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Home»राजनीति»जो बनाते थे सांसद, विधायक और सरकार, अब मेयर बनाने उतरे हैं मैदान में, ये है रघुवर दास की नई राजनीतिक मजबूरी?
राजनीति

जो बनाते थे सांसद, विधायक और सरकार, अब मेयर बनाने उतरे हैं मैदान में, ये है रघुवर दास की नई राजनीतिक मजबूरी?

“झारखंड की राजनीति में एक दौर ऐसा था जब रघुवर दास का नाम सत्ता की रणनीति और संगठन की पकड़ का प्रतीक माना जाता था. सरकार बनाना, विधायकों को साधना और दिल्ली तक असर बनाए रखना उनकी पहचान रही है.”

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Satya MishraEditorial Desk
Published Feb 19, 2026 · 12:15 PM· 4 min read
जो बनाते थे सांसद, विधायक और सरकार, अब मेयर बनाने उतरे हैं मैदान में, ये है रघुवर दास की नई राजनीतिक मजबूरी?

झारखंड की राजनीति में एक दौर ऐसा था जब रघुवर दास का नाम सत्ता की रणनीति और संगठन की पकड़ का प्रतीक माना जाता था. सरकार बनाना, विधायकों को साधना और दिल्ली तक असर बनाए रखना उनकी पहचान रही है. लेकिन अब तस्वीर बदली दिख रही है. वही रघुवर दास आज जमशेदपुर से सैकड़ों किलोमीटर दूर पलामू में नगर निकाय चुनाव के लिए पसीना बहाते नजर आ रहे हैं. जनसभाएं, प्रेस कॉन्फ्रेंस, प्रत्याशियों के घर जाकर समर्थन जुटाना—यह सब उनके राजनीतिक सफर के नए चरण की ओर इशारा करता है. सवाल उठ रहा है कि आखिर ऐसा क्या बदला कि राज्य और राष्ट्रीय स्तर की राजनीति करने वाला चेहरा अब शहर की सरकार बनाने के लिए मैदान में उतर गया है. क्या यह वापसी की तैयारी है या मजबूरी की राजनीति?

बदली हुई भूमिका या रणनीतिक वापसी?

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पलामू में जिस तरह से रघुवर दास सक्रिय नजर आए, वह सिर्फ एक चुनावी दौरा नहीं बल्कि एक राजनीतिक संदेश भी माना जा रहा है. कभी सत्ता के शीर्ष पर बैठकर राज्य की राजनीति को दिशा देने वाले नेता अब स्थानीय निकाय के चुनाव में सीधे तौर पर हस्तक्षेप कर रहे हैं. यह बदलाव बताता है कि राजनीति में जमीन से जुड़ाव फिर से प्राथमिकता बन रहा है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राज्य की सत्ता से दूरी के बाद संगठन में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए यह कदम उठाया गया है.

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वोट बैंक बनाम नैरेटिव: बयान के पीछे की राजनीति

अपने दौरे के दौरान रघुवर दास ने झारखंड मुक्ति मोर्चा और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पर संप्रदाय विशेष के वोट बैंक की राजनीति करने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि ये दल नागरिकों को बराबरी का दर्जा नहीं देते. हालांकि राजनीतिक हलकों में इस बयान को सिर्फ हमला नहीं बल्कि अपने समर्थकों को फिर से एकजुट करने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है. निकाय चुनाव के बहाने बड़ा राजनीतिक नैरेटिव सेट करने की कोशिश भी इसमें झलकती है.

बदलते सियासी दौर में रघुवर दास की नई भूमिका

यह भी पढ़ें:तीनपहाड़ स्टेशन पर यात्रियों को बताया गया RailOne App का आसान तरीका

पलामू दौरे के दौरान रघुवर दास ने चुनावी रणनीति का वही पुराना तरीका अपनाया, लेकिन पैमाना पूरी तरह बदल चुका है. बुधवार रात वे मेयर प्रत्याशी जयश्री गुप्ता के घर पहुंचे और गुरुवार सुबह मीना गुप्ता से मुलाकात की. दोनों ने उनकी मौजूदगी में बीजेपी समर्थित प्रत्याशी अरुणा शंकर को समर्थन देने का ऐलान किया. एक समय ऐसा था जब रघुवर दास विधानसभा और राज्यसभा चुनाव के लिए विधायकों और सहयोगियों का समर्थन जुटाते थे, जहां सत्ता का सीधा समीकरण तय होता था. लेकिन अब वही नेता नगर निकाय चुनाव में मेयर पद के लिए समर्थन का जोड़तोड़ करते दिख रहे हैं. यह बदलाव सिर्फ चुनाव का नहीं, बल्कि उनकी राजनीतिक भूमिका के दायरे में आए परिवर्तन का संकेत देता है.

झारखंड में नई सियासी जमीन की तलाश?

मेयर प्रत्याशी के समर्थन में घर-घर जाकर प्रचार करना और स्थानीय नेताओं को साथ लेकर चलना इस बात का संकेत देता है कि बीजेपी अपने पुराने चेहरों के जरिए फिर से जमीनी नेटवर्क मजबूत करना चाहती है. रघुवर दास का यह एक्टिव रोल सिर्फ एक नगर चुनाव तक सीमित नहीं दिखता, बल्कि इसे भविष्य की राजनीति के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है. अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह रघुवर दास की सियासी वापसी की शुरुआत है या फिर उनकी घटती राजनीतिक पकड़ का नया अध्याय.

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