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Home»झारखंड»कांग्रेस कनेक्शन, आदिवासी चेहरा और राज्यसभा गणित… क्या निशा उरांव पर बीजेपी खेल रही है बड़ा आदिवासी मास्टरस्ट्रोक?
झारखंड

कांग्रेस कनेक्शन, आदिवासी चेहरा और राज्यसभा गणित… क्या निशा उरांव पर बीजेपी खेल रही है बड़ा आदिवासी मास्टरस्ट्रोक?

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Satya MishraEditorial Desk
Published May 27, 2026 · 11:33 AM· 6 min read
कांग्रेस कनेक्शन, आदिवासी चेहरा और राज्यसभा गणित… क्या निशा उरांव पर बीजेपी खेल रही है बड़ा आदिवासी मास्टरस्ट्रोक?

झारखंड की राजनीति में इस समय सबसे रहस्यमयी नाम अगर कोई है, तो वह नेशा उरांव हैं. ना उन्होंने राजनीति में आने का ऐलान किया है, ना बीजेपी ने उन्हें लेकर कोई औपचारिक संकेत दिया है, लेकिन इसके बावजूद राजनीतिक गलियारों में चर्चा ऐसी चल रही है मानो कोई बड़ी पटकथा पहले से लिखी जा चुकी हो. पिछले कुछ महीनों में निशा उरांव जिस तरह धर्मांतरण, डिलिस्टिंग और “सरना-सनातन एक सांस्कृतिक धारा” जैसे मुद्दों पर मुखर हुई हैं, उसने उन्हें अचानक झारखंड की वैचारिक राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया है. अब सवाल सिर्फ इतना नहीं रह गया कि वह सामाजिक एक्टिविज्म कर रही हैं या नहीं. बड़ा सवाल यह है कि क्या बीजेपी उन्हें भविष्य के आदिवासी राजनीतिक चेहरे के तौर पर तैयार कर रही है? और क्या इसके पीछे राज्यसभा चुनाव से लेकर लोहरदगा की भविष्य की राजनीति तक का कोई बड़ा गेम प्लान छिपा है?

सरना-सनातन बहस से अचानक राजनीतिक केंद्र में कैसे आ गईं निशा उरांव?

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IRS अधिकारी रहीं निशा उरांव लंबे समय तक प्रशासनिक सेवा में रहीं, लेकिन हाल के दिनों में उनके बयान लगातार राजनीतिक अर्थों में पढ़े जाने लगे हैं. उन्होंने धर्मांतरण को आदिवासी समाज की जड़ों पर चोट बताया, डिलिस्टिंग के मुद्दे पर खुलकर बोला और “सरना-सनातन एक सांस्कृतिक धारा” जैसी बात कही. यहीं से उनका नाम उन मुद्दों से जुड़ गया, जिन्हें बीजेपी और संघ परिवार लंबे समय से उठाते रहे हैं. सोशल मीडिया पर उनकी तस्वीरें कुछ दक्षिणपंथी मंचों और वैचारिक कार्यक्रमों में दिखीं तो राजनीतिक अटकलें तेज हो गईं. सवाल उठने लगा कि क्या बीजेपी झारखंड में नया आदिवासी नैरेटिव तैयार कर रही है और निशा उरांव उसी प्रोजेक्ट का हिस्सा हैं? हालांकि अब तक नेशा उरांव ने किसी राजनीतिक दल में शामिल होने का संकेत नहीं दिया है, लेकिन राजनीति में कई बार बयान ही सबसे बड़ा संकेत माने जाते हैं.

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राज्यसभा का गणित और बीजेपी की सबसे बड़ी चुनौती

इस पूरे मामले का सबसे दिलचस्प पहलू राज्यसभा चुनाव का गणित है. झारखंड में राज्यसभा चुनाव जीतने के लिए लगभग 28 विधायकों के समर्थन की जरूरत होती है, जबकि बीजेपी के पास फिलहाल करीब 24 विधायक हैं. यानी बीजेपी के पास अपने दम पर सीट निकालने का नंबर नहीं है. यहीं से “सॉफ्ट उम्मीदवार” वाली चर्चा शुरू होती है. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बीजेपी अगर ऐसा चेहरा सामने लाती है, जो सिर्फ बीजेपी का पारंपरिक नेता ना लगे बल्कि दूसरे दलों के कुछ विधायकों के लिए भी स्वीकार्य हो, तो खेल बदल सकता है. निशा उरांव का नाम इसी संदर्भ में फिट बैठता दिखता है. वह आक्रामक बीजेपी नेता की छवि नहीं रखतीं, प्रशासनिक पृष्ठभूमि से आती हैं और आदिवासी समाज में एक शिक्षित चेहरे के रूप में उभर रही हैं. ऐसे में अगर बीजेपी उन्हें आगे करती है, तो यह सिर्फ चुनावी नहीं बल्कि रणनीतिक कदम माना जाएगा.

