नेपाल बाढ़: 165 मौतें, 826 लापता; बिहार-UP तक पहुंचा खतरा, 300 से ज्यादा भारतीयों की तलाश
नेपाल में आई भीषण फ्लैश फ्लड में अब तक 165 शव बरामद हुए हैं और 826 लोग लापता हैं. बड़ी संख्या में पर्यटकों और भारतीय नागरिकों के लापता होने की खबर है. बाढ़ के कारण सड़क, पुल और हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट को भारी नुकसान हुआ है.


नेपाल-तिब्बत सीमा से निकली पानी, मलबे और चट्टानों की ऐसी लहर ने तबाही मचाई है, जिसका असर अब नेपाल से निकलकर भारत की सीमा तक दिखाई दे रहा है. 26 अगस्त को अचानक आई फ्लैश फ्लड में नेपाल में अब तक 165 शव बरामद किए जा चुके हैं और 826 लोग लापता हैं. इनमें 579 पर्यटक शामिल हैं, जबकि 85 सुरक्षाकर्मियों का भी पता नहीं चल पाया है. दूसरी तरफ तिब्बत में भी सैकड़ों लोग लापता बताए गए हैं, इसलिए अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां नेपाल-तिब्बत क्षेत्र में कुल लापता लोगों की संख्या 1,300 से ज्यादा बता रही हैं. सबसे बड़ी चिंता भारतीय नागरिकों को लेकर है. नेपाल के अलग-अलग आंकड़ों में सैकड़ों भारतीयों के लापता होने की जानकारी सामने आई है. इसी बीच बाढ़ का पानी नारायणी-गंडक सिस्टम की ओर बढ़ने की आशंका से बिहार और उत्तर प्रदेश में हाई अलर्ट है.
लापता लोगों में 679 पर्यटक
नेपाल के ताजा सरकारी आंकड़ों के मुताबिक बाढ़ में 165 लोगों की मौत हो चुकी है और 826 लोग अभी भी लापता हैं. बरामद शवों में सबसे ज्यादा 65 चितवन, 27 धादिंग, 26 नवलपरासी ईस्ट, 20 गोरखा, 12 नुवाकोट, 9 तनहूं, 5 नवलपरासी वेस्ट और 2 शव रसुवा से मिले हैं. राहत और बचाव दल लगातार नदी के किनारे और प्रभावित इलाकों में तलाश कर रहे हैं. अभी तक 104 लोगों को बचाए जाने की जानकारी भी सामने आई है. लापता लोगों की सूची में 579 पर्यटक हैं. इनमें 466 विदेशी और 113 नेपाली नागरिक शामिल हैं. इसके अलावा 44 नेपाली सेना, 28 नेपाल पुलिस और 13 सशस्त्र पुलिस बल के जवान भी लापता हैं. यानी तबाही का असर सिर्फ स्थानीय आबादी तक सीमित नहीं है, बल्कि पर्यटक, तीर्थयात्री, सुरक्षाकर्मी और सीमा क्षेत्र में काम करने वाले लोग भी इसकी चपेट में आए हैं.
तिब्बत में भी बढ़ा मौत और लापता लोगों का आंकड़ा
इस आपदा की तस्वीर सिर्फ नेपाल के आंकड़ों से पूरी नहीं होती. चीन के तिब्बत क्षेत्र में भी भारी मलबा और पानी पहुंचा है. Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक तिब्बत में 558 लोग लापता बताए गए हैं, जिनमें करीब 260 विदेशी नागरिक हैं. वहां तीन मौतों की पुष्टि हुई है. इस तरह नेपाल और तिब्बत के आंकड़ों को साथ देखें तो लापता लोगों की संख्या 1,300 से ऊपर पहुंच जाती है. यही वजह है कि अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में लापता लोगों का आंकड़ा 1,300 से लेकर करीब 1,500 तक बताया जा रहा है. अंतर का कारण यह है कि नेपाली और चीनी एजेंसियां अपने-अपने क्षेत्र के अलग-अलग आंकड़े जारी कर रही हैं और कई लोगों की पहचान तथा लोकेशन अभी तक स्पष्ट नहीं हो पाई है.
