US-Iran Clash: फिर भड़की जंग, कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर के पार, बढ़ा महंगाई का डर
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव से कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है. ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है. होर्मुज जलडमरूमध्य में सप्लाई प्रभावित होने की आशंका से भारत समेत वैश्विक बाजार में महंगाई का डर बढ़ गया है.

US-Iran Clash: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने एक बार फिर वैश्विक बाजारों की चिंता बढ़ा दी है. दोनों देशों के बीच नए हमलों के बाद कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला है. ब्रेंट क्रूड की कीमत जुलाई के बाद पहली बार 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई. वहीं अमेरिकी WTI क्रूड भी तेजी के साथ कारोबार कर रहा है. होर्मुज जलडमरूमध्य में तेल टैंकरों की आवाजाही प्रभावित होने की आशंका से सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ गई है. अगर तनाव लंबे समय तक जारी रहता है, तो इसका असर भारत समेत दुनियाभर में ईंधन की कीमतों, महंगाई, ट्रांसपोर्ट लागत और शेयर बाजार पर पड़ सकता है.
अमेरिका-ईरान तनाव से फिर बढ़ी तेल की कीमत
अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य तनाव बढ़ने के साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है. रिपोर्टों के मुताबिक फारस की खाड़ी और ओमान सागर में ईरानी जहाजों को निशाना बनाए जाने के बाद तेल सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ गई. इसके जवाब में ईरान की ओर से अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल हमले किए जाने की खबरों ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है. बाजार में आशंका है कि अगर दोनों देशों के बीच संघर्ष और बढ़ता है तो तेल उत्पादन और परिवहन पर बड़ा असर पड़ सकता है. यही वजह है कि ट्रेडर्स ने कच्चे तेल की कीमतों में संभावित सप्लाई जोखिम को शामिल करना शुरू कर दिया है. मार्च-अप्रैल-मई के दौरान देखे गए तनाव की तरह एक बार फिर ऊर्जा बाजार पर दबाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है.
जुलाई के बाद पहली बार 100 डॉलर के पार पहुंचा ब्रेंट क्रूड
10 सितंबर को ब्रेंट क्रूड की कीमत जुलाई के बाद पहली बार तीन अंकों में पहुंच गई. ब्रेंट क्रूड करीब 101.21 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचा, जबकि अमेरिकी WTI क्रूड करीब 96.05 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ. इसके साथ ही LNG की कीमतों में भी तेजी देखी गई. बाजार की चिंता खास तौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर है, क्योंकि यह वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है. अगर इस क्षेत्र में जहाजों की आवाजाही और प्रभावित होती है, तो तेल और गैस की कीमतों में आगे भी तेजी आ सकती है. निवेशक और ट्रेडर्स फिलहाल अमेरिका-ईरान संघर्ष से जुड़े घटनाक्रम पर लगातार नजर बनाए हुए हैं. कच्चे तेल की कीमतों में अचानक आई इस तेजी ने वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए ऊर्जा लागत बढ़ने का खतरा भी बढ़ा दिया है.
भारत में भी महंगा हुआ कच्चा तेल
अमेरिका-ईरान संघर्ष का असर भारतीय कच्चे तेल की कीमतों पर भी दिखाई दे रहा है. रिपोर्ट के अनुसार भारत के लिए कच्चे तेल की कीमत करीब 109 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई, जो पिछले चार महीनों का ऊंचा स्तर है. भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है. महंगे कच्चे तेल से पेट्रोल-डीजल, परिवहन और लॉजिस्टिक्स की लागत बढ़ने का दबाव बन सकता है. इसका असर धीरे-धीरे दूसरी वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है. विशेषज्ञों की चिंता यही है कि अगर तेल लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बना रहता है, तो महंगाई को नियंत्रित करना मुश्किल हो सकता है और घरेलू अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है.
महंगा तेल बढ़ा सकता है महंगाई का दबाव
कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी भारत के लिए चिंता का विषय बन सकती है. देश अपनी ऊर्जा जरूरतों का 80 फीसदी से अधिक हिस्सा आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में बदलाव का असर घरेलू अर्थव्यवस्था पर पड़ता है. महंगे तेल से ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स लागत बढ़ सकती है. इसका असर खाने-पीने की चीजों से लेकर रोजमर्रा के उपभोक्ता सामान तक देखने को मिल सकता है. उद्योगों की उत्पादन लागत बढ़ने पर कंपनियां कीमतों में बढ़ोतरी कर सकती हैं, जिससे महंगाई का दबाव बढ़ सकता है. इसके अलावा ज्यादा ईंधन लागत से कारोबारियों और आम लोगों के खर्च पर भी असर पड़ सकता है. अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं, तो आर्थिक विकास की रफ्तार पर भी दबाव पड़ने की आशंका है.
शेयर बाजार और कंपनियों की कमाई पर भी असर
कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल का असर शेयर बाजार पर भी पड़ सकता है. महंगे ईंधन से कंपनियों की उत्पादन, परिवहन और संचालन लागत बढ़ सकती है. इससे कई क्षेत्रों में कंपनियों के मुनाफे पर दबाव आने की आशंका रहती है. खासकर ऐसी कंपनियां जिनका कारोबार ईंधन और परिवहन लागत पर ज्यादा निर्भर है, उनके लिए स्थिति चुनौतीपूर्ण हो सकती है. दूसरी ओर, महंगाई बढ़ने की स्थिति में निवेशकों की धारणा भी प्रभावित हो सकती है. बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक अगर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लंबे समय तक बना रहता है और कच्चे तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर टिकती हैं, तो इसका असर कंपनियों की कमाई और शेयर बाजार के प्रदर्शन पर दिखाई दे सकता है. निवेशक फिलहाल भू-राजनीतिक घटनाक्रम और तेल बाजार की दिशा पर खास नजर रख रहे हैं.
होर्मुज जलडमरूमध्य बना सबसे बड़ी चिंता
तेल बाजार की सबसे बड़ी चिंता होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर है. यह समुद्री मार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण है और दुनिया की करीब पांचवीं हिस्से की तेल सप्लाई इस रास्ते से गुजरती रही है. अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण इस मार्ग से जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने की आशंका बढ़ गई है. केप्लर के आंकड़ों के मुताबिक पिछले 10 दिनों में औसतन करीब 10 कमोडिटी जहाज प्रतिदिन होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरे, जो मई के बाद सबसे निचला स्तर बताया जा रहा है. अगर यहां से तेल टैंकरों की आवाजाही और कम होती है, तो वैश्विक बाजार में सप्लाई संकट की आशंका बढ़ सकती है. यही कारण है कि कच्चे तेल की कीमतों में जोखिम प्रीमियम बढ़ रहा है.
होर्मुज के बाहर प्रतिबंधित क्षेत्र बनने की आशंका
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ने के साथ होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास प्रतिबंधों को लेकर भी चिंता बढ़ रही है. रिपोर्ट के मुताबिक ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव मोहसिन रेजाई ने आने वाले दिनों में होर्मुज जलडमरूमध्य के बाहर एक प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित किए जाने की बात कही है. यदि जहाजों की आवाजाही पर और पाबंदियां लगती हैं, तो वैश्विक तेल सप्लाई पर बड़ा दबाव पड़ सकता है. इसका सीधा असर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और गैस की कीमतों पर पड़ने की संभावना है. फिलहाल बाजार की नजर इस बात पर है कि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव किस दिशा में जाता है. संघर्ष बढ़ने की स्थिति में तेल की कीमतों में और तेजी देखने को मिल सकती है, जबकि तनाव कम होने पर बाजार में कुछ राहत भी संभव है.

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