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Home»देश-विदेश»कर्ज के बोझ में डूबा पाकिस्तान और 1 अरब डॉलर का ‘शांति बोर्ड’ सवालों के घेरे में
देश-विदेश

कर्ज के बोझ में डूबा पाकिस्तान और 1 अरब डॉलर का ‘शांति बोर्ड’ सवालों के घेरे में

“IMF और वर्ल्ड बैंक के भारी कर्ज से जूझ रहा पाकिस्तान अब एक नई अंतरराष्ट्रीय पहल को लेकर चर्चा में है. Donald Trump द्वारा प्रस्तावित ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में स्थायी सदस्यता के लिए पाकिस्तान 1 अरब डॉलर देने को तैयार है. यह फैसला ऐसे समय में आया है जब पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था गंभीर संकट से गुजर रही है.”

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Satya MishraEditorial Desk
Published Jan 22, 2026 · 2:22 PM· 5 min read
कर्ज के बोझ में डूबा पाकिस्तान और 1 अरब डॉलर का ‘शांति बोर्ड’ सवालों के घेरे में

दुनिया भर में आर्थिक संकट और भू-राजनीतिक तनाव के बीच पाकिस्तान एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर चर्चा में है. एक तरफ देश की अर्थव्यवस्था लगातार दबाव में है, विदेशी कर्ज बढ़ता जा रहा है और सरकार को हर कुछ महीनों में अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों के सामने हाथ फैलाना पड़ता है. दूसरी ओर पाकिस्तान एक ऐसे वैश्विक मंच में शामिल होने जा रहा है, जिसकी कीमत 1 अरब डॉलर बताई जा रही है. यह मंच युद्धग्रस्त गाजा क्षेत्र में शांति और पुनर्निर्माण के उद्देश्य से प्रस्तावित किया गया है. इस पहल का नाम ‘बोर्ड ऑफ पीस’ है, जिसे अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump द्वारा प्रस्तावित किया गया है. इसमें शामिल होने वाले देशों को भारी आर्थिक योगदान देना होगा. ऐसे समय में जब पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और वर्ल्ड बैंक के कर्ज पर निर्भर है, यह फैसला कई सवाल खड़े करता है. क्या यह पाकिस्तान की कूटनीतिक मजबूरी है या कोई रणनीतिक चाल?

क्या है ‘बोर्ड ऑफ पीस’ और क्यों अहम है इसकी सदस्यता

यह भी पढ़ें:नेपाल फिर बनेगा हिंदू राष्ट्र? देउबा गुट के प्रस्ताव से बढ़ी हलचल, बालेन शाह क्या करेंगे

‘बोर्ड ऑफ पीस’ एक प्रस्तावित वैश्विक मंच है, जिसका उद्देश्य गाजा जैसे संघर्षग्रस्त इलाकों में शांति बहाली और पुनर्निर्माण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना है. इस मंच में करीब 60 देशों को आमंत्रित किया गया है. खास बात यह है कि जो देश 1 अरब डॉलर का योगदान करेंगे, उन्हें इस बोर्ड में स्थायी सदस्यता मिलेगी, जिससे नीति निर्धारण में उनकी सीधी भूमिका होगी. भारत और पाकिस्तान दोनों को इस मंच का न्योता मिला है. पाकिस्तान ने इस बोर्ड का हिस्सा बनने की सहमति जता दी है. हालांकि, आर्थिक रूप से कमजोर स्थिति में 1 अरब डॉलर जैसी बड़ी राशि देने का फैसला आम जनता और विशेषज्ञों के बीच बहस का विषय बन गया है. यह सवाल उठ रहा है कि क्या पाकिस्तान के लिए इस समय शांति मंच में निवेश प्राथमिकता होनी चाहिए या घरेलू आर्थिक संकट से निपटना.

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IMF और वर्ल्ड बैंक पर निर्भर पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था

पाकिस्तान पिछले कई वर्षों से आर्थिक अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है. महंगाई, बेरोजगारी और विदेशी मुद्रा की कमी ने हालात और बिगाड़ दिए हैं. देश बार-बार International Monetary Fund और World Bank से कर्ज लेने को मजबूर रहा है. दिसंबर में IMF ने पाकिस्तान को 1.2 अरब डॉलर की राहत राशि मंजूर की थी, जिससे सरकार को अस्थायी सांस मिली. इसके अलावा वर्ल्ड बैंक ने भी हाल ही में 700 मिलियन डॉलर की वित्तीय सहायता को मंजूरी दी है. यह रकम आर्थिक सुधार और सरकारी सेवाओं को मजबूत करने के लिए दी गई है. बावजूद इसके, पाकिस्तान की वित्तीय स्थिति अभी भी बेहद नाजुक बनी हुई है.

यूएई से राहत की उम्मीद और बढ़ता अंतरराष्ट्रीय दबाव

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पाकिस्तान सिर्फ अंतरराष्ट्रीय संस्थानों पर ही निर्भर नहीं है, बल्कि खाड़ी देशों से भी मदद की गुहार लगाता रहा है. हाल ही में पाकिस्तान ने United Arab Emirates से 2.5 अरब डॉलर के कर्ज की वापसी की समयसीमा बढ़ाने का अनुरोध किया है. यह कर्ज 2021 के एक समझौते के तहत स्टेट बैंक में जमा कराया गया था. यूएई की मदद से पाकिस्तान IMF को यह संदेश देना चाहता है कि उसकी विदेशी मुद्रा स्थिति नियंत्रण में है. इससे भविष्य में और कर्ज मिलने की संभावना बढ़ती है. लेकिन बार-बार कर्ज की अवधि बढ़ाने की मांग यह भी दिखाती है कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था अब भी आत्मनिर्भर होने से काफी दूर है.

मजबूरी या कूटनीतिक रणनीति?

पाकिस्तान सरकार इस फैसले को अंतरराष्ट्रीय शांति प्रयासों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता बता रही है. विदेश मंत्री Ishaq Dar ने कहा है कि ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में शामिल होना गाजा में स्थायी युद्धविराम के प्रयासों के अनुरूप है. उनके मुताबिक, यह मंच ठोस और प्रभावी कदम उठाने में मददगार साबित हो सकता है. बोर्ड में आठ इस्लामिक देश शामिल हैं और पाकिस्तान खुद को उनमें एक अहम भूमिका में देख रहा है. हालांकि, आलोचकों का मानना है कि देश की कमजोर आर्थिक हालत में इतनी बड़ी रकम खर्च करना जनता पर अतिरिक्त बोझ डाल सकता है.

कर्ज और फॉरेक्स रिजर्व

जून 2025 तक पाकिस्तान पर कुल कर्ज बढ़कर लगभग 286.8 अरब डॉलर हो चुका है, जो पिछले साल की तुलना में करीब 13 प्रतिशत अधिक है. घरेलू और विदेशी दोनों तरह के कर्ज ने सरकार की आर्थिक नीतियों को सीमित कर दिया है. वहीं State Bank of Pakistan के अनुसार देश का विदेशी मुद्रा भंडार करीब 10.33 अरब डॉलर है. इसके मुकाबले भारत की स्थिति कहीं ज्यादा मजबूत नजर आती है. भारत का विदेशी मुद्रा भंडार बढ़कर 687 अरब डॉलर के पार पहुंच चुका है. यह अंतर दोनों देशों की आर्थिक स्थिरता और वैश्विक भरोसे को साफ तौर पर दर्शाता है.

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