हेमंत सोरेन के संकटमोचक नहीं रहे सुदिव्य सोनू, गुरुजी के शिष्य से ‘राजनीतिक चाणक्य’ तक का सफर
झारखंड की राजनीति में सुदिव्य कुमार सोनू के अचानक निधन से एक ऐसा चेहरा चला गया, जिसकी पहचान सिर्फ मंत्री या विधायक के तौर पर नहीं थी. संकट के समय पार्टी और सरकार के लिए आगे खड़े रहने वाले नेताओं में उनका नाम प्रमुखता से लिया जाता था.

Ranchi News: झारखंड की राजनीति में सुदिव्य कुमार सोनू के अचानक निधन से एक ऐसा चेहरा चला गया, जिसकी पहचान सिर्फ मंत्री या विधायक के तौर पर नहीं थी. झामुमो की राजनीति में लंबे समय तक संगठन से जुड़े रहे सुदिव्य सोनू को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के बेहद भरोसेमंद नेताओं में गिना जाता था. संकट के समय पार्टी और सरकार के लिए आगे खड़े रहने वाले नेताओं में उनका नाम प्रमुखता से लिया जाता था.
गुरुजी यानी शिबू सोरेन के दौर से झामुमो की राजनीति से जुड़े सुदिव्य सोनू ने संगठन के कार्यकर्ता से लेकर मंत्री और रणनीतिकार तक का सफर तय किया. गिरिडीह से लगातार दो बार विधायक बनने के बाद वह हेमंत सोरेन सरकार में कई महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभाल रहे थे.
1989 में शुरू हुआ राजनीतिक सफर, गुरुजी को माना आदर्श
सुदिव्य सोनू का राजनीतिक सफर 1989 से शुरू होने की बात कई प्रोफाइल में सामने आती है. अलग झारखंड राज्य के आंदोलन के दौर में उनकी मुलाकात शिबू सोरेन से हुई और वह झामुमो से जुड़ गए. लंबे समय तक संगठन में काम करने के बाद वह गिरिडीह में पार्टी के महत्वपूर्ण नेताओं में शामिल हुए.
राजनीति में शुरुआती दौर उनके लिए आसान नहीं रहा. 2009 और 2014 के विधानसभा चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा. लेकिन उन्होंने संगठन से अपना जुड़ाव नहीं छोड़ा. 2019 में गिरिडीह विधानसभा सीट से जीत दर्ज कर उन्होंने पहली बार विधानसभा में प्रवेश किया. 2024 में भी उन्होंने अपनी सीट बरकरार रखी.
हेमंत सोरेन के संकटमोचक क्यों कहे जाते थे सुदिव्य सोनू?
सुदिव्य सोनू की सबसे बड़ी राजनीतिक पहचान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के भरोसेमंद सहयोगी के तौर पर बनी. खासकर उस समय जब हेमंत सोरेन खुद राजनीतिक और कानूनी संकट से गुजर रहे थे, सुदिव्य सोनू झामुमो संगठन और सोरेन परिवार के साथ मजबूती से खड़े नजर आए.
उनकी भूमिका सिर्फ सरकार के मंत्री तक सीमित नहीं मानी जाती थी. पार्टी के भीतर रणनीति, संगठन और संकट के समय राजनीतिक संवाद में भी वह सक्रिय रहते थे. यही वजह है कि झामुमो की राजनीति में उन्हें हेमंत सोरेन का ‘संकटमोचक’ और रणनीतिकार कहा जाने लगा.
कल्पना सोरेन के राजनीतिक सफर से भी जुड़ा रहा नाम
सुदिव्य सोनू के राजनीतिक जीवन का एक महत्वपूर्ण अध्याय कल्पना सोरेन की सक्रिय राजनीति में एंट्री से भी जुड़ा माना जाता है.
हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी के बाद जब कल्पना सोरेन ने सक्रिय राजनीति में कदम रखा, तो गिरिडीह के गांडेय विधानसभा क्षेत्र से उनके चुनाव लड़ने की रणनीति को लेकर सुदिव्य सोनू की भूमिका की चर्चा हुई. गांडेय उपचुनाव में कल्पना सोरेन की जीत ने झारखंड की राजनीति में एक नया अध्याय खोल दिया.
गिरिडीह की एक सभा में जब कल्पना सोरेन मंच पर भावुक हुईं और भीड़ से ‘हेमंत दादा छूटेंगे’ जैसे नारे गूंजे, तब यह सिर्फ एक राजनीतिक सभा नहीं थी. झामुमो के लिए यह उस दौर का महत्वपूर्ण मोड़ था, जब पार्टी को हेमंत सोरेन की गैरमौजूदगी में अपना राजनीतिक चेहरा मजबूत करना था.
कल्पना सोरेन की राजनीतिक सक्रियता और बाद में उनकी चुनावी सफलता के पीछे जिन नेताओं की रणनीतिक भूमिका की चर्चा हुई, उनमें सुदिव्य सोनू का नाम भी प्रमुख रहा.
