कांग्रेस ने ही किया खेला? माले का हेमंत को खुला पत्र, गीता मंडल-हलधर महतो ने के. राजू पर उठाए बड़े सवाल
“क्या झारखंड राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस अपने ही जाल में फंस गई? क्या क्रॉस वोटिंग का आरोप लगाकर कांग्रेस असली सवालों से बचना चाहती है? और सबसे बड़ा सवाल, क्या महागठबंधन के भीतर अब भरोसा बचा है? ”

Ranchi: क्या झारखंड राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस अपने ही जाल में फंस गई? क्या क्रॉस वोटिंग का आरोप लगाकर कांग्रेस असली सवालों से बचना चाहती है? और सबसे बड़ा सवाल, क्या महागठबंधन के भीतर अब भरोसा बचा है? राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा की हार के बाद शुरू हुआ आरोप-प्रत्यारोप अब खुली सियासी लड़ाई में बदलता दिख रहा है. भाकपा (माले) ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को खुला पत्र लिखकर कांग्रेस पर गंभीर आरोप लगाए हैं. वहीं, पार्टी की केंद्रीय कमेटी सदस्य गीता मंडल और पोलित ब्यूरो सदस्य हलधर महतो ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कांग्रेस प्रभारी के. राजू को सीधे कटघरे में खड़ा कर दिया. माले का दावा है कि उसके दोनों विधायकों ने कांग्रेस उम्मीदवार को वोट दिया था और मतदान के बाद अधिकृत एजेंट के तौर पर उन्होंने खुद मतपत्र देखकर इसकी पुष्टि की थी. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर कांग्रेस किस आधार पर माले और राजद पर आरोप लगा रही है?
माले का दावा- दोनों विधायकों ने कांग्रेस को ही वोट दिया
प्रेस कॉन्फ्रेंस में गीता मंडल और हलधर महतो ने कहा कि राज्यसभा चुनाव के लिए पार्टी ने उन्हें अधिकृत पोलिंग एजेंट बनाया था. दोनों मतदान केंद्र पर मौजूद थे और भाकपा (माले) के दोनों विधायक अरूप चटर्जी और चंद्रदेव महतो ने मतदान के बाद उन्हें अपना मतपत्र दिखाया था. माले नेताओं का दावा है कि दोनों वोट कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा के पक्ष में पड़े थे. इसलिए कांग्रेस द्वारा माले पर क्रॉस वोटिंग का आरोप लगाना न सिर्फ गलत है, बल्कि राजनीतिक रूप से दुर्भावनापूर्ण भी है. यहीं से सवाल खड़ा होता है. अगर माले का दावा सही है, तो फिर कांग्रेस किस आधार पर माले को कटघरे में खड़ा कर रही है? क्या कांग्रेस के पास कोई ठोस प्रमाण है या फिर यह हार के बाद पैदा हुई राजनीतिक बेचैनी का नतीजा है?
के. राजू पर सीधा हमला, RPN सिंह का भी जिक्र
माले ने अपने पत्र में सिर्फ आरोपों का जवाब ही नहीं दिया, बल्कि कांग्रेस प्रभारी के. राजू पर भी बड़ा सवाल उठा दिया. पार्टी ने कहा कि कांग्रेस के पोलिंग एजेंट के. राजू समेत अन्य नेताओं ने नतीजे आते ही माले और राजद पर आरोप लगाना शुरू कर दिया. पत्र में यहां तक लिखा गया है कि "हमें पूरी आशंका है कि कांग्रेस के विधायकों ने पहले ही धोखा देने की साजिश रच ली थी और दूसरों पर आरोप मढ़ने की कहानी पहले से तैयार थी." माले ने पूर्व कांग्रेस नेता आरपीएन सिंह का उदाहरण देते हुए यह भी पूछा कि क्या के. राजू यह साबित कर सकते हैं कि उन्होंने माले और राजद के सभी विधायकों का मतपत्र देखा था? अगर नहीं, तो फिर इतने गंभीर आरोप किस आधार पर लगाए जा रहे हैं? राजनीतिक तौर पर यह बयान बेहद अहम है, क्योंकि अब माले बचाव की मुद्रा में नहीं, बल्कि सीधे कांग्रेस पर पलटवार की रणनीति में दिख रही है.
कांग्रेस पर पुराने जख्म भी कुरेदे
माले ने सिर्फ राज्यसभा चुनाव तक खुद को सीमित नहीं रखा. पत्र में 2022 के उस विवाद का भी जिक्र किया गया, जब कांग्रेस के तीन विधायक भारी मात्रा में नकदी के साथ पकड़े गए थे. माले ने लिखा कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन यह नहीं भूले होंगे कि उनकी सरकार गिराने की कोशिश में कांग्रेस के विधायक किस तरह की उछल-कूद कर रहे थे. पार्टी ने आरोप लगाया कि कांग्रेस नेताओं की सार्वजनिक बयानबाजी ही उनके राजनीतिक चरित्र को उजागर करती है. इतना ही नहीं, माले ने कांग्रेस पर कॉरपोरेट हितों से जुड़ने का भी आरोप लगाया और कहा कि कांग्रेस के मंत्री परिमल नाथवानी जैसे कॉरपोरेट हित साधकों से हाथ मिलाने में भी नहीं हिचकते. यानी माले का हमला सिर्फ क्रॉस वोटिंग के आरोप तक सीमित नहीं है. उसने कांग्रेस की विश्वसनीयता, राजनीतिक चरित्र और गठबंधन धर्म तीनों पर सवाल उठा दिए हैं.
क्या महागठबंधन में भरोसा खत्म हो रहा है?
यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा सवाल है. राज्यसभा चुनाव में हार-जीत तो हो गई, लेकिन उसके बाद जिस तरह कांग्रेस, माले और राजद आमने-सामने हैं, उससे यह साफ है कि महागठबंधन के भीतर सबकुछ सामान्य नहीं है. कांग्रेस को लगता है कि सहयोगियों ने साथ नहीं दिया. माले कह रही है कि कांग्रेस अपने विधायकों पर भरोसा नहीं कर पा रही. राजद भी कांग्रेस के आरोपों से नाराज है. और इन सबके बीच झामुमो और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन अभी तक बेहद संयमित और शांत दिखाई दे रहे हैं. क्या यह कुछ दिनों की राजनीतिक भड़ास है, जो समय के साथ खत्म हो जाएगी? या फिर राज्यसभा चुनाव ने महागठबंधन के भीतर उस अविश्वास को उजागर कर दिया है, जो अब तक बंद कमरों में छिपा हुआ था? झारखंड की राजनीति में यह सवाल फिलहाल सबसे बड़ा है. क्योंकि सरकार भले सुरक्षित दिख रही हो, लेकिन राजनीति सिर्फ आंकड़ों से नहीं, भरोसे से भी चलती है. और अगर भरोसा ही सवालों के घेरे में आ जाए, तो फिर यह मान लेना मुश्किल नहीं कि राज्यसभा चुनाव का "खेला" अभी खत्म नहीं हुआ है.



