खामेनेई की मौत के 5 दिन बाद भारत ने क्यों जताया शोक? कूटनीति, क्षेत्रीय संतुलन और पुरानी तनातनी की कहानी
“ईरान के सुप्रीम लीडर Ali Khamenei की मौत के 5 दिन बाद भारत ने आधिकारिक तौर पर शोक व्यक्त किया है. भारत सरकार की ओर से विदेश सचिव Vikram Misri ने नई दिल्ली स्थित ईरानी दूतावास जाकर शोक पुस्तिका पर हस्ताक्षर किए और संवेदना प्रकट की.”

ईरान के सुप्रीम लीडर Ali Khamenei की मौत के 5 दिन बाद भारत ने आधिकारिक तौर पर शोक व्यक्त किया है. भारत सरकार की ओर से विदेश सचिव Vikram Misri ने नई दिल्ली स्थित ईरानी दूतावास जाकर शोक पुस्तिका पर हस्ताक्षर किए और संवेदना प्रकट की. खामेनेई की मौत 28 फरवरी 2026 को United States और Israel के संयुक्त हवाई हमले में हुई थी. लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की हो रही है कि भारत ने तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय कई दिनों बाद शोक क्यों जताया. इस दौरान भारत सरकार की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया था. अब जब विदेश सचिव ने ईरानी दूतावास जाकर संवेदना व्यक्त की है, तो यह सवाल और भी तेज हो गया है कि आखिर नई दिल्ली ने इतना इंतजार क्यों किया. कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों और कूटनीतिक विश्लेषणों में इसके पीछे रणनीतिक और राजनीतिक कारण बताए जा रहे हैं.
रणनीतिक चुप्पी: भारत ने पहले क्यों नहीं दी प्रतिक्रिया
विश्लेषकों का मानना है कि खामेनेई की मौत के बाद भारत ने शुरुआत में जानबूझकर “रणनीतिक चुप्पी” बनाए रखी. उस समय पश्चिम एशिया में युद्ध तेजी से फैल रहा था और अमेरिका-इजरायल बनाम ईरान का टकराव लगातार बढ़ रहा था. ऐसे माहौल में भारत ने किसी भी पक्ष का खुलकर समर्थन या विरोध करने से बचने की कोशिश की. भारत की विदेश नीति लंबे समय से यह रही है कि पश्चिम एशिया के संकटों में संतुलित रुख अपनाया जाए और सभी पक्षों से संवाद की अपील की जाए. रिपोर्टों के मुताबिक नई दिल्ली ने पहले स्थिति को समझने और क्षेत्रीय प्रतिक्रिया देखने का इंतजार किया. इसी वजह से शुरुआती दिनों में भारत की ओर से सिर्फ तनाव कम करने और बातचीत के जरिए समाधान निकालने की अपील की गई, लेकिन खामेनेई की मौत पर सीधा बयान नहीं आया.
खामेनेई और भारत के बीच पुरानी तनातनी भी कारण
कुछ विश्लेषकों का कहना है कि भारत की सावधानी के पीछे एक और कारण था—खामेनेई के साथ पहले के विवादित बयान. पिछले कुछ वर्षों में खामेनेई ने कई बार भारत के आंतरिक मुद्दों, खासकर कश्मीर और भारत में मुस्लिम समुदाय से जुड़े मामलों पर टिप्पणी की थी. 2019 में अनुच्छेद 370 हटाने के बाद भी उन्होंने भारत की नीति की आलोचना की थी. 2020 के दिल्ली दंगों के दौरान भी उन्होंने सोशल मीडिया पर भारत सरकार पर अप्रत्यक्ष आरोप लगाए थे. इन बयानों के बाद भारत सरकार ने ईरान के राजनयिकों को तलब कर अपनी नाराजगी जताई थी. इसी पृष्ठभूमि के कारण भी भारत ने खामेनेई की मौत पर तुरंत प्रतिक्रिया देने से बचने की कोशिश की और कुछ समय बाद औपचारिक कूटनीतिक संवेदना व्यक्त की.
वैश्विक रुख भी रहा ऐसा ही
भारत का यह रुख अंतरराष्ट्रीय स्तर पर असामान्य भी नहीं माना जा रहा है. कई पश्चिमी लोकतांत्रिक देशों ने भी खामेनेई की मौत पर औपचारिक शोक संदेश जारी नहीं किया था. कई देशों ने इसे ईरान के राजनीतिक नेतृत्व और क्षेत्रीय संघर्षों से जुड़े विवादों के कारण एक संवेदनशील मामला माना. इसलिए अधिकांश सरकारों ने सीधे शोक जताने के बजाय क्षेत्र में शांति और स्थिरता की अपील पर जोर दिया. भारत ने भी इसी संतुलित कूटनीतिक रास्ते को चुना. हालांकि कुछ दिनों बाद विदेश सचिव द्वारा ईरानी दूतावास में कंडोलेंस रजिस्टर पर हस्ताक्षर करके भारत ने औपचारिक रूप से अपनी संवेदना दर्ज कराई, जिससे दोनों देशों के कूटनीतिक संबंधों में संतुलन बनाए रखने का संदेश दिया गया.


