सीपी सिंह हो सकते हैं बीजेपी विधायक दल के नेता
बाबूलाल मरांडी नेता प्रतिपक्ष का दर्जा पाने के लिए सदन के अंदर 4 साल तक संघर्ष करते रहे. प्रदेश अध्यक्ष पद मिलने के बाद भी वे विधानसभा चुनाव में बीजेपी को सीटें दिला नहीं सके, बल्कि उनके नेतृत्व में बीजेपी को 4 सीटों का नुकसान हो गया. ऐसे में बीजेपी को विधायकों का नेतृत्व करने और सरकार को सदन में घेरने के लिए एक तेज-तर्रार लीडर की जरूरत होगी.


रांची
:
झारखंड विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद बीजेपी जल्द ही प्रदेश में कई सांगठनिक बदलाव कर सकती है. दिसंबर के पहले सप्ताह में दिल्ली में केंद्रीय और प्रदेश के सीनियर नेताओं की बैठक होगी. इसमें एक-एक सीट पर हुई बीजेपी की हार की समीक्षा की जाएगी और नये सिरे से राज्य में बीजेपी को मजबूत करने की रणनीति बनाई जाएगी. बीजेपी ने राज्य में विधानसभा चुनाव बाबूलाल मरांडी के नेतृत्व में लड़ा था. इस लिहाज से विधायक दल का नेता उन्हें बनाया जाना चाहिए, लेकिन सूत्रों के मुताबिक उनकी जगह सीपी सिंह को विधायक दल का नेता चुना जा सकता है. 9 दिसंबर से झारखंड विधानसभा का सत्र बुलाया गया है. उससे पहले बीजेपी विधायकों की बैठक में विधायक दल के नेता का चुनाव होगा. इस विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 21 विधानसभा सीटें जीती है. दो सीनियर लीडर विधायक दल के नेता की रेस में होंगे. इसमें बाबूलाल मरांडी और सीपी सिंह के नाम शामिल हैं. चुनाव हारने के बाद दिल्ली से लेकर प्रदेश तक बाबूलाल मरांडी के नेतृत्व क्षमता पर सवाल खड़े होने लगे हैं. विक्षुब्धों का एक बड़ा गुट तैयार हो गया है, जो हार के लिए पूरी तरह से बाबूलाल मरांडी को जिम्मेवार ठहरा रहा है और नेतृत्व बदलने की मांग शुरू हो गई है. केंद्रीय नेतृत्व भी बाबूलाल से नाराज है. बाबूलाल मरांडी ने चुनाव में हार की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफे की भी पेशकश की थी. हालांकि केंद्रीय नेतृत्व ने फिलहाल उसे होल्ड पर रखा है. वहीं रांची सीट से लगातार सातवीं बार जीत दर्ज करने के बाद पार्टी के अंदर सीपी सिंह का कद और बढ़ गया है.
इसलिए सीपी सिंह बन सकते हैं नेता प्रतिपक्ष
बीजेपी ने 2019 के विधानसभा चुनाव के बाद बाबूलाल मरांडी को पार्टी में इस उम्मीद से लाया था कि वे आदिवासी वोटरों को बीजेपी की ओर मोड़ेंगे. ज्यादा से ज्यादा आदिवासी सीटों पर बीजेपी की जीत होगी, लेकिन हुआ उल्टा. बीजेपी में आने के बाद बाबूलाल मरांडी विधायक दल के नेता बनाये गये. बीजेपी ने उन्हें नेता प्रतिपक्ष के रूप में नामित किया, लेकिन उन्हें सदन में नेता प्रतिपक्ष का दर्जा नहीं मिल पाया. 4 साल तक बीजेपी के तमाम विधायक बाबूलाल मरांडी को नेता प्रतिपक्ष का दर्जा दिलाने के लिए सदन के अंदर और बाहर संघर्ष करते रहे. पार्टी ने अपने विधायकों की आवाज बुलंद करने के लिए बाबूलाल को नेता प्रतिपक्ष बनाया था, लेकिन पूरे पांच साल तक बाबूलाल मरांडी सदन के अंदर निरीह और असहाय नजर आये. न कोई ओजस्वी भाषण दिया और पार्टी और खुद का बचाव करने में सक्षम दिखे. वहीं सीपी सिंह 5 साल तक सदन के अंदर खूब एक्टिव रहे. जब भी मौका मिला सरकार को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी. कभी गंभीरता से तो कभी व्यंग्य से सरकार पर हावी रहे. हर मुद्दे पर बेबाकी से बोलते नजर आये.
बीजेपी को चाहिए तेज तर्रार नेता प्रतिपक्ष
आदिवासी वोटर्स को साधने के लिए बीजेपी ने बाबूलाल मरांडी को प्रदेश अध्यक्ष और विधायक दल का नेता बनाया था. चुनाव हारने के बाद साफ हो गया कि बाबूलाल आदिवासियों को नहीं साध पाये. अब बीजेपी के सामने 2029 के विधानसभा चुनाव में आदिवासियों को साधने की रणनीति बनाने से पहले राज्य में मजबूत विपक्ष के रूप में खड़ा होने की चुनौती होगी. सदन के अंदर पार्टी का नेतृत्व करने के लिए बीजेपी को एक वोकल, तेजतर्रार और अनुभवी नेता की जरूरत होगी.
बाबूलाल मरांडी पिछले 5 सालों में पार्टी में एक्टिव जरूर रहे, लेकिन उनमें वो जोश और ऊर्जा नजर नहीं आई जो संगठन के नेतृत्वकर्ता में होना चाहिए. बीजेपी के पास बाबूलाल सहित 21 विधायक हैं. इनमें फिलहाल सबसे अनुभवी और तेज तर्रार नेता सीपी सिंह ही नजर आ रहे हैं. इस वजह से भी सीपी सिंह को नेता प्रतिपक्ष बनाये जाने की चर्चा है.

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