अविश्वास प्रस्ताव के बीच ओम बिरला का बड़ा फैसला, स्पीकर की कुर्सी पर नहीं बैठेंगे
लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने अपने खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव के बीच बड़ा फैसला लिया है. उन्होंने स्पष्ट किया है कि जब तक प्रस्ताव पर सदन में चर्चा और निर्णय नहीं हो जाता, वे लोकसभा की कार्यवाही में भाग नहीं लेंगे और स्पीकर की कुर्सी पर नहीं बैठेंगे.

लोकसभा के बजट सत्र के बीच संसद में चल रही राजनीतिक टकराहट के बीच लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने एक ऐसा कदम उठाया है जो संसद की लड़ाई में और भी अहम मोड़ ला रहा है. विपक्षी दलों द्वारा उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव (No Confidence Motion) पेश किये जाने के बाद स्पीकर ने घोषणा की है कि जब तक इस प्रस्ताव पर सदन में चर्चा और फैसला नहीं हो जाता, वे लोकसभा की कार्यवाही में भाग नहीं लेंगे और स्पीकर की कुर्सी पर नहीं बैठेंगे. यह निर्णय नैतिक आधार पर लिया गया है ताकि किसी भी पक्ष पर यह आरोप न लग सके कि स्पीकर स्वयं प्रक्रिया को प्रभावित कर रहे हैं.
स्पीकर के फैसले के पीछे क्या कारण?
मंगलवार को विपक्षी दलों ने 119 सांसदों के हस्ताक्षर के साथ लोकसभा महासचिव को अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस सौंपा है, जिसमें स्पीकर पर पक्षपात करने और संसदीय कार्यवाही को प्रभावित करने के आरोप लगाये गये हैं. स्पीकर ने इस नोटिस के प्राप्त होने के बाद लोकसभा सचिवालय को निर्देश दिया है कि नोटिस की जांच कर नियमों के अनुसार उचित कदम उठाया जाए. इसके बाद उन्होंने निर्णय लिया कि जब तक प्रस्ताव पर चर्चा और निर्णय नहीं हो जाता, वे सदन में नहीं जाएंगे और स्पीकर की कुर्सी पर उपस्थित नहीं होंगे. यह कदम नियमों में अनिवार्य नहीं है, बल्कि इसे एक नैतिक और निष्पक्ष निर्णय के रूप में पेश किया जा रहा है. प्रत्यक्ष रूप से यह पहली बार है जब कोई लोकसभा स्पीकर ऐसे प्रस्ताव के दौरान खुद को कार्यवाही से अलग रख रहा है, ताकि तथाकथित पक्षपात के आरोपों से बचा जा सके.
अब आगे क्या होगा – प्रक्रिया और सम्भावनाएं
वर्तमान स्थिति के अनुसार, बजट सत्र के दूसरे चरण की शुरुआत 9 मार्च से होने की संभावना है, और इसी दिन प्रस्ताव पर चर्चा शुरू होने की संभावना जताई जा रही है. चर्चा के लिये सदन में कम से कम 50 सांसदों को समर्थन दिखाना होगा, ताकि औपचारिक बहस शुरू हो. चर्चा के दौरान स्पीकर की अनुपस्थिति में अध्यक्षता डिप्टी स्पीकर या किसी अन्य सदस्य द्वारा की जा सकती है. इसके बाद यदि बहस के बाद बहुमत के साथ वोटिंग होती है, तो प्रस्ताव पास होने पर स्पीकर को पद से त्यागपत्र देना पड़ सकता है. हालांकि, NDA के पास सहज बहुमत होने के कारण पास होने की संभावना कम मानी जा रही है.
राजनीतिक पृष्ठभूमि और विपक्ष-सत्ता संघर्ष
विपक्ष के फैसले के पीछे यह तर्क है कि संसद की कार्यवाही निष्पक्ष रूप से न चलने के कारण संसद का काम प्रभावित हो रहा है. विपक्ष यह भी कह रहा है कि नेता प्रतिपक्ष को बोलने की अनुमति न देना और कई विपक्षी सांसदों को निलंबित करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया के विरुद्ध है, जिससे उन्हें यह कदम उठाना पड़ा. दूसरी तरफ, सत्ता पक्ष और समर्थकों का कहना है कि यह कदम सिर्फ राजनीति है और स्पीकर नियमों के अनुसार कार्य कर रहे हैं. संभावना है कि दोनों पक्ष आगामी सप्ताह में संसद में इस मुद्दे पर आगे बातचीत एवं बाधाओं के लिये प्रयास करेंगे.

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