ट्रॉफी से पोडियम तक… जब-जब खेल के मैदान पर खिलाड़ियों ने विरोध में खींची लकीर, 1906 से 2026 तक खेल के मंच पर विरोध का इतिहास
“भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने श्रीलंका को 72 रन से हराकर आठवीं बार एशिया कप का खिताब जीत लिया. लेकिन जीत के बाद ट्रॉफी लेने से इनकार ने नया विवाद खड़ा कर दिया. दुबई में भारतीय टीम ने ACC अध्यक्ष मोहसिन नकवी से ट्रॉफी नहीं ली. ”

भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने श्रीलंका को 72 रन से हराकर आठवीं बार एशिया कप का खिताब जीत लिया, लेकिन जीत के बाद ट्रॉफी को लेकर ऐसा विवाद खड़ा हुआ, जिसने पूरे क्रिकेट जगत का ध्यान खींच लिया. दुबई में प्रेजेंटेशन सेरेमनी के दौरान भारतीय टीम मैदान पर नहीं आई और एशियन क्रिकेट काउंसिल (ACC) के अध्यक्ष व पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन नकवी के हाथों ट्रॉफी लेने से इनकार कर दिया. खास बात यह है कि BCCI ने पहले ही ACC को अपना रुख बता दिया था और ट्रॉफी किसी दूसरे ACC अधिकारी या BCCI प्रतिनिधि से दिलाने का विकल्प सुझाया था. इसके बावजूद बात नहीं बनी. यह मामला नया भी नहीं है. 2025 में भारतीय पुरुष टीम भी नकवी से ट्रॉफी और पदक लेने से इनकार कर चुकी है. वहीं खेल इतिहास में राजनीतिक विरोध के ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं, जिनमें खिलाड़ियों ने मेडल सेरेमनी, पोडियम या आधिकारिक मंच को ही विरोध का माध्यम बनाया.
मैदान पर भारत की बड़ी जीत
फाइनल में भारत ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 20 ओवर में 183 रन बनाए. शेफाली वर्मा ने 39 गेंदों पर 68 रन और स्मृति मंधाना ने 39 गेंदों पर 59 रन बनाए. दोनों के बीच 129 रन की साझेदारी हुई. जवाब में श्रीलंका की टीम 111 रन पर ऑलआउट हो गई. न श्री चरणी ने चार विकेट और दीप्ति शर्मा ने तीन विकेट लिए. भारत ने 72 रन से मुकाबला जीतकर आठवीं बार महिला एशिया कप अपने नाम किया.
ट्रॉफी के लिए मैदान पर नहीं आई टीम
खिताबी मुकाबला खत्म होने के बाद प्रेजेंटेशन सेरेमनी शुरू हुई, लेकिन भारतीय खिलाड़ी मंच पर नहीं पहुंचीं. मोहसिन नकवी ट्रॉफी लेकर मौजूद रहे और भारतीय टीम का इंतजार करते रहे. आखिरकार सेरेमनी विजेता ट्रॉफी सौंपे बिना खत्म हुई. भारतीय खिलाड़ियों ने ड्रेसिंग रूम में ही जीत का जश्न मनाया. कोच अमोल मजूमदार ने भी कहा कि यह BCCI का स्टैंड था और टीम उसके साथ मजबूती से खड़ी रही.
BCCI ने पहले ही साफ कर दिया था रुख
BCCI की ओर से यह फैसला अचानक नहीं लिया गया था. बोर्ड ने ACC को पहले ही बता दिया था कि भारतीय टीम मोहसिन नकवी से ट्रॉफी स्वीकार नहीं करेगी. विवाद से बचने के लिए दो विकल्प भी सुझाए गए थे—ट्रॉफी ACC के उपाध्यक्ष खालिद अल जरौनी दें या BCCI का प्रतिनिधि इसे टीम को सौंपे. लेकिन जब इस व्यवस्था पर सहमति नहीं बनी तो भारतीय टीम ने प्रेजेंटेशन में हिस्सा नहीं लिया. मोहसिन नकवी की पाकिस्तान सरकार में भूमिका और भारत-पाकिस्तान के तनावपूर्ण रिश्तों ने इस विवाद को और संवेदनशील बना दिया.
