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Home»National»सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश: सुरक्षित फैसला 3 महीने से ज्यादा नहीं रोक सकेंगे हाईकोर्ट
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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश: सुरक्षित फैसला 3 महीने से ज्यादा नहीं रोक सकेंगे हाईकोर्ट

“देश में लंबित मामलों और सुरक्षित रखे गए फैसलों में देरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा कदम उठाया है. शीर्ष अदालत ने सभी उच्च न्यायालयों के लिए समयबद्ध दिशा-निर्देश जारी करते हुए कहा है कि किसी मामले में सुनवाई पूरी होने के बाद यदि फैसला सुरक्षित रखा जाता है”

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Satya MishraEditorial Desk
Published May 29, 2026 · 7:33 AM· 4 min read
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश: सुरक्षित फैसला 3 महीने से ज्यादा नहीं रोक सकेंगे हाईकोर्ट

New Delhi: देश में लंबित मामलों और सुरक्षित रखे गए फैसलों में देरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा कदम उठाया है. शीर्ष अदालत ने सभी उच्च न्यायालयों के लिए समयबद्ध दिशा-निर्देश जारी करते हुए कहा है कि किसी मामले में सुनवाई पूरी होने के बाद यदि फैसला सुरक्षित रखा जाता है, तो उसे अधिकतम तीन महीने के भीतर सुनाया जाना चाहिए. अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जमानत जैसे मामलों में अनावश्यक देरी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रभावित करती है, इसलिए ऐसे मामलों में आदेश जल्द से जल्द जारी किए जाएं. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत ये निर्देश जारी किए हैं. अदालत का कहना है कि न्याय मिलने में अत्यधिक देरी से न्याय व्यवस्था पर लोगों का भरोसा प्रभावित होता है और वादियों को गंभीर नुकसान उठाना पड़ता है.

तीन महीने की समयसीमा तय

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जिन मामलों में फैसला सुरक्षित रखा गया है, उनमें निर्णय तीन महीने के भीतर सुनाया जाना चाहिए. अदालत ने यह भी व्यवस्था दी कि यदि निर्धारित अवधि के बाद भी फैसला नहीं सुनाया जाता है, तो मामले की जानकारी संबंधित हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखी जा सकती है. इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सुनवाई पूरी होने के बाद मामलों को लंबे समय तक लंबित न रखा जाए.

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जमानत मामलों के लिए अलग निर्देश

शीर्ष अदालत ने जमानत याचिकाओं पर विशेष जोर दिया है. कोर्ट ने कहा कि जहां संभव हो, जमानत पर आदेश उसी दिन सुनाया जाना चाहिए. यदि किसी कारणवश आदेश सुरक्षित रखा जाता है, तो उसे अगले दिन तक सुनाकर वेबसाइट पर अपलोड कर दिया जाना चाहिए. अदालत ने माना कि जमानत मामलों में देरी सीधे व्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रभावित करती है, इसलिए इन मामलों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए.

रिहाई प्रक्रिया में भी तेजी लाने का निर्देश

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जमानत मिलने के बाद आदेश तुरंत निचली अदालत और जेल प्रशासन तक पहुंचाया जाए. अदालत ने निर्देश दिया कि आवश्यक औपचारिकताएं पूरी होने के बाद विचाराधीन कैदी या दोषी को उसी दिन रिहा करने का प्रयास किया जाए. यदि ऐसा संभव न हो तो अगले दिन तक रिहाई सुनिश्चित की जाए. कोर्ट ने कहा कि आदेश जारी होने और उसकी जानकारी संबंधित अधिकारियों तक पहुंचने के बीच अनावश्यक देरी नहीं होनी चाहिए.

फैसलों की पारदर्शिता बढ़ाने पर जोर

नए दिशा-निर्देशों में अदालत ने यह भी कहा है कि सभी फैसलों और आदेशों को सुनाए जाने के 24 घंटे के भीतर हाई कोर्ट की वेबसाइट पर उपलब्ध कराया जाए. इससे पक्षकारों, वकीलों और आम लोगों को आदेश तक समय पर पहुंच मिल सकेगी. सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि डिजिटल माध्यमों के बेहतर उपयोग से न्यायिक प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाया जा सकता है.

लंबित फैसलों पर पहले भी जता चुका है चिंता

सुरक्षित रखे गए फैसलों में देरी का मुद्दा पिछले कुछ समय से सुप्रीम कोर्ट के सामने उठता रहा है. अदालत ने कई मामलों में टिप्पणी की थी कि महीनों और कभी-कभी वर्षों तक फैसला लंबित रहने से न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता प्रभावित होती है. इसी पृष्ठभूमि में शीर्ष अदालत ने सभी उच्च न्यायालयों के लिए एक समान व्यवस्था लागू करने का निर्णय लिया है. हाल के महीनों में इस विषय पर विभिन्न उच्च न्यायालयों से सुझाव भी मांगे गए थे और न्यायिक जवाबदेही बढ़ाने के लिए दिशा-निर्देशों का मसौदा तैयार किया गया था.

सुप्रीम कोर्ट के इन निर्देशों को न्यायिक प्रक्रिया में तेजी लाने और लंबित मामलों के बोझ को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है. अब सभी उच्च न्यायालयों को इन दिशा-निर्देशों के अनुरूप अपनी कार्यप्रणाली सुनिश्चित करनी होगी.

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