बांकीपुर सीट पर RJD की एंट्री से बदला खेल, क्या मुश्किल में फंस गए प्रशांत किशोर?
बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में आरजेडी द्वारा रेखा गुप्ता को उम्मीदवार बनाए जाने से मुकाबला त्रिकोणीय हो गया है. इससे प्रशांत किशोर के चुनावी डेब्यू की राह कठिन मानी जा रही है. बीजेपी के मजबूत गढ़ मानी जाने वाली इस सीट पर अब जातीय समीकरण, विपक्षी वोटों का बिखराव और पारंपरिक वोटबैंक चुनावी नतीजों

Bankipur: बिहार की बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव अब बेहद दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गया है. भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष नितिन नवीन के इस्तीफे के बाद खाली हुई इस सीट पर जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने चुनावी राजनीति में अपना पहला कदम रखा है. लेकिन अब राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने भी अपने पत्ते खोलते हुए रेखा गुप्ता को उम्मीदवार घोषित कर मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है. कांग्रेस चाहती थी कि विपक्ष इस सीट पर एकजुट होकर प्रशांत किशोर का समर्थन करे, लेकिन आरजेडी ने अलग उम्मीदवार उतारकर चुनावी समीकरण बदल दिए हैं. ऐसे में अब मुकाबला केवल बीजेपी बनाम प्रशांत किशोर नहीं रह गया, बल्कि जातीय समीकरण, वोटों का बिखराव और पारंपरिक वोटबैंक इस चुनाव के नतीजे तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं. बांकीपुर लंबे समय से बीजेपी का गढ़ रहा है, इसलिए यह उपचुनाव सभी दलों के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है.
प्रशांत किशोर के चुनावी डेब्यू पर RJD का बड़ा दांव
राजनीतिक रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर पहली बार चुनावी मैदान में उतर रहे हैं और उन्होंने इसके लिए बीजेपी के सबसे मजबूत गढ़ माने जाने वाले बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र को चुना है. उन्होंने इस उपचुनाव को राज्य सरकार के कामकाज पर जनमत संग्रह बताया है और बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, शिक्षा, कानून-व्यवस्था तथा अन्य जनहित के मुद्दों को प्रमुखता से उठाया है. हालांकि कांग्रेस चाहती थी कि विपक्ष इस सीट पर साझा उम्मीदवार के रूप में प्रशांत किशोर का समर्थन करे, लेकिन आरजेडी ने ऐसा नहीं किया. पार्टी ने 2025 का विधानसभा चुनाव लड़ चुकी रेखा गुप्ता को दोबारा मैदान में उतार दिया. इससे विपक्षी वोटों के बंटने की संभावना बढ़ गई है. अब प्रशांत किशोर को न सिर्फ बीजेपी के मजबूत संगठन का सामना करना होगा, बल्कि विपक्षी वोटों के विभाजन की चुनौती भी झेलनी पड़ेगी.
जातीय समीकरण क्यों बनाता है बांकीपुर को खास?
बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र का जातीय समीकरण इस सीट की राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण पहलू माना जाता है. करीब 3.91 लाख मतदाताओं वाले इस क्षेत्र में कायस्थ समुदाय सबसे प्रभावशाली माना जाता है और यही वजह है कि बीजेपी यहां 1995 से लगातार जीत दर्ज करती रही है. अनुमानित तौर पर कायस्थ मतदाता करीब 14 प्रतिशत हैं. इनके बाद यादव लगभग 12 प्रतिशत, मुस्लिम 10 प्रतिशत, चंद्रवंशी और वैश्य समुदाय 9-9 प्रतिशत, दलित 8 प्रतिशत, भूमिहार और ब्राह्मण 7-7 प्रतिशत, राजपूत और कुर्मी 5-5 प्रतिशत तथा कुशवाहा समुदाय करीब 3 प्रतिशत माना जाता है. बीजेपी को परंपरागत रूप से कायस्थ, ब्राह्मण, राजपूत और वैश्य समाज का अच्छा समर्थन मिलता रहा है, जबकि मुस्लिम और यादव मतदाताओं को आरजेडी का मजबूत आधार माना जाता है. यही जातीय संतुलन चुनाव को बेहद रोचक बनाता है.
रेखा गुप्ता की उम्मीदवारी से कैसे बदला चुनावी गणित?
आरजेडी ने वैश्य समाज से आने वाली रेखा गुप्ता को उम्मीदवार बनाकर चुनावी समीकरण को नया मोड़ दे दिया है. रेखा गुप्ता पहले कांग्रेस में थीं और बाद में आरजेडी में शामिल हुईं. वर्ष 2025 के विधानसभा चुनाव में भी उन्होंने इसी सीट से चुनाव लड़ा था और उल्लेखनीय वोट हासिल किए थे. माना जा रहा है कि आरजेडी मुस्लिम-यादव के पारंपरिक वोटबैंक के साथ वैश्य मतदाताओं को जोड़ने की रणनीति पर काम कर रही है. यदि इस रणनीति को सफलता मिलती है तो इसका असर सिर्फ बीजेपी के पारंपरिक वोटबैंक पर ही नहीं पड़ेगा, बल्कि प्रशांत किशोर के लिए भी चुनौती बढ़ सकती है. ऐसे में बांकीपुर उपचुनाव अब केवल उम्मीदवारों की लड़ाई नहीं, बल्कि जातीय समीकरण, वोटों के ध्रुवीकरण और रणनीतिक चुनावी प्रबंधन की भी बड़ी परीक्षा बन गया है.

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