कैलाश मानसरोवर मार्ग पर मौत की नदी: भोटेकोशी की बाढ़ ने पवित्र यात्रा को निगल लिया, त्रिशूली-नारायणी तट पर 64 शव
नेपाल में भोटेकोशी नदी की विनाशकारी बाढ़ ने कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग समेत कई इलाकों में भारी तबाही मचा दी है. त्रिशूली और नारायणी नदी के किनारे अब तक 64 शव बरामद हो चुके हैं, जबकि 288 भारतीय नागरिकों के संपर्क में नहीं होने की जानकारी सामने आई है.


बुधवार की सुबह जब कैलाश मानसरोवर और गोसाइंकुंड की पवित्र यात्रा पर निकले सैकड़ों श्रद्धालु नेपाल-तिब्बत सीमा के पास थे, तब हिमालय की गोद से एक अकल्पनीय जलप्रलय फूट पड़ी. बर्फ, चट्टान और कीचड़ का विशाल दीवार भोटेकोशी नदी में समा गया और कुछ ही मिनटों में रसुवा के तिमुरे तथा स्याफ्रुबेसी को निगल लिया. पानी की वह दीवार नीचे की ओर दौड़ी, त्रिशूली और नारायणी नदी तंत्र में घुस गई और चितवन तक शव तथा मानव अवशेष बिखेरती चली गई. गुरुवार दोपहर तक दोनों नदियों के तटों से 64 शव बरामद हो चुके थे. भरतपुर अस्पताल का शवगृह भर गया है. भारत के विदेश मंत्रालय के अनुसार 288 भारतीय नागरिक अभी संपर्क से बाहर हैं, जिनमें बिजली परियोजना के कर्मचारी और तीर्थयात्री शामिल हैं. इक्कीस भारतीयों को बचाया जा चुका है. चीन की ओर करीब 200 भारतीय फंसे बताए जा रहे हैं. यह आपदा केवल प्राकृतिक नहीं, आस्था और जीवन की एक साथ हुई परीक्षा है.
बाढ़ कैसे फूटी: हिमनद ढहने से बना जल-दीवार
अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण और नेपाल के जलविज्ञान विभाग की प्रारंभिक रिपोर्ट के अनुसार 26 अगस्त सुबह 8:37 बजे 4.4 तीव्रता का कंपन दर्ज हुआ, लेकिन बाढ़ का मुख्य कारण भूकंप नहीं बल्कि तिब्बत की ओर लेंदे खोला में बर्फ-चट्टान का विशाल ढहना था. अवरुद्ध नदी अचानक फटी और लगभग दो करोड़ घनमीटर अतिरिक्त जल भोटेकोशी में उतर आया. स्याफ्रुबेसी और बेत्रावती के जलस्तर स्टेशन बह गए. बाढ़ दस घंटे में मुग्लिन और देवघाट तक पहुंच गई. ऊपरी क्षेत्र में बना कृत्रिम झील अभी पूरी तरह नहीं खुला है, इसलिए जोखिम बना हुआ है.
त्रिशूली-नारायणी तट: 64 शव और बढ़ता आंकड़ा
चितवन पुलिस प्रमुख एसपी रामेश्वर पौडेल के अनुसार त्रिशूली और नारायणी किनारे अब तक 64 शव तथा शरीर के अंग मिले हैं. कुछ शव पूरे हैं, कुछ टुकड़ों में. भरतपुर अस्पताल का शवगृह भर चुका है, इसलिए औद्योगिक प्रतिष्ठान के भवन को वैकल्पिक शवगृह बनाया जा रहा है. तीनों सुरक्षा एजेंसियां नदी तट पर खोज जारी रखे हुए हैं. अधिकारियों का कहना है कि अभियान जारी रहने पर संख्या और बढ़ सकती है. जिलावार आंकड़ों में चितवन सबसे आगे है.
