ईरान में खामेनेई युग का अंत, अब सत्ता पर किसका कब्जा? असेम्बली ऑफ एक्सपर्ट्स की भूमिका अहम हुई
“ईरान में सर्वोच्च नेतृत्व को लेकर पैदा हुआ संकट अब वैश्विक चिंता का विषय बन चुका है. खामेनेई के बाद देश में उत्तराधिकार की जंग तेज हो गई है, जहां धार्मिक नेतृत्व, रिवोल्यूशनरी गार्ड्स और राजनीतिक धड़े अपनी-अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटे हैं.”

मध्य पूर्व एक बार फिर युद्ध की आग में घिर गया है. अमेरिका और इजरायल के हमलों के बाद ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत ने हालात को और ज्यादा विस्फोटक बना दिया है. तेहरान से लेकर तेल अवीव तक मिसाइल और ड्रोन हमलों का सिलसिला जारी है, वहीं पूरी दुनिया की नजर अब इस बात पर है कि इस टकराव का असर वैश्विक तेल बाजार और अर्थव्यवस्था पर कितना गहरा पड़ेगा. ईरान दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडारों में से एक पर बैठा है और हॉर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरने वाली सप्लाई में जरा सी रुकावट भी पूरी दुनिया में ऊर्जा संकट पैदा कर सकती है. खामेनेई की मौत के बाद ईरान के भीतर सत्ता का नया समीकरण भी बन रहा है, जिससे राजनीतिक अस्थिरता और बढ़ सकती है. ऐसे में सवाल यह है कि क्या यह संघर्ष सीमित रहेगा या पूरी दुनिया को एक बड़े आर्थिक झटके की ओर धकेल देगा.
ईरान में सत्ता का संकट गहराया
ईरान के राजनीतिक ढांचे में सर्वोच्च नेता की भूमिका सिर्फ धार्मिक नहीं बल्कि पूरी शासन व्यवस्था की धुरी होती है. खामेनेई की मौत के बाद ईरान के अंदर अचानक एक शक्ति शून्य पैदा हो गया है. इस शून्य को भरने के लिए ईरान की असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स को नया नेता चुनना होगा, लेकिन युद्ध के हालात में यह प्रक्रिया आसान नहीं है. सत्ता के भीतर मौजूद अलग-अलग गुट अब अपनी-अपनी ताकत दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे आने वाले दिनों में राजनीतिक अस्थिरता और बढ़ सकती है.
उत्तराधिकार की दौड़: कौन संभालेगा ईरान की कमान
खामेनेई के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगला सर्वोच्च नेता कौन होगा. इस दौड़ में कई बड़े नाम सामने आ रहे हैं—धार्मिक प्रतिष्ठा वाले मौलाना, न्यायपालिका प्रमुख, और सुरक्षा प्रतिष्ठान से जुड़े नेता. साथ ही खामेनेई के बेटे मोजतबा खामेनेई का नाम भी प्रमुखता से लिया जा रहा है. अगर सत्ता का हस्तांतरण पारंपरिक धार्मिक ढांचे से हटकर सुरक्षा प्रतिष्ठान के हाथों में जाता है, तो ईरान की नीतियों में और आक्रामकता देखने को मिल सकती है.
IRGC की भूमिका: सैन्य प्रतिष्ठान बन सकता है असली ताकत
ईरान का इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी IRGC पहले से ही देश की सैन्य और रणनीतिक नीतियों में अहम भूमिका निभाता रहा है. खामेनेई के बाद यह संस्था और ज्यादा प्रभावशाली हो सकती है. अगर IRGC नेतृत्व के चयन में निर्णायक भूमिका निभाता है, तो यह संकेत होगा कि ईरान का झुकाव सैन्य राष्ट्रवाद की ओर और बढ़ रहा है.
तेहरान से दुबई तक: मिसाइल और ड्रोन हमलों से दहला क्षेत्र
हमलों का दायरा अब सिर्फ ईरान और इजरायल तक सीमित नहीं रहा. दुबई, कतर, इराक और बहरीन तक हमलों की खबरें सामने आ चुकी हैं. इससे पूरे खाड़ी क्षेत्र में असुरक्षा का माहौल बन गया है. एयर डिफेंस सिस्टम लगातार सक्रिय हैं और नागरिक इलाकों में भी खतरा बना हुआ है. यह स्थिति वैश्विक व्यापार और हवाई यातायात को भी प्रभावित कर सकती है.