2025 में भी हुआ था ऐसा
मोहसिन नकवी से जुड़ा यह विवाद पहली बार 2026 में सामने नहीं आया. 2025 के एशिया कप में भारतीय पुरुष टीम ने भी उनके हाथों से ट्रॉफी और पदक लेने से इनकार किया था. उस समय भी प्रेजेंटेशन सेरेमनी को लेकर गतिरोध हुआ और भारतीय टीम बिना फिजिकल ट्रॉफी के ही चैंपियन बनी. 2026 में महिला टीम का फैसला उसी घटनाक्रम की अगली कड़ी के तौर पर देखा जा रहा है. यानी एक साल के भीतर पुरुष और महिला दोनों भारतीय टीमों ने नकवी से पुरस्कार लेने पर एक जैसा रुख अपनाया.
2003 में क्रिकेट में उठा था बड़ा विरोध
क्रिकेट में राजनीतिक विरोध की चर्चित घटनाओं में 2003 का जिम्बाब्वे वर्ल्ड कप भी शामिल है. जिम्बाब्वे के एंडी फ्लावर और हेनरी ओलोंगा ने तत्कालीन राष्ट्रपति रॉबर्ट मुगाबे की सरकार के खिलाफ मैचों के दौरान काली पट्टी बांधकर विरोध जताया था. दोनों खिलाड़ियों ने अपने विरोध को देश की राजनीतिक स्थिति से जोड़ा. यह मामला ट्रॉफी ठुकराने से अलग था, लेकिन इसने क्रिकेट के मंच को राजनीतिक संदेश के लिए इस्तेमाल करने की बहस को दुनिया के सामने ला दिया.
1968 में पोडियम पर उठा था विरोध
खेल के इतिहास में इससे भी चर्चित तस्वीर 1968 के मैक्सिको ओलंपिक की है. अमेरिकी धावक टॉमी स्मिथ और जॉन कार्लोस ने 200 मीटर स्पर्धा में पदक जीतने के बाद पोडियम पर काली दस्ताने वाली मुट्ठी उठाकर नस्लीय भेदभाव के खिलाफ विरोध जताया. यह मेडल लेने से इनकार नहीं था, बल्कि मेडल सेरेमनी को विरोध का मंच बनाने की घटना थी. उनके इस प्रदर्शन पर कार्रवाई भी हुई और दोनों को ओलंपिक से बाहर कर दिया गया.
1906 में आयरिश एथलीट का विरोध
खेल मंच पर राष्ट्रीय पहचान को लेकर विरोध का एक पुराना उदाहरण 1906 के एथेंस खेलों से जुड़ा है. आयरिश एथलीट पीटर ओ'कॉनर ने ब्रिटिश झंडे के खिलाफ विरोध जताते हुए ध्वज पोल पर चढ़कर आयरिश झंडा फहराया था. यह ट्रॉफी बहिष्कार की घटना नहीं थी, लेकिन इसने दिखाया कि खिलाड़ी खेल प्रतियोगिता के मंच को राष्ट्रीय पहचान और राजनीतिक संदेश के लिए भी इस्तेमाल कर सकते हैं. इसी तरह 2022 फीफा वर्ल्ड कप में ईरान के खिलाड़ियों ने देश में चल रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच राष्ट्रगान नहीं गाया था.
अब सवाल ट्रॉफी से बड़ा है
2025 में भारतीय पुरुष टीम और 2026 में भारतीय महिला टीम के फैसले ने इस बहस को फिर तेज कर दिया है कि जब खेल और कूटनीति आमने-सामने हों तो खिलाड़ी किसे प्राथमिकता दें. भारत का मौजूदा मामला इसलिए भी अलग है क्योंकि यहां विरोध किसी मैच के दौरान नहीं, बल्कि खिताब जीतने के बाद पुरस्कार वितरण के मंच पर दिखाई दिया. भारत ने खिताब तो जीता, लेकिन विवादित माने जा रहे प्रेजेंटेशन से दूरी बना ली. ऐसे में दुबई की यह तस्वीर आने वाले समय में भारत-पाकिस्तान क्रिकेट संबंधों और खेल के मंच पर राजनीतिक तनाव की एक अहम मिसाल के तौर पर देखी जा सकती है.

