“अभिषेक को चुनो या मुझे”, कल्याण बनर्जी का ममता बनर्जी को खुला अल्टीमेटम, टीएमसी में फूट के संकेत तेज
पश्चिम बंगाल की राजनीति में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर जारी अंदरूनी खींचतान एक बार फिर सुर्खियों में है. पार्टी के वरिष्ठ नेता और चार बार के लोकसभा सांसद कल्याण बनर्जी के ताजा रुख ने संगठन के भीतर गहराते मतभेदों को उजागर कर दिया है.

West Bengal: पश्चिम बंगाल की राजनीति में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर जारी अंदरूनी खींचतान एक बार फिर सुर्खियों में है. पार्टी के वरिष्ठ नेता और चार बार के लोकसभा सांसद कल्याण बनर्जी के ताजा रुख ने संगठन के भीतर गहराते मतभेदों को उजागर कर दिया है. कल्याण बनर्जी ने न केवल पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी से जुड़े कानूनी मामले में पैरवी करने से इनकार किया, बल्कि इसे लेकर कड़े बयान भी दिए हैं. उन्होंने नेतृत्व को स्पष्ट संदेश देते हुए कहा कि पार्टी को अब तय करना होगा कि वह “वफादार नेताओं” के साथ खड़ी है या परिवारवाद के साथ. इस घटनाक्रम ने टीएमसी के भीतर चल रही गुटबाजी और नेतृत्व विवाद को और तेज कर दिया है, जिससे राजनीतिक हलकों में हलचल बढ़ गई है.
टीएमसी में बढ़ती बगावत और नेतृत्व संकट
सूत्रों और राजनीतिक घटनाक्रमों के अनुसार, तृणमूल कांग्रेस के भीतर असंतोष लगातार बढ़ता जा रहा है. कई विधायक और सांसद पार्टी नेतृत्व से असहमति जताते हुए दूरी बनाते नजर आ रहे हैं. बताया जा रहा है कि 60 से अधिक विधायक पार्टी के रुख से असंतुष्ट हैं, जबकि लोकसभा में भी कुछ सदस्यों के बीच नाराजगी देखी जा रही है. इसी बीच कल्याण बनर्जी के तीखे बयान और उनके रुख को पार्टी के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है. उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए कहा कि संगठन में निर्णय प्रक्रिया और सम्मान को लेकर गंभीर समस्याएं हैं. इस स्थिति ने टीएमसी की आंतरिक एकता पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
हाईकोर्ट केस से दूरी और गंभीर आरोप
कल्याण बनर्जी ने कलकत्ता हाईकोर्ट में चल रहे एक महत्वपूर्ण मामले में अभिषेक बनर्जी का प्रतिनिधित्व करने से साफ इनकार कर दिया. यह मामला कथित तौर पर विधायकों के हस्ताक्षर मिलान और सीआईडी समन से जुड़ा हुआ है, जिसमें अंतरिम सुरक्षा की भी मांग की गई है. सुनवाई के दौरान कल्याण बनर्जी अदालत में उपस्थित नहीं हुए, जिससे राजनीतिक चर्चा और तेज हो गई. उन्होंने मीडिया से कहा कि यह निर्णय केवल कानूनी नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर कथित “अहंकारी व्यवहार” के कारण लिया गया है. उनके अनुसार, वरिष्ठ नेताओं के साथ सम्मानजनक व्यवहार नहीं किया जा रहा है और फैसले एकतरफा तरीके से लिए जा रहे हैं, जिससे असंतोष बढ़ा है.
ममता बनर्जी के सामने नई चुनौती
इस पूरे घटनाक्रम ने टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी के सामने एक गंभीर राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है. कल्याण बनर्जी के बागी तेवर और उनके सार्वजनिक बयान पार्टी की एकजुटता पर असर डाल सकते हैं. उन्होंने यह भी कहा कि अब नेतृत्व को तय करना होगा कि वह परिवारवाद को प्राथमिकता देता है या लंबे समय से पार्टी के साथ जुड़े कार्यकर्ताओं और नेताओं को. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लगातार बढ़ते विवाद और अंदरूनी कलह आने वाले समय में पार्टी की रणनीति और संगठनात्मक मजबूती को प्रभावित कर सकते हैं. फिलहाल, टीएमसी के भीतर यह विवाद राज्य की राजनीति में एक बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है.

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