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निशा उरांव की चर्चा सिर्फ वैचारिक वजहों से नहीं हो रही, बल्कि उनके राजनीतिक बैकग्राउंड की वजह से भी हो रही है. उनके पिता रामेश्वर उरांव कांग्रेस के वरिष्ठ आदिवासी नेता हैं. वह मंत्री रह चुके हैं और फिलहाल विधायक हैं. कांग्रेस के आदिवासी विधायकों के बीच उनकी व्यक्तिगत पकड़ मानी जाती है. यहीं से राजनीतिक विश्लेषकों को संभावित “क्रॉस वोटिंग” का एंगल दिखाई देता है. अगर बीजेपी किसी पारंपरिक नेता की बजाय नेशा उरांव जैसे चेहरे को उम्मीदवार बनाती है, तो क्या कांग्रेस के भीतर कुछ विधायक असहज हो सकते हैं? क्या व्यक्तिगत रिश्ते और सामाजिक समीकरण पार्टी लाइन पर भारी पड़ सकते हैं? झारखंड की राजनीति में यह कोई असंभव संभावना नहीं मानी जाती. राज्यसभा चुनाव हमेशा सिर्फ विचारधारा पर नहीं, बल्कि रिश्तों, मैनेजमेंट और नेटवर्क पर भी लड़े जाते रहे हैं. यही वजह है कि राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा लगातार तेज हो रही है कि बीजेपी सीधे टकराव की बजाय “सॉफ्ट एंट्री” वाला रास्ता तलाश सकती है.

लेकिन क्या सच में बीजेपी की तैयारी चल रही है?

हालांकि इस पूरे नैरेटिव के बीच सबसे अहम बात यह है कि अब तक कोई ठोस राजनीतिक संकेत सामने नहीं आया है. ना बीजेपी ने कोई ऑफर स्वीकार किया है, ना नेशा उरांव ने राजनीति में आने की घोषणा की है. इतना ही नहीं, बीजेपी के बड़े संगठनात्मक नेताओं — जैसे बाबूलाल मरांडी, अमित शाह या प्रदेश नेतृत्व — के साथ उनकी कोई खुली राजनीतिक मीटिंग भी सार्वजनिक तौर पर सामने नहीं आई है. यही वजह है कि फिलहाल पूरी कहानी “संकेतों”, “राजनीतिक आकलनों” और “संभावनाओं” पर खड़ी दिखाई देती है. लेकिन राजनीति में कई बार सबसे बड़ी कहानी वही होती है, जिसका आधिकारिक ऐलान नहीं हुआ होता. और झारखंड की आदिवासी राजनीति अभी जिस मोड़ पर खड़ी है, वहां बीजेपी को ऐसे चेहरे की जरूरत महसूस हो सकती है, जो सिर्फ चुनावी उम्मीदवार ना हो बल्कि वैचारिक नैरेटिव भी सेट कर सके.

नेशा उरांव: सामाजिक कार्यकर्ता, वैचारिक चेहरा या भविष्य की नेता?

फिलहाल सबसे बड़ा सच यही है कि नेशा उरांव अब सिर्फ एक पूर्व IRS अधिकारी नहीं रह गई हैं. वह झारखंड की बदलती आदिवासी राजनीति का एक बड़ा “पॉलिटिकल सस्पेंस” बन चुकी हैं. उनके समर्थक उन्हें आदिवासी अस्मिता की नई आवाज बता रहे हैं, जबकि विरोधी उन्हें संघ परिवार के वैचारिक विस्तार के रूप में देख रहे हैं. लेकिन इन दोनों धारणाओं के बीच एक तीसरी संभावना भी मौजूद है — कि शायद नेशा उरांव फिलहाल सिर्फ सामाजिक मुद्दों पर सक्रिय हों और राजनीति में आने की चर्चाएं जरूरत से ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर पेश की जा रही हों. लेकिन इतना तय है कि झारखंड में सरना-सनातन, डिलिस्टिंग और आदिवासी पहचान की बहस अब सिर्फ सामाजिक मुद्दा नहीं रह गई है. यह आने वाले समय की राजनीति, सत्ता और नेतृत्व की लड़ाई का आधार बनती जा रही है.

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