16 दस्तावेज, पिता की गवाही... फिर भी नहीं मिला भारतीय नागरिक का दर्जा! Gauhati High Court ने बताई बड़ी वजह
गुवाहाटी हाई कोर्ट ने 16 दस्तावेज, NRC, PAN Card, वोटर ID और पिता की गवाही के बावजूद एक व्यक्ति को भारतीय नागरिक मानने से इनकार कर दिया. अदालत ने कहा कि वह अपने पूर्वजों से कानूनी संबंध और नागरिकता साबित करने में असफल रहा.

असम से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने भारतीय नागरिकता से जुड़े दस्तावेजों पर नई बहस छेड़ दी है. गुवाहाटी हाई कोर्ट ने एक व्यक्ति को भारतीय नागरिक मानने से इनकार कर दिया, जबकि उसने अपने पक्ष में 1951 से 2017 तक के 16 दस्तावेज, अपने पिता की मौखिक गवाही और कई सरकारी रिकॉर्ड अदालत में पेश किए थे.
कोर्ट ने कहा कि केवल दस्तावेजों का होना पर्याप्त नहीं है. सबसे अहम बात यह है कि याचिकाकर्ता अपने पूर्वजों से कानूनी रूप से जुड़ा हुआ 'लिंक' (Linkage) साबित नहीं कर सका। इसी आधार पर अदालत ने फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के फैसले को बरकरार रखा.
NRC से लेकर PAN Card तक, आखिर कौन-कौन से दस्तावेज कोर्ट में पेश किए गए?
याचिकाकर्ता, जो गुवाहाटी के बोरबोरी इलाके में किराये के मकान में रहकर दिहाड़ी मजदूरी करता है, ने खुद को भारतीय नागरिक साबित करने के लिए कुल 16 दस्तावेज पेश किए. इनमें 1951 का NRC रिकॉर्ड, 1966 से 2017 तक की विभिन्न वोटर लिस्ट, पैन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र (EPIC), स्कूल प्रमाणपत्र, जमीन की रजिस्ट्री और परिवार से जुड़े अन्य रिकॉर्ड शामिल थे. इसके अलावा उनके पिता ने भी अदालत में गवाही देकर दावा किया कि याचिकाकर्ता उनका बेटा है. इसके बावजूद जस्टिस कल्याण राय सुराना और जस्टिस शमीमा जहां की खंडपीठ ने कहा कि प्रस्तुत दस्तावेज याचिकाकर्ता और उसके बताए गए पूर्वजों के बीच कानूनी संबंध स्थापित नहीं कर सके. अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता फॉरेनर्स एक्ट, 1946 की धारा 9 के तहत यह साबित करने में असफल रहा कि वह विदेशी नहीं, बल्कि भारतीय नागरिक है.
आखिर कोर्ट ने NRC, PAN और वोटर ID को क्यों नहीं माना?
फैसले में अदालत ने विस्तार से बताया कि 1951 का NRC अपने आप में नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि यह रिकॉर्ड Census Act, 1948 के तहत तैयार किया गया था और कानून के अनुसार जनगणना से जुड़े रिकॉर्ड को अदालत में प्रत्यक्ष साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा पेश की गई NRC की कंप्यूटर कॉपी के साथ Evidence Act की धारा 65-B अब नए कानून के तहत संबंधित प्रावधान) के अनुसार आवश्यक इलेक्ट्रॉनिक प्रमाणपत्र भी नहीं था. अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि PAN Card और EPIC (Voter ID) नागरिकता का प्रमाण नहीं हैं। ये केवल पहचान या कर संबंधी दस्तावेज हैं और इनसे भारतीय नागरिकता स्वतः सिद्ध नहीं होती.
पिता की गवाही और स्कूल सर्टिफिकेट भी क्यों नहीं बचा सके मामला?
याचिकाकर्ता के पिता ने अदालत में मौखिक गवाही देकर उसे अपना बेटा बताया। लेकिन जिरह के दौरान वह अपने बेटे के जन्म वर्ष जैसी महत्वपूर्ण जानकारी स्पष्ट रूप से नहीं बता सके. अदालत ने माना कि नागरिकता जैसे गंभीर मामलों में केवल मौखिक बयान पर्याप्त नहीं होते. स्कूल प्रमाणपत्र को भी अदालत ने स्वीकार नहीं किया क्योंकि प्रमाणपत्र जारी करने वाले हेडमास्टर को गवाही के लिए पेश नहीं किया गया और न ही स्कूल का मूल प्रवेश रजिस्टर अदालत में प्रस्तुत किया गया. इसके अलावा अदालत ने विभिन्न वर्षों की वोटर लिस्ट में परिवार के सदस्यों की उम्र और विवरण में कई विसंगतियां भी दर्ज कीं। इन्हीं विरोधाभासों के आधार पर अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची कि प्रस्तुत रिकॉर्ड याचिकाकर्ता और उसके कथित पूर्वजों के बीच विश्वसनीय संबंध स्थापित नहीं करते. इस फैसले के साथ गुवाहाटी हाई कोर्ट ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि नागरिकता संबंधी मामलों में केवल दस्तावेजों की संख्या नहीं, बल्कि उनकी प्रमाणिकता, वैधानिक स्वीकार्यता और पूर्वजों से स्पष्ट कानूनी संबंध सबसे महत्वपूर्ण होते हैं.

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