अजय महतो के बाद अब बबीता! क्या टूट गया मिसिर बेसरा का सबसे सुरक्षित नेटवर्क?
अजय महतो की गिरफ्तारी के बाद अब उसकी पत्नी बबीता के कथित आत्मसमर्पण की खबरों ने झारखंड में माओवादी नेटवर्क को लेकर नई बहस छेड़ दी है. लगातार गिरफ्तारियों, सरेंडर और सुरक्षा अभियानों के बीच सवाल उठ रहा है कि क्या एक करोड़ के इनामी मिसिर बेसरा का वर्षों पुराना नेटवर्क अब धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगा है?

Ranchi: झारखंड के जंगलों में कभी एक नाम से सुरक्षा एजेंसियां अपनी रणनीति बदल देती थीं—मिसिर बेसरा. एक करोड़ रुपये का इनामी, CPI (माओवादी) के पोलित ब्यूरो का सदस्य और संगठन का ऐसा चेहरा, जिसके इशारे पर सारंडा, कोल्हान और झारखंड-ओडिशा सीमा के जंगलों में माओवादी नेटवर्क संचालित होता था. उसके नीचे कई बड़े कमांडर काम करते थे और उन्हीं में 25 लाख रुपये के इनामी अजय महतो का नाम सबसे प्रमुख माना जाता था. अजय महतो की गिरफ्तारी के बाद अब उसकी पत्नी बबीता के आत्मसमर्पण की खबरों ने पूरे घटनाक्रम को नई दिशा दे दी है. हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी बाकी है, लेकिन इस घटनाक्रम ने सुरक्षा एजेंसियों और राजनीतिक हलकों में एक नई बहस छेड़ दी है. सवाल सिर्फ अजय महतो या बबीता का नहीं, बल्कि यह है कि क्या वर्षों तक अभेद्य माना जाने वाला मिसिर बेसरा का नेटवर्क अब भीतर से टूटने लगा है.
मिसिर बेसरा पूरे नेटवर्क का सबसे बड़ा चेहरा
मिसिर बेसरा को लंबे समय से देश के सबसे प्रभावशाली माओवादी नेताओं में गिना जाता है. वह CPI (माओवादी) की सर्वोच्च निर्णय लेने वाली इकाई पोलित ब्यूरो का सदस्य है और उस पर एक करोड़ रुपये का इनाम घोषित है. सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती इलाकों में सक्रिय कई बड़े माओवादी दस्तों का संचालन वर्षों तक उसके प्रभाव में होता रहा. संगठन के लिए रणनीति बनाना, क्षेत्रीय कमांडरों के बीच समन्वय स्थापित करना और बड़े अभियानों की योजना तैयार करना उसकी भूमिका का हिस्सा माना जाता रहा है. यही वजह है कि आज भी सुरक्षा एजेंसियों के लिए मिसिर बेसरा सबसे बड़ी प्राथमिकता बना हुआ है.
अजय की गिरफ्तारी ने क्यों बढ़ा दी संगठन की मुश्किलें
अजय महतो केवल 25 लाख रुपये का इनामी माओवादी नहीं था. वह बिहार-झारखंड स्पेशल एरिया कमेटी का सदस्य था और संगठन के महत्वपूर्ण ऑपरेशनल चेहरों में शामिल माना जाता था. पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार उसके खिलाफ हत्या, सुरक्षा बलों पर हमले, आईईडी विस्फोट, लेवी वसूली और यूएपीए सहित करीब 240 मामले दर्ज हैं. दो दशक से अधिक समय तक सक्रिय रहने के कारण वह संगठन की जमीनी गतिविधियों से लेकर कैडर समन्वय तक कई जिम्मेदारियों से जुड़ा रहा. उसकी गिरफ्तारी को सुरक्षा एजेंसियां इसलिए भी महत्वपूर्ण मान रही हैं क्योंकि इससे माओवादी संगठन की एक मजबूत कड़ी कमजोर हुई है. अब बबीता को लेकर सामने आई खबरों ने इस पूरे घटनाक्रम को और अधिक चर्चा में ला दिया है.
बबीता की खबर ने क्यों बदल दिया पूरे घटनाक्रम का एंगल
अजय महतो की गिरफ्तारी के बाद अब उसकी पत्नी बबीता को लेकर भी खबरें सामने आ रही हैं. आधिकारिक पुष्टि का इंतजार है, लेकिन यदि यह जानकारी सही साबित होती है तो इसका असर केवल एक और सरेंडर तक सीमित नहीं रहेगा. माओवादी संगठनों में पारिवारिक और संगठनात्मक रिश्ते अक्सर एक-दूसरे से जुड़े होते हैं. ऐसे में किसी वरिष्ठ कमांडर के करीबी दायरे में लगातार बदलाव संगठन के मनोबल और आंतरिक भरोसे पर भी असर डालते हैं. यही वजह है कि सुरक्षा एजेंसियां इस घटनाक्रम को सामान्य घटना के बजाय व्यापक परिप्रेक्ष्य में देख रही हैं.
लगातार अभियानों ने कैसे बदली सारंडा और कोल्हान की तस्वीर
एक समय सारंडा और कोल्हान के घने जंगल माओवादी गतिविधियों का सबसे मजबूत गढ़ माने जाते थे. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में केंद्रीय सुरक्षा बलों और झारखंड पुलिस ने इन इलाकों में लगातार अभियान चलाए हैं. नए सुरक्षा कैंप, सड़क निर्माण, आधुनिक निगरानी तकनीक और स्थानीय खुफिया तंत्र के मजबूत होने से माओवादी गतिविधियों पर दबाव बढ़ा है. कई बड़े कमांडर गिरफ्तार हुए, कई मुठभेड़ों में मारे गए और कई ने आत्मसमर्पण का रास्ता चुना. इसका सीधा असर संगठन की सप्लाई लाइन, कैडर नेटवर्क और संचालन क्षमता पर पड़ा है.
अब भी खत्म नहीं हुई चुनौती, लेकिन बदल चुकी है तस्वीर
सुरक्षा एजेंसियों की सूची में अभी भी मिसिर बेसरा सहित कई बड़े इनामी नक्सली शामिल हैं और उनकी तलाश जारी है. इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि माओवादी संगठन पूरी तरह समाप्त हो गया है. लेकिन हाल के घटनाक्रम यह जरूर संकेत देते हैं कि संगठन पहले जैसी स्थिति में नहीं है. लगातार गिरफ्तारी, आत्मसमर्पण और सुरक्षा बलों के दबाव ने उसके नेटवर्क को चुनौती दी है. अजय महतो की गिरफ्तारी और बबीता को लेकर सामने आई खबरों ने इसी बदलते परिदृश्य को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है. आने वाले दिनों में पुलिस की आधिकारिक पुष्टि और आगे की कार्रवाई यह तय करेगी कि यह घटनाक्रम माओवादी संगठन के लिए कितना निर्णायक साबित होता है.

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