लापता पर्यटकों में 466 विदेशी
बाढ़ ने उस इलाके को निशाना बनाया है जो नेपाल-चीन सीमा व्यापार के साथ-साथ हिमालयी पर्यटन और कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए महत्वपूर्ण है. शुरुआती नेपाल पर्यटन बोर्ड के आंकड़ों में 403 पर्यटक संपर्क से बाहर बताए गए थे, जिनमें 133 भारतीय थे. बाद में सरकारी समेकित आंकड़ों में लापता पर्यटकों की संख्या बढ़कर 579 हो गई. विदेशी नागरिकों में भारत के अलावा अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, कनाडा, मलेशिया और कई अन्य देशों के लोग शामिल हैं. Reuters ने ऑस्ट्रेलिया के 34 नागरिकों के लापता होने की भी पुष्टि की है. इनमें कैलाश मानसरोवर से जुड़े धार्मिक यात्रा समूह के लोग भी शामिल बताए गए हैं. भारत के लिए चिंता इसलिए ज्यादा है क्योंकि बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में भारतीय तीर्थयात्रियों और पर्यटकों की मौजूदगी काफी थी. अलग-अलग समय पर जारी सूचियों में भारतीयों की संख्या बदलती रही है और नेपाल में संपर्क टूटने वाले लोगों की पुष्टि का काम अभी जारी है.
आखिर इतनी तेजी से कैसे आई बाढ़?
बाढ़ की सबसे बड़ी पहेली अब काफी हद तक सुलझती दिखाई दे रही है. शुरुआती जानकारी में भूकंप को लेकर आशंका जताई गई थी, लेकिन बाद की जांच में मामला हिमस्खलन और नदी के रास्ते में अचानक पानी जमा होने से जुड़ा नजर आया. नेपाल के तकनीकी आकलन के मुताबिक तिब्बत की तरफ नदी के रास्ते में मलबा जमा होने से एक झील जैसी स्थिति बनी और उसके टूटने के बाद पानी की विशाल मात्रा अचानक नीचे की तरफ दौड़ पड़ी. Flood Forecasting Division की रिपोर्ट के मुताबिक इस अतिरिक्त पानी की वजह से देवघाट इलाके से ही करीब 2 करोड़ घन मीटर अतिरिक्त पानी गुजरा. Reuters और अमेरिकी वैज्ञानिक आकलनों में भी हिमनदी के हिस्से के टूटने और बर्फ-मलबे के नदी घाटी में गिरने को प्रमुख कारण माना गया है. यानी यह सामान्य बारिश से पैदा हुई बाढ़ नहीं थी, बल्कि बेहद कम समय में पानी और मलबे के बड़े पैमाने पर नीचे आने वाली आपदा थी.
चेतावनी सिस्टम भी फेल
इस हादसे की सबसे डरावनी बात इसकी रफ्तार थी. बाढ़ बुधवार सुबह करीब 9 बजे नेपाल के रसुवा इलाके में पहुंची और देखते ही देखते तिमुरे, स्याफ्रुबेसी और आसपास के इलाकों को अपनी चपेट में ले लिया. स्थानीय अधिकारियों के मुताबिक पानी अपने साथ चट्टान, मलबा, वाहन और इमारतों के हिस्से तक बहाकर ले गया. सबसे गंभीर सवाल चेतावनी व्यवस्था को लेकर उठ रहे हैं. नेपाल के बाढ़ पूर्वानुमान अधिकारियों के अनुसार उन्हें सीमा पार से आई बाढ़ की जानकारी मिलने में समय लगा. नदी पर लगे कई ऑटोमेटिक मॉनिटरिंग स्टेशन भी बाढ़ की चपेट में आकर बह गए. नेपाल News की रिपोर्ट के मुताबिक सीमा पार से बाढ़ आने के करीब 16 मिनट बाद नेपाली अधिकारियों को इसकी जानकारी मिली. यानी चेतावनी जारी होने तक पानी कई इलाकों में पहुंच चुका था. यही वजह है कि इतनी बड़ी संख्या में लोगों को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाने का मौका नहीं मिल सका.
19 पुल, 40 किलोमीटर सड़क और हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट तबाह
बाढ़ ने सिर्फ लोगों की जान नहीं ली, बल्कि नेपाल के इंफ्रास्ट्रक्चर को भी भारी नुकसान पहुंचाया है. शुरुआती रिपोर्टों के मुताबिक करीब 19 से 30 मोटरेबल पुल बह गए हैं और लगभग 40 किलोमीटर सड़क को नुकसान पहुंचा है. नौ जलविद्युत परियोजनाएं और नौ वाणिज्यिक बैंक शाखाएं भी प्रभावित हुई हैं. नेपाल News के अनुसार दस से ज्यादा हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट प्रभावित हुए हैं और करीब 430 मेगावाट बिजली उत्पादन क्षमता पर असर पड़ा है. इनमें 111 मेगावाट का रसुवागढ़ी प्रोजेक्ट, चिलिमे और त्रिशूली-3A जैसे प्रोजेक्ट शामिल हैं. इसका मतलब यह है कि राहत और बचाव अभियान के सामने सिर्फ लापता लोगों को खोजने की चुनौती नहीं है. कई जगह सड़क और पुल ही नहीं बचे हैं, जिससे राहत सामग्री और बचाव दलों को प्रभावित इलाकों तक पहुंचाना बेहद मुश्किल हो रहा है.