हॉर्मुज स्ट्रेट बना सबसे बड़ा फ्लैशपॉइंट
दुनिया की करीब 20% तेल सप्लाई जिस समुद्री रास्ते से गुजरती है, वह है हॉर्मुज जलडमरूमध्य. अगर इस रास्ते पर जरा भी रुकावट आती है, तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर सीधा असर पड़ेगा. ईरान पहले भी संकेत दे चुका है कि जरूरत पड़ने पर वह इस रास्ते को बंद कर सकता है. युद्ध की स्थिति में यह खतरा और ज्यादा वास्तविक हो गया है.
तेल के खजाने पर बैठा ईरान, सप्लाई पर मंडराया खतरा
ईरान के पास दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा सिद्ध तेल भंडार है. करीब 208-209 अरब बैरल का यह भंडार वैश्विक बाजार के लिए बेहद अहम है. युद्ध के चलते उत्पादन या निर्यात में कोई भी बाधा वैश्विक तेल कीमतों को उछाल सकती है. यह असर सिर्फ ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि महंगाई और आर्थिक विकास पर भी पड़ेगा.
क्रूड ऑयल 100 डॉलर के पार? बाजार में बढ़ी आशंका
अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड पहले ही बढ़कर 70 डॉलर के आसपास पहुंच चुका है. विश्लेषकों का मानना है कि अगर संघर्ष लंबा खिंचता है और सप्लाई बाधित होती है, तो कीमतें 90 से 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकती हैं. इससे दुनिया भर में पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ेंगी और महंगाई का नया दौर शुरू हो सकता है.
चीन को सबसे बड़ा झटका लगने की आशंका
चीन ईरान का सबसे बड़ा तेल खरीदार है और उसकी ऊर्जा सुरक्षा काफी हद तक इस सप्लाई पर निर्भर करती है. अगर ईरानी तेल का प्रवाह रुकता है, तो चीन को वैकल्पिक स्रोतों की तलाश करनी होगी, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है. इससे वैश्विक सप्लाई चेन पर भी असर पड़ेगा.
भारत समेत एशियाई देशों की बढ़ी चिंता
भारत, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देश भी मध्य पूर्व से बड़े पैमाने पर तेल आयात करते हैं. अगर कीमतें बढ़ती हैं, तो इन देशों के चालू खाते और मुद्रास्फीति पर दबाव पड़ेगा. भारत जैसे देशों के लिए यह बजट और आर्थिक नीति के लिहाज से बड़ी चुनौती बन सकता है.
अमेरिका और इजरायल की रणनीति: क्षेत्रीय संतुलन बदलने की कोशिश
अमेरिका और इजरायल का मानना है कि ईरान का सैन्य और परमाणु कार्यक्रम क्षेत्रीय संतुलन के लिए खतरा है. इसलिए इन हमलों को वे एक रणनीतिक कदम के रूप में पेश कर रहे हैं. लेकिन इससे पूरे क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ी है और युद्ध के फैलने का खतरा भी पैदा हो गया है.
क्षेत्रीय संघर्ष का खतरा गहराया
ईरान ने जवाबी हमलों में कई देशों में मौजूद अमेरिकी ठिकानों और इजरायली लक्ष्यों को निशाना बनाया है. अगर यह टकराव और बढ़ता है, तो यह एक पूर्ण क्षेत्रीय युद्ध में बदल सकता है, जिसमें कई देश सीधे तौर पर शामिल हो सकते हैं.
महंगाई और मंदी का डर
तेल की कीमतों में तेज उछाल का असर दुनिया की हर अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा. महंगाई बढ़ेगी, उत्पादन लागत बढ़ेगी और कई देशों में आर्थिक विकास धीमा पड़ सकता है. इससे वैश्विक मंदी का खतरा भी बढ़ सकता है.
ईरान के अंदर हालात: जनता, सेना और राजनीति के बीच संतुलन
खामेनेई की मौत के बाद ईरान के अंदर जनता का गुस्सा, शोक और अनिश्चितता तीनों देखने को मिल रहे हैं. सरकार और सेना के सामने चुनौती है कि वह देश के अंदर स्थिरता बनाए रखे और बाहरी खतरे का सामना भी करे.
कूटनीति बनाम युद्ध: क्या कोई रास्ता बचेगा
कई देश इस संकट को कूटनीति के जरिए सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं. G7 और संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर बातचीत की तैयारी है. लेकिन जमीन पर जारी हमलों को देखते हुए शांति का रास्ता फिलहाल मुश्किल नजर आ रहा है.
दुनिया किस दिशा में जाएगी
आने वाले कुछ दिन इस पूरे संकट के लिए निर्णायक होंगे. अगर संघर्ष सीमित रहता है, तो बाजार धीरे-धीरे स्थिर हो सकता है. लेकिन अगर हॉर्मुज स्ट्रेट बंद होता है या युद्ध और फैलता है, तो दुनिया एक बड़े आर्थिक और ऊर्जा संकट की ओर बढ़ सकती है.

