दार्जिलिंग में फूटा राष्ट्रपति का गुस्सा: आदिवासियों को रोके जाने पर ममता सरकार पर उठे गंभीर सवाल
दार्जिलिंग में आयोजित आदिवासी सम्मेलन के दौरान राष्ट्रपति Droupadi Murmu ने मंच से नाराजगी जताते हुए कहा कि संथाल समुदाय के लोगों को कार्यक्रम स्थल तक पहुंचने से रोका गया. इस बयान के बाद Mamata Banerjee सरकार पर प्रोटोकॉल उल्लंघन और आदिवासी समुदाय के साथ व्यवहार को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं.

पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग में आयोजित अंतरराष्ट्रीय संथाल सम्मेलन के दौरान एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया जिसने ममता सरकार को सीधे सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया. देश की राष्ट्रपति Droupadi Murmu ने सार्वजनिक मंच से नाराजगी जताते हुए कहा कि संथाल समुदाय के कई लोगों को कार्यक्रम स्थल तक पहुंचने से रोक दिया गया. यह कार्यक्रम आदिवासी समाज से जुड़ा था और उसमें देश-विदेश से प्रतिनिधियों के शामिल होने की उम्मीद थी, लेकिन कथित प्रशासनिक रुकावटों ने पूरे आयोजन पर सवाल खड़े कर दिए. इतना ही नहीं, राष्ट्रपति के दौरे के दौरान राज्य सरकार की ओर से जरूरी प्रोटोकॉल का पालन नहीं किए जाने की बात भी सामने आई. बताया गया कि मुख्यमंत्री Mamata Banerjee सरकार की तरफ से कोई वरिष्ठ प्रतिनिधि राष्ट्रपति को रिसीव करने नहीं पहुंचा. इस पूरे मामले ने राजनीतिक माहौल गर्म कर दिया है और अब विपक्ष इसे आदिवासी सम्मान से जोड़कर सरकार पर निशाना साध रहा है.
आदिवासियों को रोके जाने का आरोप
दार्जिलिंग में आयोजित अंतरराष्ट्रीय संथाल सम्मेलन आदिवासी समुदाय की संस्कृति और पहचान से जुड़ा महत्वपूर्ण कार्यक्रम माना जाता है. लेकिन आयोजन के दौरान यह आरोप सामने आया कि कई संथाल समुदाय के लोगों को कार्यक्रम स्थल तक पहुंचने से रोका गया. राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में इस बात का जिक्र करते हुए साफ कहा कि किसी भी सांस्कृतिक सम्मेलन की असली ताकत उस समुदाय की भागीदारी होती है जिसके नाम पर कार्यक्रम हो रहा हो. ऐसे में अगर उसी समुदाय के लोगों को कार्यक्रम में आने से रोका जाए तो यह बेहद चिंताजनक बात है. उनके इस बयान के बाद यह मामला राजनीतिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बन गया.
प्रोटोकॉल को लेकर भी घिरी राज्य सरकार
राष्ट्रपति के कार्यक्रम को लेकर एक और बड़ा सवाल सरकारी प्रोटोकॉल को लेकर उठा. आरोप है कि राज्य सरकार की ओर से राष्ट्रपति के स्वागत के लिए कोई बड़ा प्रतिनिधि मौजूद नहीं था. भारत में राष्ट्रपति का दौरा बेहद संवेदनशील और औपचारिक माना जाता है, इसलिए प्रशासनिक स्तर पर विशेष तैयारियां और प्रोटोकॉल तय होते हैं. ऐसे में यदि इन नियमों का पालन ठीक से नहीं हुआ तो इसे गंभीर चूक माना जाता है. इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक हलकों में ममता सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठने लगे हैं.
संथाल इतिहास और आदिवासी संघर्ष को किया याद
अपने संबोधन में राष्ट्रपति ने संथाल समाज के गौरवशाली इतिहास और संघर्षों को भी याद किया. उन्होंने बताया कि आदिवासी समुदाय ने सदियों से अन्याय और शोषण के खिलाफ आवाज उठाई है. उन्होंने महान आदिवासी नायक Tilka Manjhi, Sidhu Murmu और Kanhu Murmu जैसे नेताओं के संघर्षों का जिक्र करते हुए कहा कि इन आंदोलनों ने आदिवासी अस्मिता और अधिकारों की लड़ाई को नई दिशा दी. राष्ट्रपति ने कहा कि संथाल समुदाय की परंपराएं, लोकगीत, नृत्य और सामाजिक संस्कृति भारत की विविधता का अहम हिस्सा हैं और इन्हें संरक्षित करना बेहद जरूरी है.
भाषा, पहचान और शिक्षा पर दिया खास जोर
राष्ट्रपति ने अपने भाषण में संथाल भाषा और उसकी लिपि के महत्व पर भी जोर दिया. उन्होंने याद दिलाया कि साल 2003 में संथाली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया था, जो आदिवासी समाज के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी. उन्होंने यह भी कहा कि Raghunath Murmu द्वारा विकसित ओल चिकी लिपि ने संथाल भाषा को नई पहचान दी. राष्ट्रपति ने आदिवासी युवाओं से अपील की कि वे शिक्षा और कौशल विकास के जरिए आगे बढ़ें, लेकिन अपनी भाषा, संस्कृति और परंपराओं से जुड़ाव बनाए रखें. उनका कहना था कि आधुनिक विकास और पारंपरिक मूल्यों के बीच संतुलन बनाकर ही आदिवासी समाज देश के विकास में और बड़ी भूमिका निभा सकता है.

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