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Home»झारखंड»दिशोम गुरु शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्म भूषण, आदिवासी आंदोलन को मिला राष्ट्रीय सम्मान
झारखंड

दिशोम गुरु शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्म भूषण, आदिवासी आंदोलन को मिला राष्ट्रीय सम्मान

“झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और आदिवासी आंदोलन के प्रणेता दिशोम गुरु शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्म भूषण सम्मान से नवाजा जाएगा. केंद्र सरकार की ओर से यह सम्मान लोक कल्याण, सामाजिक न्याय और आदिवासी अधिकारों के लिए उनके आजीवन संघर्ष के लिए दिया जा रहा है.”

B
Bawal DeskEditorial Desk
Published Jan 25, 2026 · 1:57 PM· 3 min read
दिशोम गुरु शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्म भूषण, आदिवासी आंदोलन को मिला राष्ट्रीय सम्मान

Ranchi: झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और आदिवासी आंदोलन के प्रणेता दिशोम गुरु शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्म भूषण सम्मान से नवाजा जाएगा. केंद्र सरकार की ओर से यह सम्मान लोक कल्याण, सामाजिक न्याय और आदिवासी अधिकारों के लिए उनके आजीवन संघर्ष के लिए दिया जा रहा है. इस निर्णय को झारखंड ही नहीं, बल्कि देशभर के आदिवासी समाज के लिए ऐतिहासिक सम्मान के रूप में देखा जा रहा है.

11 जनवरी 1944 को रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में जन्मे शिबू सोरेन का जीवन संघर्ष, प्रतिरोध और सामाजिक चेतना का प्रतीक रहा. उनके पिता सोबरन सोरेन की हत्या के बाद उन्होंने महाजनी प्रथा, सूदखोरी और शोषण के खिलाफ आवाज़ बुलंद की. उस दौर में अविभाजित बिहार के आदिवासी इलाकों में महाजनों का गहरा दबदबा था और आदिवासी समाज शोषण के चक्र में फंसा हुआ था. इस अन्याय के खिलाफ खड़े होने की कीमत उन्हें पारिवारिक स्तर पर भी चुकानी पड़ी.

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महाजनी प्रथा को समाप्त करने के उद्देश्य से शिबू सोरेन ने ऐतिहासिक धान कटनी आंदोलन की शुरुआत की. इस आंदोलन के माध्यम से उन्होंने आदिवासियों को यह संदेश दिया कि धान बोने और काटने का अधिकार किसान का है, न कि महाजनों का. 1970 और 1980 के दशक में यह आंदोलन व्यापक स्तर पर फैला और झारखंड के किसानों, मजदूरों और काश्तकारों को एकजुट करने में सफल रहा. इस संघर्ष ने आदिवासी समाज को शोषण से मुक्ति दिलाने की दिशा में अहम भूमिका निभाई. इन्हीं संघर्षों के कारण झारखंड की जनता ने उन्हें ‘दिशोम गुरु’ की उपाधि दी. ‘दिशोम’ का अर्थ है—देश या समाज को दिशा देने वाला. आदिवासी समाज में शिबू सोरेन को एक मार्गदर्शक और संरक्षक के रूप में देखा जाता है, जिन्होंने न केवल संघर्ष करना सिखाया, बल्कि सम्मान के साथ जीने की चेतना भी दी.

शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का आधार मानते हुए शिबू सोरेन ने 1970 से 1975 के बीच रात्रि पाठशालाओं का संचालन किया, ताकि दिनभर काम करने वाले आदिवासी लोग रात में पढ़ाई कर सकें. उनका मानना था कि फिजूलखर्ची से बचकर शिक्षा में निवेश करना ही समाज को आगे बढ़ा सकता है. संसद में अपने पहले भाषण में उन्होंने शराब के खिलाफ खुलकर आवाज़ उठाई और इसे आदिवासी विकास में सबसे बड़ी बाधा बताया.

शिबू सोरेन झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक नेताओं में शामिल थे और अलग झारखंड राज्य के गठन की लड़ाई में उन्होंने अग्रणी भूमिका निभाई. वे तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री रहे और दशकों तक आदिवासी अधिकारों की राजनीति के केंद्रीय चेहरे बने रहे. झारखंड में उन्हें स्नेहपूर्वक ‘गुरुजी’ कहा जाता था. 4 अगस्त 2025 को 81 वर्ष की आयु में शिबू सोरेन का निधन हो गया था. वे लंबे समय से किडनी की बीमारी से जूझ रहे थे और दिल्ली के गंगाराम अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली. उनके निधन के साथ एक युग का अंत हुआ, लेकिन मरणोपरांत पद्म भूषण सम्मान के साथ उनके संघर्ष, विचार और योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर स्थायी पहचान मिली है.

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