288 भारतीय लापता, 21 बचाए गए
विदेश मंत्रालय प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने बताया कि 288 भारतीय अभी संपर्क में नहीं हैं. इनमें त्रिशूली-1 बिजली परियोजना पर काम कर रहे 73 कर्मचारी, तमिलनाडु के दो समूह (37 और 49), पश्चिम बंगाल के 32, विभिन्न राज्यों के 61 तथा केरल के 33 नागरिक शामिल हैं. ज्यादातर कैलाश मानसरोवर यात्रा पर थे. इक्कीस भारतीयों को बचा लिया गया है. चीन की ओर करीब 200 भारतीयों ने सहायता मांगी है. काठमांडू और बीजिंग स्थित दूतावासों ने चौबीस घंटे हेल्पलाइन शुरू की हैं. प्रधानमंत्री ने नेपाल के प्रधानमंत्री से बात कर हर संभव मदद का आश्वासन दिया है.
भारत की राहत: दो विमान, दस टन सामग्री और बेली ब्रिज
भारत ने दो विमानों से मानवीय सहायता भेजी है. पहले विमान में दस टन राहत सामग्री गई, दूसरे में 37.5 टन सामग्री जिसमें आठ टन दवाएं शामिल हैं. विदेश मंत्रालय में नियंत्रण कक्ष स्थापित किया गया है. बेली ब्रिज भी तैयार किए जा रहे हैं. नेपाल के अनुरोध पर complement जारी रहेगा. फील्ड अस्पताल समेत जो भी मांग आएगी, उस पर विचार होगा.
खोज अभियान: हेलीकॉप्टर, सुरक्षा बल और बाधित सड़कें
नेपाली सेना, पुलिस और सशस्त्र पुलिस बल के हजारों जवान तैनात हैं. हेलीकॉप्टरों से सैकड़ों लोगों को निकाला गया है, लेकिन ऊंचे जलस्तर और मलबे के कारण कई जगह लैंडिंग मुश्किल है. पुल, सड़कें और सीमा शुल्क कार्यालय बह गए हैं. रसुवागढ़ी से बेत्रावती तक का राजमार्ग टूटा हुआ है. कई जलविद्युत परियोजनाएं क्षतिग्रस्त हैं, जिससे बिजली आपूर्ति प्रभावित हुई है.
कैलाश और गोसाइंकुंड यात्री सबसे अधिक प्रभावित
बाढ़ ठीक उसी मार्ग पर आई जिससे भारतीय, नेपाली और विदेशी श्रद्धालु कैलाश मानसरोवर तथा गोसाइंकुंड जाते हैं. कई समूह सीमा पार करने की तैयारी में थे जब पानी आया. ईशा फाउंडेशन के सदस्य भी प्रभावित बताए गए. परिवार पूरे भारत में हेल्पलाइन और सोशल मीडिया पर जानकारी मांग रहे हैं. पर्यटन बोर्ड के अनुसार सैकड़ों विदेशी पर्यटक भी लापता सूची में हैं.
चेतावनी जारी: नदी किनारे न जाएं, सामान न उठाएं
प्रशासन ने लोगों से नदी तट पर भीड़ न लगाने और बहकर आए सामान को छूने से बचने की अपील की है. ऊपरी क्षेत्र में झील का दबाव बना हुआ है. बिहार और उत्तर प्रदेश में गंडक नदी पर निगरानी बढ़ाई गई है. वाल्मीकिनगर बराज पर जलस्तर पर नजर रखी जा रही है. यह आपदा हिमालय की नाजुक पारिस्थितिकी, मानसून और बढ़ते तापमान का कड़ा संदेश है. खोज-राहत का काम युद्ध स्तर पर चल रहा है, लेकिन शवों की पहचान, परिवारों का दुख और टूटे मार्गों का पुनर्निर्माण लंबा सफर होगा. नेपाल और भारत कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं, पर पहाड़ों से आई इस मौत की नदी ने आस्था के सबसे पवित्र मार्ग को भी नहीं छोड़ा.

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