क्या जयराम की आक्रामकता बन रही कमजोरी? देवेंद्रनाथ महतो बनेंगे JLKM का नया चेहरा?
झारखंड की राजनीति में JLKM के भीतर जयराम महतो के साथ देवेंद्रनाथ महतो का बढ़ता राजनीतिक कद चर्चा का विषय बन गया है. 2024 में चुनाव हारने के बावजूद देवेंद्रनाथ JPSC-JSSC और रोजगार से जुड़े आंदोलनों के जरिए युवाओं के बीच अपनी मजबूत पहचान बना रहे हैं.

Ranchi: झारखंड की राजनीति में JLKM को लेकर एक नई सियासी चर्चा तेज हो गई है. पार्टी प्रमुख जयराम महतो जहां अपने आक्रामक तेवर और लगातार सामने आ रहे विवादों के कारण विपक्षियों के निशाने पर हैं, वहीं उनकी ही पार्टी के नेता देवेंद्रनाथ महतो छात्र और भर्ती आंदोलनों के जरिए तेजी से अपनी अलग पहचान बनाते दिखाई दे रहे हैं. 2024 के विधानसभा चुनाव में जयराम ने डुमरी से जीत हासिल कर अपनी राजनीतिक ताकत का प्रदर्शन किया था, जबकि देवेंद्रनाथ सिल्ली से चुनाव लड़कर तीसरे स्थान पर रहे थे. लेकिन चुनाव के बाद तस्वीर कुछ बदली नजर आ रही है. JPSC-JSSC से जुड़े आंदोलन, धरना-प्रदर्शन और भर्ती व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर देवेंद्रनाथ लगातार सक्रिय हैं. ऐसे में राजनीतिक गलियारों में सवाल उठ रहा है कि क्या जयराम की आक्रामक राजनीति के बीच देवेंद्रनाथ धीरे-धीरे JLKM का नया युवा चेहरा बन रहे हैं?
जयराम की सबसे बड़ी ताकत अब चुनौती बन रही है?
जयराम महतो की राजनीति को समझने के लिए उनके छात्र आंदोलन वाले दौर को याद करना जरूरी है. तेज भाषण, सरकार पर सीधा हमला और युवाओं के मुद्दों को बेबाक तरीके से उठाने की शैली ने उन्हें कम समय में झारखंड के युवाओं के बीच लोकप्रिय बना दिया. 2024 के विधानसभा चुनाव में डुमरी से जीत दर्ज कर उन्होंने यह भी साबित किया कि उनकी लोकप्रियता केवल सोशल मीडिया या आंदोलनों तक सीमित नहीं है. विधायक बनने के बाद उन्होंने अपने क्षेत्र के लोगों के लिए कई पहल कीं और युवाओं से जुड़े मुद्दों को विधानसभा में भी उठाया. लेकिन इसी आक्रामक शैली के कारण उनका नाम लगातार विवादों में भी आता रहा है. पत्रकारों से कथित नोकझोंक, महिला पत्रकार से जुड़े मेमोरी कार्ड विवाद और बरवाअड्डा थाना प्रभारी के साथ कथित गाली-गलौज के मामले ने उनकी छवि को लेकर बहस तेज कर दी है. इन मामलों में आरोपों की कानूनी स्थिति अलग विषय है, लेकिन राजनीतिक तौर पर लगातार विवाद किसी भी नेता की छवि पर असर डाल सकते हैं. यही वजह है कि अब सवाल उठ रहा है कि जिस आक्रामकता ने जयराम को पहचान दिलाई, कहीं वही उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती तो नहीं बनती जा रही है.
चुनाव हारने के बाद भी देवेंद्र क्यों बढ़ा रहे हैं अपना कद?
देवेंद्रनाथ महतो की कहानी जयराम से थोड़ी अलग है. 2024 के विधानसभा चुनाव में JLKM ने उन्हें सिल्ली से मैदान में उतारा था, लेकिन वह जीत हासिल नहीं कर सके. चुनावी नतीजे उनके पक्ष में नहीं रहे, लेकिन इसके बाद उनकी राजनीतिक सक्रियता कम होने के बजाय और बढ़ती गई. JPSC और JSSC से जुड़े आंदोलनों में देवेंद्रनाथ लगातार युवाओं और प्रतियोगी छात्रों के बीच नजर आए. धरना, भूख हड़ताल और विधानसभा घेराव जैसे कार्यक्रमों में उनकी सक्रिय भूमिका ने उन्हें राज्य के छात्र वर्ग के बीच पहचान दिलाई. आंदोलन के दौरान पुलिस के साथ कथित धक्का-मुक्की से जुड़े वीडियो भी सोशल मीडिया पर चर्चा में रहे. हालांकि उनकी राजनीति में जयराम की तरह लगातार तीखी बयानबाजी कम और मुद्दों पर फोकस ज्यादा दिखाई देता है. भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता, प्रतियोगी परीक्षाओं में सुधार और युवाओं को योग्यता के आधार पर नौकरी देने की मांग को लेकर वह लगातार अपनी आवाज उठा रहे हैं. यही सक्रियता उन्हें JLKM के भीतर एक ऐसे चेहरे के तौर पर स्थापित कर रही है, जिसकी मौजूदगी अब पार्टी की राजनीति से आगे युवाओं के बीच भी महसूस की जा रही है.
