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Home»राजनीति»स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर राहुल गांधी ने क्यों नहीं किए साइन, कांग्रेस ने खोला पूरा राज
राजनीति

स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर राहुल गांधी ने क्यों नहीं किए साइन, कांग्रेस ने खोला पूरा राज

“अविश्वास प्रस्ताव पर विपक्ष का बड़ा कदम, लेकिन राहुल गांधी ने साइन क्यों नहीं किए? कांग्रेस ने संसदीय परंपराओं का हवाला दिया.”

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Satya MishraEditorial Desk
Published Feb 10, 2026 · 10:21 AM· 4 min read
स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर राहुल गांधी ने क्यों नहीं किए साइन, कांग्रेस ने खोला पूरा राज

लोकसभा में राजनीति एक नए मोड़ पर पहुंच चुकी है, क्योंकि विपक्षी दलों ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास (नो-कांफिडेंस) प्रस्ताव का नोटिस 118 सांसदों के समर्थन के साथ लोकसभा महासचिव को सौंप दिया है, लेकिन इसी बीच एक चौंकाने वाली बात यह है कि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने खुद इस अविश्वास प्रस्ताव पर हस्ताक्षर नहीं किए. विपक्षी सांसदों में सामूहिक रूप से साइन हुआ प्रस्ताव, राहुल गांधी के व्यक्तिगत तौर पर साइन न होने वाले निर्णय के कारण चर्चा में है और राजनीतिक गलियारों में सवाल उठा रहा है कि आखिर क्यों उन्होंने यह क़दम नहीं उठाया. विपक्षी नेताओं का कहना है कि यह फैसला संसदीय परंपराओं और लोकतांत्रिक मर्यादाओं के सम्मान के आधार पर लिया गया है, न कि किसी पार्टी विभाजन के कारण.

राहुल गांधी ने क्यों नहीं किए साइन — विपक्ष की दलील

यह भी पढ़ें:बिहार विधान परिषद चुनाव: RJD की लिस्ट जारी होते ही बढ़ी हलचल, रोहिणी आचार्य ने जताई नाराजगी

राहुल गांधी ने अविश्वास प्रस्ताव पर हस्ताक्षर नहीं करने का निर्णय संसदीय परंपरा के सम्मान को ध्यान में रखते हुए लिया, ऐसा कांग्रेसी सूत्रों ने बताया है. उनके रुख के अनुसार, संसदीय लोकतंत्र में यह अच्छा नहीं माना जाता कि विपक्ष के नेता के तौर पर व्यक्ति सीधे स्पीकर को हटाने की मांग पर हस्ताक्षर करें, क्योंकि स्पीकर का पद संवैधानिक और निष्पक्ष होने का दायित्व रखता है. इस वजह से राहुल गांधी ने प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने से परहेज किया, लेकिन उन्होंने पूरी तरह से प्रस्ताव का समर्थन न करने का संकेत भी नहीं दिया. विपक्ष के 118 सांसदों ने साझा रूप से नोटिस पर साइन किया है, जिसमें कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, डीएमके, लेफ्ट और अन्य दल शामिल हैं. वहीं TMC ने प्रस्ताव पर साइन करना अभी टाल दिया है, जिससे विपक्ष में सहमति की प्रक्रिया पर भी सवाल उठ रहे हैं.

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विपक्ष ने क्या आरोप लगाए?

विपक्ष का आरोप है कि स्पीकर ओम बिरला ने बजट सत्र के दौरान विपक्षी सांसदों को बोलने का पर्याप्त मौका नहीं दिया, खासकर जब नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा में भाग लेने का प्रयास किया था. अदालतों और संसदीय परंपरा के अनुसार विपक्ष को भी अपने विचार रखने का अवसर मिलना चाहिए, लेकिन विपक्ष के नेताओं का दावा है कि उनके मौकों को लगातार रोका गया और कई बार हंगामे के बावजूद भी उन्हें बोलने का मौका नहीं मिला. इसके साथ ही आठ विपक्षी सांसदों को सत्र के लिए निलंबित करने और कुछ टिप्पणियों को लेकर पक्षपातपूर्ण निर्णय लेने का भी आरोप लगाया गया है. विपक्ष का कहना है कि ऐसा रवैया लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और संसदीय मर्यादाओं के खिलाफ है और इसी वजह से उन्होंने स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने का निर्णय लिया.

टीएमसी और विपक्ष में मतभेद

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अविश्वास प्रस्ताव के बावजूद TMC ने प्रस्ताव पर हस्ताक्षर नहीं किए, जिसका मतलब है कि विपक्ष पूरी तरह एकमत नहीं है. TMC का तर्क रहा है कि स्पीकर से पहले बात करनी चाहिए थी और कुछ समय देकर उन्हें सुधार का मौका देना चाहिए था, न कि तुरंत प्रस्ताव लाना चाहिए था. इस कदम से विपक्षी एकता को बड़ा झटका लगा है और राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह विपक्षी दलों के बीच रणनीति और तालमेल पर सवाल खड़ा कर रहा है. विपक्षी दलों को अब न केवल संसदीय प्रक्रिया की चुनौती का सामना करना पड़ेगा, बल्कि यह भी देखना होगा कि क्या प्रस्ताव को सदन में बहुमत मिल सकता है. बहुमत हासिल न होने की स्थिति में प्रस्ताव केवल राजनीतिक संदेश बनकर रह सकता है, न कि वास्तविक बदलाव का कारण.

आगे क्या हो सकता है?

अब अगला कदम यह है कि प्रस्ताव को formally स्वीकार करके सदन में बहस और वोटिंग की प्रक्रिया शुरू हो. संसदीय नियमों के अनुसार, अगर प्रस्ताव पर बहुमत प्राप्त होता है, तो स्पीकर को पद से हटाया जा सकता है. लेकिन यह आसान नहीं होगा, क्योंकि सत्ताधारी दल और उसके गठजोड़ को लोकसभा में बहुमत हासिल है. अगर बहुमत नहीं मिलता, तो यह प्रस्ताव विपक्ष की तरफ से एक मजबूत राजनीतिक संदेश बनकर रह जाएगा, जिसका इस्तेमाल आगामी सत्रों और चुनावी रणनीतियों में किया जा सकता है. विपक्ष ने इसे संसद में निष्पक्षता और प्रक्रियागत समानता की लड़ाई बताया है, जबकि सत्तापक्ष इसे राजनीतिक theatrics का हिस्सा मान रहा है. आगामी दिनों में यह मामला संसद के भीतर और बाहर दोनों जगह गरमाने की पूरी संभावना है.

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