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Home»राजनीति»असम में ‘आदिवासी कार्ड’ की एंट्री: क्या हेमंत सोरेन बदल देंगे बीजेपी-कांग्रेस की पूरी बाज़ी? देखें Video
राजनीति

असम में ‘आदिवासी कार्ड’ की एंट्री: क्या हेमंत सोरेन बदल देंगे बीजेपी-कांग्रेस की पूरी बाज़ी? देखें Video

“असम विधानसभा चुनाव 2026 से पहले पूर्वोत्तर की राजनीति में नए समीकरण बनते दिख रहे हैं. झारखंड के मुख्यमंत्री Hemant Soren की असम में बढ़ती सक्रियता ने इस चुनाव को दिलचस्प बना दिया है. ”

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Satya MishraEditorial Desk
Published Mar 14, 2026 · 1:48 PM· 5 min read
असम में ‘आदिवासी कार्ड’ की एंट्री: क्या हेमंत सोरेन बदल देंगे बीजेपी-कांग्रेस की पूरी बाज़ी? देखें Video
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असम विधानसभा चुनाव 2026 से पहले पूर्वोत्तर की राजनीति में नए समीकरण बनते दिख रहे हैं. झारखंड के मुख्यमंत्री Hemant Soren की असम में बढ़ती सक्रियता ने इस चुनाव को दिलचस्प बना दिया है. असम में अब तक मुकाबला मुख्य रूप से Bharatiya Janata Party और Indian National Congress के बीच माना जाता रहा है, लेकिन इस बार आदिवासी और चाय बागान श्रमिकों की राजनीति नए समीकरण पैदा कर सकती है. कांग्रेस चाहती है कि भाजपा को चुनौती देने के लिए विपक्षी वोट एकजुट हों और इसी वजह से असम कांग्रेस अध्यक्ष Gaurav Gogoi ने रांची पहुंचकर हेमंत सोरेन से मुलाकात भी की. दूसरी ओर Jharkhand Mukti Morcha असम में अपने संगठन का विस्तार करने और आदिवासी वोटबैंक के सहारे नई राजनीतिक जमीन तलाशने में जुटा है. ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि क्या जेएमएम कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ेगी या फिर बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान मिली उपेक्षा का राजनीतिक जवाब असम में देगी.

असम में क्यों सक्रिय हुए हेमंत सोरेन

यह भी पढ़ें:चुटूपालू-ओरमांझी में अवैध स्टोन क्रशरों पर बड़ा एक्शन, 19 पर कार्रवाई; 8 सील, 11 ध्वस्त

पिछले कुछ महीनों में हेमंत सोरेन ने असम में कई रैलियां की हैं, जिनमें चाय बागान क्षेत्रों के आदिवासी समुदायों को खास तौर पर संबोधित किया गया. असम के तिनसुकिया और बिस्वनाथ जिलों में हुई सभाओं में उन्होंने आदिवासी पहचान, सम्मान और अधिकार का मुद्दा उठाया. असम में चाय बागान श्रमिकों की आबादी करीब 70 लाख मानी जाती है. इन समुदायों की जड़ें झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ के आदिवासी समाज से जुड़ी हैं. यही वजह है कि जेएमएम इस सामाजिक आधार को अपने लिए अवसर के रूप में देख रही है. पार्टी का मानना है कि यदि इन समुदायों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व का मुद्दा बनाकर संगठित किया जाए तो कई सीटों पर असर डाला जा सकता है.

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कांग्रेस क्यों चाहती है जेएमएम का साथ

असम में भाजपा का संगठन पिछले एक दशक में काफी मजबूत हुआ है और मुख्यमंत्री Himanta Biswa Sarma के नेतृत्व में पार्टी लगातार चुनावी बढ़त बनाए रखने की कोशिश कर रही है. ऐसे में कांग्रेस की रणनीति विपक्षी वोटों के बिखराव को रोकने की है. कांग्रेस पहले ही All India United Democratic Front से दूरी बना चुकी है और अब वह नए सहयोगियों की तलाश में है. इसी कड़ी में गौरव गोगोई की रांची यात्रा को महत्वपूर्ण माना जा रहा है. यदि जेएमएम कांग्रेस के साथ तालमेल करती है तो आदिवासी और चाय बागान क्षेत्रों में विपक्ष की ताकत बढ़ सकती है.

बिहार की उपेक्षा का राजनीतिक संदर्भ

यह भी पढ़ें:तीनपहाड़ स्टेशन पर यात्रियों को बताया गया RailOne App का आसान तरीका

हालांकि इस संभावित गठबंधन के पीछे एक राजनीतिक पृष्ठभूमि भी है. बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान महागठबंधन में कांग्रेस और Rashtriya Janata Dal ने जेएमएम को सीटें नहीं दी थीं. उस समय तर्क दिया गया था कि बिहार में पार्टी का जनाधार सीमित है. इस फैसले को जेएमएम के भीतर उपेक्षा के रूप में देखा गया था. अब असम चुनाव में परिस्थितियां उलट हैं. यहां आदिवासी वोटबैंक मौजूद है और जेएमएम अपने प्रभाव के विस्तार का मौका देख रही है. यही कारण है कि कुछ राजनीतिक विश्लेषक इसे “बिहार बनाम असम” का समीकरण भी बता रहे हैं.

क्या जेएमएम अलग राह चुन सकती है

असम में जेएमएम ने Jai Bharat Party के साथ गठबंधन का संकेत दिया है और लगभग 40 सीटों पर उम्मीदवार उतारने की रणनीति पर काम चल रहा है. यह रणनीति खास तौर पर उन इलाकों पर केंद्रित है जहां चाय बागान श्रमिकों और आदिवासी समुदाय का प्रभाव है. यदि जेएमएम कांग्रेस से अलग होकर चुनाव लड़ती है तो विपक्षी वोटों का बंटवारा हो सकता है, जिसका फायदा भाजपा को मिल सकता है. हालांकि जेएमएम के लिए यह संगठन विस्तार का अवसर भी है. पार्टी देश भर में लगभग 12 करोड़ आदिवासियों की आवाज बनने की रणनीति पर काम कर रही है.

क्या बदल सकता है असम का चुनावी समीकरण

असम में अनुसूचित जनजाति की आबादी करीब 12 प्रतिशत से अधिक है और कई विधानसभा सीटों पर उनका प्रभाव निर्णायक माना जाता है. यदि जेएमएम इस सामाजिक आधार को प्रभावी ढंग से संगठित कर पाती है तो चुनावी मुकाबला केवल भाजपा और कांग्रेस के बीच सीमित नहीं रहेगा. ऐसे में हेमंत सोरेन के सामने दो रास्ते हैं—पहला, कांग्रेस के साथ मिलकर भाजपा को चुनौती देना और दूसरा, असम में स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाकर भविष्य की राजनीति के लिए जमीन तैयार करना. अंततः यह फैसला केवल चुनावी रणनीति नहीं बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में आदिवासी नेतृत्व के विस्तार से भी जुड़ा हुआ है. यदि असम में जेएमएम को उल्लेखनीय समर्थन मिलता है तो यह हेमंत सोरेन को झारखंड से बाहर भी एक बड़े आदिवासी नेता के रूप में स्थापित कर सकता है.

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