बिहार और UP में क्यों बढ़ी चिंता?
नेपाल से निकलने वाला बाढ़ का पानी आगे भोटेकोशी-त्रिशूली-नारायणी नदी तंत्र से होकर गुजरता है. नारायणी भारत में प्रवेश करने के बाद गंडक के रूप में बहती है. इसी वजह से बिहार और उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती जिलों में प्रशासन को अलर्ट किया गया है. केंद्र सरकार ने स्थिति को देखते हुए बिहार और उत्तर प्रदेश की सरकारों से संपर्क किया है. गृह मंत्री अमित शाह ने दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों से बात की और सीमा से जुड़े संवेदनशील इलाकों में NDRF तथा स्थानीय राहत टीमों को हाई अलर्ट पर रखने के निर्देश दिए गए. NDRF ने दोनों राज्यों में कुल 20 टीमें तैनात की हैं—बिहार में 9 और उत्तर प्रदेश में 11. गंडक के जलस्तर पर लगातार नजर रखी जा रही है. बिहार के सीमावर्ती इलाकों में लोगों को भी सतर्क रहने को कहा गया है.
बिहार में छह जिले अलर्ट, गंडक पर लगातार निगरानी
नेपाल की बाढ़ का सबसे सीधा असर बिहार के पश्चिम चंपारण क्षेत्र पर पड़ सकता है. इसके अलावा पूर्वी चंपारण, गोपालगंज, सारण, मुजफ्फरपुर और वैशाली समेत कई इलाकों में निगरानी बढ़ाई गई है. सीमावर्ती गांवों में जलस्तर और निचले इलाकों की स्थिति पर प्रशासन लगातार नजर रख रहा है. वाल्मीकिनगर के गंडक बैराज पर भी पानी के दबाव को देखते हुए कदम उठाए गए हैं. रिपोर्टों के मुताबिक बैराज के सभी 36 गेट खोले गए थे ताकि पानी के बहाव को नियंत्रित किया जा सके. हालांकि बाद के अपडेट में गंडक के जलप्रवाह में कुछ कमी आने की जानकारी भी सामने आई है. यानी फिलहाल बिहार में स्थिति को लेकर डर जरूर है, लेकिन प्रशासन इसे सिर्फ आशंका के स्तर पर देखते हुए तैयारी में जुटा है. लोगों से अफवाहों पर भरोसा न करने और प्रशासन की चेतावनी का पालन करने को कहा जा रहा है.
भारत समेत दुनिया मदद के लिए आगे, नेपाल में राहत अभियान तेज
नेपाल में सेना, पुलिस और स्थानीय राहत दल लगातार सर्च ऑपरेशन चला रहे हैं. नेपाली सेना ने रातभर भी अभियान जारी रखा. छह सैन्य हेलीकॉप्टरों ने 94 लोगों, पांच नागरिक हेलीकॉप्टरों ने 12 लोगों और ग्राउंड ऑपरेशन में 27 लोगों को बचाया. प्रभावित इलाकों में टेंट, मेडिकल सामग्री, भोजन और पानी भी पहुंचाया गया है. भारत ने नेपाल के लिए 10 टन मानवीय और आपदा राहत सामग्री भेजी है, जिसमें अस्थायी आश्रय सामग्री, कंबल, स्वच्छता किट, सोलर लैंप और दवाएं शामिल हैं. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मदद पहुंच रही है. Reuters के मुताबिक अमेरिका ने 5 लाख डॉलर की सहायता का ऐलान किया है, WHO ने मेडिकल सप्लाई भेजी है और इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ रेड क्रॉस एंड रेड क्रिसेंट सोसायटीज ने नेपाल रेड क्रॉस के लिए 10 लाख स्विस फ्रैंक की सहायता उपलब्ध कराई है.
फिलहाल नेपाल के सामने सबसे बड़ी चुनौती है—मलबे के नीचे और नदी के किनारे फंसे लोगों तक पहुंचना, लापता लोगों की पहचान करना और कट चुके इलाकों में राहत पहुंचाना. उधर भारत में बिहार और यूपी प्रशासन की नजर अब गंडक के हर उतार-चढ़ाव पर है. यह आपदा सिर्फ नेपाल की त्रासदी नहीं रही; हिमालय से निकलने वाली नदियों के कारण इसका असर अब पूरे उत्तर भारत की सुरक्षा व्यवस्था तक पहुंच चुका है.

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