आंदोलन खत्म हुआ, लेकिन देवेंद्रनाथ की राजनीतिक यात्रा नहीं रुकी
देवेंद्रनाथ महतो की खासियत यह है कि छात्र आंदोलन खत्म होने के बाद भी उन्होंने अपनी राजनीतिक सक्रियता को कमजोर नहीं पड़ने दिया. आम तौर पर आंदोलन से निकले नेताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि आंदोलन खत्म होने के बाद जनता के बीच अपनी मौजूदगी कैसे बनाए रखें, लेकिन देवेंद्रनाथ लगातार अलग-अलग मुद्दों और क्षेत्रों में पहुंचते दिखाई दे रहे हैं. वह भर्ती व्यवस्था सुधार यात्रा के जरिए युवाओं से संवाद कर रहे हैं और रोजगार से जुड़े सवालों को राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहे हैं. इसके अलावा मुख्यमंत्री के पैतृक गांव नेमरा में प्रदर्शन, सामाजिक और राजनीतिक घटनाओं से जुड़े लोगों से मुलाकात और झारखंड आंदोलन की विरासत से जुड़े परिवारों के साथ संपर्क ने उनके राजनीतिक दायरे को भी विस्तार दिया है. रांची से लेकर संथाल परगना, उत्तरी छोटानागपुर और दक्षिणी छोटानागपुर तक उनकी गतिविधियां इस बात का संकेत देती हैं कि वह केवल छात्र नेता की पहचान तक सीमित नहीं रहना चाहते. उनके लिए असली चुनौती अब यही है कि आंदोलन से मिली लोकप्रियता को स्थायी जनाधार में कैसे बदला जाए. अगर वह इसमें सफल होते हैं, तो उनकी राजनीतिक भूमिका JLKM के भीतर काफी बड़ी हो सकती है.
क्या देवेंद्रनाथ JLKM में जयराम के विकल्प बन सकते हैं?
यही सवाल इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा है. फिलहाल ऐसा कोई आधिकारिक संकेत नहीं है कि JLKM में जयराम महतो की जगह किसी दूसरे नेता को लाने की तैयारी हो रही है. जयराम पार्टी के प्रमुख चेहरे हैं, 2024 में विधानसभा चुनाव जीत चुके हैं और युवाओं के बीच उनकी अपनी मजबूत पहचान है. लेकिन राजनीति में परिस्थितियां हमेशा एक जैसी नहीं रहतीं. देवेंद्रनाथ का लगातार आंदोलन के मोर्चे पर रहना और रोजगार जैसे मुद्दों पर युवाओं के बीच सक्रिय होना उनके राजनीतिक कद को बढ़ा रहा है. खास बात यह है कि खुद जयराम महतो ने देवेंद्रनाथ को लेकर कहा है कि यदि वह भविष्य में जनता का विश्वास हासिल करके उनसे भी बड़ा राजनीतिक मुकाम हासिल करते हैं, तो वह इसका स्वागत करेंगे और उन्हें शुभकामनाएं देंगे. इसे नेतृत्व संघर्ष का सीधा संकेत नहीं माना जा सकता, लेकिन इतना जरूर है कि देवेंद्रनाथ अब JLKM के भीतर नजरअंदाज किए जाने वाले नेता नहीं रह गए हैं. अगर आने वाले समय में वह चुनावी राजनीति में भी सफलता हासिल कर लेते हैं और संगठन के भीतर अपनी पकड़ मजबूत करते हैं, तो नेतृत्व को लेकर यह चर्चा और तेज हो सकती है.
JLKM के लिए जयराम और देवेंद्रनाथ की जोड़ी या भविष्य का नेतृत्व संघर्ष?
फिलहाल जयराम महतो और देवेंद्रनाथ महतो को आमने-सामने खड़ा करना शायद जल्दबाजी होगी, क्योंकि दोनों की राजनीति में अभी खुला टकराव दिखाई नहीं देता. लेकिन यह भी सच है कि दोनों नेताओं के राजनीतिक रास्ते अब अलग-अलग तरीके से आगे बढ़ रहे हैं. जयराम ने जिस युवा आंदोलन को राजनीतिक वोट में बदलकर विधानसभा तक पहुंच बनाई, उसी युवा वर्ग के मुद्दों को अब देवेंद्रनाथ आंदोलन की जमीन पर लगातार उठा रहे हैं. जयराम के सामने जहां अपनी आक्रामक छवि को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब देने और विवादों से बाहर निकलने की चुनौती है, वहीं देवेंद्रनाथ के सामने आंदोलन से मिली लोकप्रियता को चुनावी सफलता में बदलने की चुनौती है. अगर देवेंद्रनाथ आने वाले वर्षों में युवाओं के साथ-साथ व्यापक सामाजिक आधार तैयार करने में सफल होते हैं, तो उनका कद JLKM में काफी बढ़ सकता है. लेकिन जयराम को रिप्लेस करने की बात अभी बहुत आगे की संभावना है. इसके लिए देवेंद्रनाथ को सिर्फ आंदोलनकारी नेता नहीं, बल्कि चुनावी और संगठनात्मक ताकत के रूप में भी खुद को साबित करना होगा. फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि JLKM के भीतर एक स्थापित चेहरा मौजूद है और उसके साथ ही एक नया चेहरा तेजी से उभर रहा है. आने वाला समय बताएगा कि यह उभार जयराम के नेतृत्व को मजबूत करेगा या भविष्य में JLKM के भीतर नेतृत्व की नई कहानी लिखेगा.

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