वोट कटे तो सत्ता हिलेगी! 27 लाख का झटका, हेमंत की कुर्सी पर खतरा?
“पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान लाखों मतदाताओं के नाम हटाए जाने के बाद अब इसका असर झारखंड की राजनीति पर भी साफ दिखने लगा है. 27 लाख से अधिक लोगों के नाम मतदाता सूची से बाहर होने और पूरी प्रक्रिया पर उठ रहे सवालों ने राजनीतिक हलकों में हलचल बढ़ा दी है. ”

By: Samir Sinha
Ranchi: पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान लाखों मतदाताओं के नाम हटाए जाने के बाद अब इसका असर झारखंड की राजनीति पर भी साफ दिखने लगा है. 27 लाख से अधिक लोगों के नाम मतदाता सूची से बाहर होने और पूरी प्रक्रिया पर उठ रहे सवालों ने राजनीतिक हलकों में हलचल बढ़ा दी है. इसी बीच मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने संगठन को अलर्ट करते हुए साफ संकेत दे दिए हैं कि SIR को लेकर कोई ढिलाई नहीं बरती जाएगी. माना जा रहा है कि यह सिर्फ तत्काल राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि 2029 की रणनीति की शुरुआती तैयारी है.
बंगाल में SIR पर उठे गंभीर सवाल
पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान चुनाव आयोग ने “तार्किक विसंगति” के आधार पर बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम चिन्हित किए. रिपोर्ट्स के मुताबिक, पहले करीब 60 लाख लोगों को इस श्रेणी में रखा गया और अंततः 27 लाख 10 हजार नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए. सबसे बड़ा विवाद इस बात को लेकर है कि कई ऐसे लोग, जिनके नाम पहले की मतदाता सूचियों में मौजूद थे, यहां तक कि पिछले पुनरीक्षण में भी वेरिफाई हो चुके थे, उन्हें भी बाहर कर दिया गया. कई मामलों में एक ही परिवार के कुछ सदस्यों के नाम सूची में बने रहे, जबकि अन्य के नाम काट दिए गए. विशेषज्ञों का मानना है कि जिन त्रुटियों को “तार्किक विसंगति” बताया गया, उनमें से कई महज टाइपिंग की गलतियां हो सकती हैं. ऐसे में इतने बड़े पैमाने पर नाम हटाना प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े करता है.
न्यायाधिकरण और प्रक्रिया पर भी सवाल
मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर न्यायाधिकरण गठित किए गए, जहां प्रभावित मतदाताओं को अपनी आपत्ति दर्ज कराने का मौका दिया गया. हालांकि जमीनी स्तर पर कई लोगों ने आरोप लगाया कि उन्हें सुनवाई का पर्याप्त अवसर नहीं मिला. रिपोर्ट्स के अनुसार, कई लोग अपने दस्तावेज लेकर पहुंचे, लेकिन वे बिना समाधान के लौट गए. प्रक्रिया को लेकर भ्रम की स्थिति भी बनी रही—ऑनलाइन या ऑफलाइन आपत्ति, सुनवाई का तरीका और समय-सीमा जैसे मुद्दों पर स्पष्टता की कमी रही.
झारखंड में बढ़ी सियासी सतर्कता
बंगाल के घटनाक्रम के बाद झारखंड में सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने SIR को लेकर विशेष रणनीति बनानी शुरू कर दी है. कांके रोड स्थित मुख्यमंत्री आवास पर आयोजित बैठक में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने पार्टी पदाधिकारियों को बूथ स्तर तक सक्रिय होने का निर्देश दिया. उन्होंने स्पष्ट कहा कि हर पात्र मतदाता का नाम सूची में सुनिश्चित किया जाए और किसी भी त्रुटि को समय रहते ठीक कराया जाए. इसे सिर्फ प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकार की रक्षा से जोड़ा गया.
2029 की तैयारी का संकेत
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हेमंत सोरेन की यह सक्रियता सिर्फ मौजूदा हालात तक सीमित नहीं है. बंगाल के आंकड़ों ने यह संकेत दिया है कि मतदाता सूची में बदलाव चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकता है. ऐसे में झारखंड सरकार इस मुद्दे को हल्के में लेने के मूड में नहीं दिख रही. बूथ से लेकर जिला स्तर तक संगठन को मजबूत करने और हर कार्यकर्ता को तैयार रहने का निर्देश इस बात का संकेत है कि आने वाले वर्षों, खासकर 2029 के चुनावों को ध्यान में रखते हुए रणनीति तैयार की जा रही है.
विपक्ष के आरोप और बढ़ती सियासत
बैठक के दौरान झामुमो नेताओं ने SIR प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक मंशा पर भी सवाल उठाए. उनका आरोप है कि इस तरह की कवायद के जरिए आदिवासी, मूलवासी और वंचित वर्ग के मताधिकार को प्रभावित करने की कोशिश की जा सकती है. हालांकि इन आरोपों पर आधिकारिक स्तर पर कोई पुष्टि नहीं है, लेकिन इतना साफ है कि SIR अब सिर्फ तकनीकी प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है. बंगाल में सामने आए आंकड़ों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मतदाता सूची का सवाल अब चुनावी रणनीति के केंद्र में आ गया है. ऐसे में झारखंड में बढ़ती राजनीतिक सक्रियता और सतर्कता यह दिखाती है कि आने वाले समय में यह मुद्दा और भी बड़ा रूप ले सकता है.

