वेनेज़ुएला पर अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के बाद ग्लोबल लेवल पर तनाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही थी. आमतौर पर ऐसी घटनाओं का सीधा असर शेयर बाजारों पर पड़ता है. निवेशक जोखिम से बचने लगते हैं, इक्विटी से पैसा निकलता है और सुरक्षित निवेश विकल्पों की मांग बढ़ जाती है. लेकिन इस बार तस्वीर कुछ अलग रही. भारतीय शेयर बाजारों ने इस भू-राजनीतिक घटनाक्रम को लगभग नजरअंदाज कर दिया और सीमित दायरे में ही कारोबार करते रहे. सोमवार, 5 जनवरी को सेंसेक्स और निफ्टी दोनों में बड़ी गिरावट नहीं दिखी. निफ्टी हल्की बढ़त के साथ बंद हुआ, जबकि बैंकिंग और ऑटो सेक्टर में 1 से 2 प्रतिशत तक की मजबूती नजर आई. टेक शेयरों में हल्की कमजोरी जरूर रही, लेकिन वह भी किसी बड़े डर का संकेत नहीं थी. बाजार के इस रुख ने साफ कर दिया कि निवेशक इस घटना को किसी बड़े वैश्विक संकट के तौर पर नहीं देख रहे हैं.
बाजार ने इसे संकट नहीं, “सीमित जोखिम” की घटना क्यों माना
विशेषज्ञों का मानना है कि निवेशकों ने वेनेज़ुएला पर अमेरिकी कार्रवाई को एक रिस्क प्रीमियम इवेंट की तरह लिया. यानी ऐसी खबर, जो थोड़ी अनिश्चितता तो पैदा करती है, लेकिन अर्थव्यवस्था की बुनियाद को नहीं हिलाती. बाजार अक्सर ऐसे जियोपॉलिटिकल रिस्क को पहले से ही कीमतों में शामिल कर लेते हैं. जब तक किसी घटना से कॉरपोरेट मुनाफे, महंगाई या आर्थिक ग्रोथ पर सीधा असर नहीं दिखता, तब तक निवेशक घबराहट में बड़े फैसले नहीं लेते. इस मामले में भी यही हुआ. निवेशकों को यह भरोसा था कि यह टकराव सीमित रहेगा और इसका असर भारत की अर्थव्यवस्था तक नहीं पहुंचेगा.
क्रूड ऑयल ने क्यों निभाई सबसे बड़ी भूमिका
भारतीय बाजारों की स्थिरता की सबसे बड़ी वजह कच्चे तेल की कीमतें रहीं. भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए जब भी किसी तेल उत्पादक देश से जुड़ा तनाव बढ़ता है, बाजार सबसे पहले क्रूड ऑयल पर नजर डालता है. अगर तेल महंगा होता है, तो भारत का इंपोर्ट बिल, महंगाई और चालू खाता घाटा—तीनों प्रभावित होते हैं. लेकिन इस बार ब्रेंट क्रूड करीब 60–61 डॉलर प्रति बैरल के आसपास ही बना रहा. न तो कीमतों में तेज उछाल आया और न ही सप्लाई बाधित होने के संकेत मिले. इसके अलावा ओपेक+ देशों ने भी फिलहाल उत्पादन स्तर में कोई बड़ा बदलाव नहीं करने का संकेत दिया, जिससे बाजार को राहत मिली.
वेनेज़ुएला की सीमित है ग्लोबल ऑयल मार्केट में भूमिका
एक अहम तथ्य यह भी है कि ग्लोबल क्रूड ऑयल सप्लाई में वेनेज़ुएला की हिस्सेदारी लगभग 1 प्रतिशत के आसपास ही है. यानी यह देश अकेले इतना बड़ा नहीं है कि उसके कारण पूरी दुनिया की तेल आपूर्ति प्रभावित हो जाए. इसी वजह से निवेशकों ने इस घटनाक्रम को सप्लाई शॉक की बजाय एक राजनीतिक जोखिम के तौर पर देखा. ब्रोकरेज फर्मों का कहना है कि जब तक कोई बड़ा तेल उत्पादक क्षेत्र या कई देश इस टकराव में शामिल नहीं होते, तब तक क्रूड ऑयल की कीमतों में लंबे समय तक उछाल की संभावना कम रहती है. यही सोच बाजार की चाल में भी दिखी.
किन हालात में सच में डर सकता है बाजार
विशेषज्ञों के मुताबिक बाजार की चिंता तब बढ़ेगी, जब ब्रेंट क्रूड लंबे समय तक 85 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बना रहे. ऐसा होने पर भारत का इंपोर्ट बिल तेजी से बढ़ेगा. अनुमान है कि तेल की कीमत में हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी से भारत का आयात खर्च करीब 17–18 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है. इसका सीधा असर महंगाई, रुपये की मजबूती और करंट अकाउंट डेफिसिट पर पड़ता है. लेकिन फिलहाल क्रूड इन स्तरों से काफी नीचे है, इसलिए बाजार को किसी बड़े झटके का डर नहीं है.
भारतीय कंपनियों का वेनेज़ुएला से जुड़ाव भी सीमित
कॉरपोरेट स्तर पर देखें तो भारतीय कंपनियों का वेनेज़ुएला से सीधा कारोबार बहुत ज्यादा नहीं है. कुछ सरकारी तेल कंपनियों और निजी रिफाइनर्स के पुराने व्यावसायिक संबंध जरूर रहे हैं, वहीं कुछ फार्मा कंपनियां भी वहां मौजूद हैं. लेकिन इनका कुल एक्सपोजर इतना बड़ा नहीं है कि इससे उनकी कमाई पर कोई बड़ा असर पड़े. इसी वजह से निवेशकों को कॉरपोरेट अर्निंग्स पर कोई तत्काल खतरा नजर नहीं आया और बाजार शांत बना रहा.
भारत की तैयारी ने भी बढ़ाया निवेशकों का भरोसा
पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अपने कच्चे तेल के आयात स्रोतों को काफी हद तक विविध बनाया है. अब भारत किसी एक देश या क्षेत्र पर निर्भर नहीं है. इसके अलावा देश के पास करीब 700 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है, जो किसी भी बाहरी झटके से निपटने में मदद करता है. यह मजबूत बैकअप निवेशकों के भरोसे को और बढ़ाता है कि भारत किसी भी वैश्विक अस्थिरता को संभाल सकता है.
लॉन्ग टर्म में क्या संकेत देती है यह घटना
हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि यह घटना एक बड़ा संकेत जरूर देती है. दुनिया तेजी से ज्यादा ध्रुवीकृत हो रही है. ऊर्जा, करेंसी और व्यापार को रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है. लेकिन शेयर बाजारों के लिए ये बातें तब तक अहम नहीं होतीं, जब तक उनका असर सीधे ग्रोथ, महंगाई और कंपनियों की कमाई पर न दिखे. फिलहाल भारतीय बाजार इसी सोच के साथ आगे बढ़ता दिख रहा है.


