टेंडर कमीशन केस में आलमगीर को झटका! डिस्चार्ज पिटीशन हाईकोर्ट ने ठुकराई
“झारखंड के पूर्व ग्रामीण विकास मंत्री आलमगीर आलम को टेंडर कमीशन और मनी लॉन्ड्रिंग मामले में बड़ा झटका लगा है. झारखंड हाईकोर्ट ने उनकी डिस्चार्ज याचिका खारिज करते हुए विशेष पीएमएलए अदालत की कार्रवाई को सही ठहराया है. इसके साथ ही उनके खिलाफ चल रही कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ने का रास्ता साफ हो गया है.”

Ranchi : झारखंड के पूर्व ग्रामीण विकास मंत्री आलमगीर आलम को कथित टेंडर कमीशन और मनी लॉन्ड्रिंग मामले में बड़ा झटका लगा है. झारखंड हाईकोर्ट ने उनकी डिस्चार्ज याचिका खारिज करते हुए विशेष पीएमएलए अदालत द्वारा आरोप तय करने की प्रक्रिया को सही माना है. अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रवर्तन निदेशालय (ED) के समक्ष दर्ज बयान सामान्य पुलिस पूछताछ नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा माने जाएंगे. ऐसे में मामले से खुद को अलग करने की आलमगीर आलम की मांग को स्वीकार नहीं किया गया. हाईकोर्ट के फैसले के बाद अब उनके खिलाफ चल रही कानूनी कार्रवाई आगे बढ़ने का रास्ता साफ हो गया है. यह मामला ग्रामीण विकास विभाग में टेंडर आवंटन के दौरान कथित कमीशन वसूली और उससे जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग आरोपों से संबंधित है.
हाईकोर्ट ने क्यों खारिज की याचिका?
आलमगीर आलम की ओर से दायर याचिका में ईडी द्वारा पीएमएलए की धारा 50 के तहत दर्ज बयानों की वैधता पर सवाल उठाए गए थे. दलील दी गई थी कि ऐसे बयानों के आधार पर कार्रवाई उचित नहीं है. हालांकि हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया. अदालत ने अपने फैसले में कहा कि पीएमएलए कानून के तहत ईडी द्वारा दर्ज किए गए बयान न्यायिक कार्यवाही की श्रेणी में आते हैं, इसलिए उन्हें सामान्य पुलिस जांच की तरह नहीं देखा जा सकता. कोर्ट ने माना कि आर्थिक अपराध और मनी लॉन्ड्रिंग मामलों में पूछताछ और बयान दर्ज करने की प्रक्रिया कानूनी ढांचे के भीतर होती है. इसी आधार पर विशेष पीएमएलए कोर्ट द्वारा आरोप तय करने की कार्रवाई को भी सही ठहराया गया.
टेंडर सिस्टम में कथित कमीशनखोरी
जांच एजेंसियों के अनुसार मामला उस समय का है जब आलमगीर आलम ग्रामीण विकास मंत्री थे. आरोप है कि विभागीय टेंडरों में कथित तौर पर एक तय व्यवस्था के तहत ठेकेदारों से कमीशन लिया जाता था. ईडी की चार्जशीट में दावा किया गया है कि इस कथित नेटवर्क के जरिए करीब 37.55 करोड़ रुपये की अवैध वसूली हुई. आरोपों के मुताबिक निर्माण कार्यों से जुड़े टेंडर पास कराने और प्रक्रिया को प्रभावित करने के बदले कथित तौर पर आर्थिक लाभ लिया गया. हालांकि इन आरोपों पर अंतिम फैसला अदालत की सुनवाई के बाद ही होगा.
डायरी, कोड वर्ड और बयानों से जांच को मिला आधार
जांच के दौरान ईडी को कथित तौर पर कुछ डायरी और दस्तावेज मिले, जिनमें पैसों के लेन-देन और हिस्सेदारी से जुड़े संकेत दर्ज बताए गए हैं. एजेंसी का दावा है कि इन दस्तावेजों में कोड वर्ड का इस्तेमाल किया गया था, जिन्हें जांच के दौरान जोड़ा गया. इसके अलावा मामले के आरोपी माने जा रहे निलंबित चीफ इंजीनियर वीरेंद्र कुमार राम और पूर्व निजी सचिव संजीव लाल सहित अन्य लोगों के बयान भी जांच का हिस्सा बने. इन्हीं दस्तावेजों और बयानों के आधार पर एजेंसी ने अपनी कार्रवाई आगे बढ़ाई.
अब आगे क्या?
हाईकोर्ट द्वारा डिस्चार्ज याचिका खारिज होने के बाद यह साफ हो गया है कि आलमगीर आलम को फिलहाल राहत नहीं मिली है. अदालत का मानना है कि उपलब्ध साक्ष्य और बयान मुकदमे की सुनवाई जारी रखने के लिए पर्याप्त आधार बनाते हैं. अब आने वाले समय में विशेष अदालत में सुनवाई और सबूतों की जांच अहम होगी. इस केस पर राजनीतिक और कानूनी दोनों हलकों की नजर बनी हुई है, क्योंकि यह झारखंड के चर्चित कथित टेंडर कमीशन मामलों में शामिल है.

