असम में JMM-CONGRESS की महिला नेताओं का जलवा, बीजेपी को झारखंड की महिला नेताओं पर भरोसा नहीं?
“असम विधानसभा चुनाव 2026 के लिए सिर्फ 8 दिन बचे हैं, और चुनावी हलचल पूरे राज्य में तेज है. इस बार खास तौर पर चाय बगानों में काम करने वाली महिलाएं और आदिवासी मतदाता निर्णायक साबित हो सकते हैं. इसी वजह से झारखंड की महिला नेताओं का असम में प्रचार का रोल चर्चा का विषय बना हुआ है.”

Assam: असम विधानसभा चुनाव 2026 के लिए सिर्फ 8 दिन बचे हैं, और चुनावी हलचल पूरे राज्य में तेज है. इस बार खास तौर पर चाय बगानों में काम करने वाली महिलाएं और आदिवासी मतदाता निर्णायक साबित हो सकते हैं. इसी वजह से झारखंड की महिला नेताओं का असम में प्रचार का रोल चर्चा का विषय बना हुआ है.
झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की ओर से कल्पना मुर्मू सोरेन, महुआ माजी, लुईस मरांडी और जोबा मांझी प्रचार के मोर्चे पर पूरी ताकत झोंक रही हैं. वहीं कांग्रेस की मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की, दीपिका पांडेय सिंह, विधायक ममता देवी और पूर्व मेयर रमा खलखो भी असम चुनाव मतदाताओं को अपने पक्ष में लाने के लिए लगातार मेहनत कर रही हैं. खासकर चाय बगान की महिलाओं से मुलाकात कर उनका भरोसा जीतने की कोशिश कर रही हैं. प्रधानमंत्री मोदी खुद चाय बगान की महिलाओं से मिलने पहुंचे, जिससे चुनावी दृष्टि से बेहद अहम माना जा रहा है. झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी चाय बगान की महिलाओं से मुलाकात कर चुके हैं लेकिन बीजेपी की रणनीति पर सवाल उठ रहे हैं. झारखंड से गीता कोड़ा, सीता सोरेन, आशा लकड़ा, आरती कुजुर और मीरा मुंडा जैसी आदिवासी महिला नेताओं को प्रचार के लिए असम नहीं भेजा गया है. सूत्रों का कहना है कि बाबूलाल मरांडी, चंपाई सोरेन, अर्जुन मुंडा और मधु कोड़ा ही बीजेपी के पक्ष में वोट मांगने असम जाएंगे.
विशेषज्ञों का कहना है कि चाय बगान की महिलाएं इस चुनाव में निर्णायक साबित हो सकती हैं, और महिला वोट बैंक पर सभी दलों की नजर है. इस पर बीजेपी का यह कदम कि झारखंड की महिला नेताओं को प्रचार से अलग रखा गया, राजनीतिक गलती साबित हो सकता है. चुनाव के आखिरी दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या बीजेपी झारखंड की महिला नेताओं की ताकत और आदिवासी महिला वोटर्स के भरोसे पर ध्यान दे पाएगी, या फिर यह अवसर अन्य दलों के लिए फायदा साबित होगा.