‘राजनीतिक चाणक्य’ की छवि कैसे बनी?
सुदिव्य सोनू को लेकर राजनीतिक हलकों में ‘मास्टर स्ट्रैटेजिस्ट’ और ‘झारखंड की राजनीति का चाणक्य’ जैसे विशेषण भी इस्तेमाल किए गए. इसकी वजह उनका लंबे समय तक संगठन में रहना और चुनावी राजनीति के साथ-साथ राजनीतिक परिस्थितियों को समझने की उनकी क्षमता मानी जाती थी.
उनकी राजनीति का एक खास पहलू यह था कि वह अक्सर पर्दे के पीछे की रणनीति और संवाद की भूमिका में दिखाई देते थे. यही वजह है कि उनकी राजनीतिक ताकत को सिर्फ उनके मंत्री पद से नहीं जोड़ा जाता था.
भाषा विवाद से लेकर छात्र आंदोलन तक सरकार का चेहरा बने
सुदिव्य सोनू सिर्फ चुनावी रणनीति तक सीमित नहीं रहे. झारखंड में भाषा और नियुक्ति परीक्षाओं से जुड़े विवादों में भी वह सरकार और आंदोलनकारियों के बीच संवाद का हिस्सा रहे.
भोजपुरी-मगही जैसे भाषा विवादों को लेकर सरकार के स्तर पर बनी समितियों और संवाद प्रक्रिया में भी उनकी सक्रियता रही. वहीं JPSC-JSSC समेत भर्ती परीक्षाओं को लेकर छात्रों के आंदोलन के दौरान सरकार की ओर से बातचीत करने वाले नेताओं में उनका नाम सामने आया.
2026 में भर्ती परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों पर छात्रों और सरकार के बीच बातचीत के लिए गठित मंत्री स्तरीय टीम में भी सुदिव्य सोनू शामिल थे. उनका फोकस आंदोलन को राजनीतिक टकराव में बदलने के बजाय संवाद के जरिए समाधान निकालने पर रहा.
हेमंत सरकार में कई महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी
2024 में विधानसभा चुनाव के बाद हेमंत सोरेन सरकार में सुदिव्य सोनू को कई महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी मिली. उनके पास उच्च एवं तकनीकी शिक्षा, नगर विकास एवं आवास, पर्यटन, कला-संस्कृति तथा खेल एवं युवा मामलों से जुड़े विभाग रहे.
मंत्री के रूप में उन्होंने शिक्षा, शहरी विकास और पर्यटन जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में काम किया. निधन से कुछ दिन पहले भी वह झारखंड के पर्यटन विकास को लेकर कर्नाटक के दौरे पर सरकारी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे थे.
हेमंत सोरेन ने कहा- बड़े भाई की तरह थे सुदिव्य सोनू
सुदिव्य सोनू के निधन पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भावुक श्रद्धांजलि दी. उन्होंने सुदिव्य सोनू को सिर्फ वरिष्ठ सहयोगी नहीं, बल्कि बड़े भाई की तरह बताया.
हेमंत सोरेन ने कहा कि सुदिव्य सोनू स्नेह देने वाले, मार्गदर्शन करने वाले और हर कठिन समय में मजबूती से साथ खड़े रहने वाले थे. उनके निधन को उन्होंने व्यक्तिगत क्षति बताते हुए कहा कि उनकी कमी हमेशा महसूस होगी.
झामुमो ने भी सुदिव्य सोनू के निधन को पार्टी, सरकार और झारखंड के लिए अपूरणीय क्षति बताया.
गिरिडीह ने विधायक खोया, झामुमो ने संगठन का पुराना चेहरा
सुदिव्य सोनू का राजनीतिक सफर इस मायने में भी खास रहा कि उन्होंने लंबे समय तक संगठन में काम करने के बाद चुनावी राजनीति में अपनी जगह बनाई. 2019 में पहली बार विधायक बनने के बाद वह हेमंत सरकार में मंत्री बने और 2024 में दोबारा विधायक चुने गए.
उनका अचानक चले जाना सिर्फ गिरिडीह विधानसभा सीट के लिए एक राजनीतिक रिक्तता नहीं है. झामुमो के लिए यह एक ऐसे संगठनकर्ता का जाना है, जो संकट के समय पार्टी के भीतर और सरकार के बाहर संवाद और रणनीति की भूमिका निभाता था.
सवाल अब यह भी है कि हेमंत सोरेन की राजनीति में सुदिव्य सोनू जिस तरह संकट के समय भरोसेमंद साथी और रणनीतिकार की भूमिका निभाते थे, उनकी जगह कौन लेगा?
सुदिव्य सोनू को अंतिम जोहार.

specializes in local and regional stories, bringing simple, factual, and timely updates to readers.
Related Posts




Leave a comment