
कांग्रेस के सामने उम्मीदवार चयन की चुनौती
कांग्रेस के लिए चुनौती सिर्फ उम्मीदवार घोषित करने की नहीं है. पार्टी को ऐसा चेहरा सामने लाना होगा जिसे झामुमो, राजद और माले भी सहजता से स्वीकार करें. राज्यसभा चुनाव में कई बार उम्मीदवार की स्वीकार्यता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है जितना संख्या बल. यदि सहयोगी दलों के भीतर उम्मीदवार को लेकर असहजता पैदा होती है, तो उसका असर चुनावी गणित पर पड़ सकता है.
क्या राजद की भूमिका होगी अहम?
राजद के पास चार विधायक हैं. संख्या के लिहाज से यह छोटा आंकड़ा लग सकता है, लेकिन दूसरी सीट के मुकाबले में यह बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकता है. बिहार चुनाव के बाद राजनीतिक हलकों में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या झारखंड में राजद कांग्रेस के साथ पूरी मजबूती से खड़ा रहेगा या राज्यसभा चुनाव के दौरान अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं को भी सामने रखेगा. फिलहाल महागठबंधन के भीतर किसी मतभेद का सार्वजनिक संकेत नहीं है, लेकिन चुनाव नजदीक आते ही हर वोट की अहमियत बढ़ जाएगी.
फिलहाल आंकड़े महागठबंधन के पक्ष में दिखाई देते हैं और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का उम्मीदवार अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जा रहा है. लेकिन दूसरी सीट पर मुकाबला उतना सीधा नहीं दिख रहा. यही वजह है कि झारखंड का आगामी राज्यसभा चुनाव सिर्फ दो सीटों का चुनाव नहीं, बल्कि गठबंधन की एकजुटता, राजनीतिक प्रबंधन और विधायकों की निष्ठा की भी परीक्षा माना जा रहा है. अगर सब कुछ संख्या बल के हिसाब से हुआ, तो महागठबंधन दोनों सीटें जीत सकता है. लेकिन यदि बिहार जैसी परिस्थितियां बनीं, तो चुनाव का परिणाम आखिरी वक्त तक रोमांचक बना रह सकता है. और तब जयराम महतो जैसे छोटे लेकिन प्रभावशाली खिलाड़ी की भूमिका भी अचानक बड़ी हो सकती है.

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