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Home»झारखंड»“आदिवासी हिंदू कतई नहीं हैं” : कांग्रेस मंच से डीलिस्टिंग पर बड़ा हमला, पूछा- किस जाति में रखेंगे?
झारखंड

“आदिवासी हिंदू कतई नहीं हैं” : कांग्रेस मंच से डीलिस्टिंग पर बड़ा हमला, पूछा- किस जाति में रखेंगे?

“24 मई को दिल्ली के लाल किला मैदान में प्रस्तावित ‘जनजाति सांस्कृतिक समागम’ से पहले झारखंड की राजनीति गर्म हो गई है. दर्जनों आदिवासी संगठनों ने कार्यक्रम के बहिष्कार की घोषणा की है, वहीं कांग्रेस भी खुलकर विरोध में उतर आई है. ”

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Satya MishraEditorial Desk
Published May 22, 2026 · 10:17 AM· 4 min read
“आदिवासी हिंदू कतई नहीं हैं” : कांग्रेस मंच से डीलिस्टिंग पर बड़ा हमला, पूछा- किस जाति में रखेंगे?

Ranchi: 24 मई को दिल्ली के लाल किला मैदान में प्रस्तावित ‘जनजाति सांस्कृतिक समागम’ से पहले झारखंड की राजनीति गर्म हो गई है. दर्जनों आदिवासी संगठनों ने कार्यक्रम के बहिष्कार की घोषणा की है, वहीं कांग्रेस भी खुलकर विरोध में उतर आई है. रांची में कांग्रेस नेताओं ने संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस कर समागम और ‘डीलिस्टिंग’ के मुद्दे पर कड़ा विरोध जताया. कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि धर्मांतरित आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति सूची से बाहर करने की मांग आदिवासी पहचान और अधिकारों पर हमला है. इस दौरान सरना धर्म कोड, आदिवासी अस्मिता और धार्मिक पहचान का मुद्दा भी जोरशोर से उठा. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या डीलिस्टिंग की बहस अब झारखंड की राजनीति में नया ध्रुवीकरण पैदा करेगी.

कांग्रेस ने ‘जनजाति सांस्कृतिक समागम’ पर उठाए सवाल

यह भी पढ़ें:चुटूपालू-ओरमांझी में अवैध स्टोन क्रशरों पर बड़ा एक्शन, 19 पर कार्रवाई; 8 सील, 11 ध्वस्त

रांची में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में कांग्रेस सांसद सुखदेव भगत ने ‘जनजाति सांस्कृतिक समागम’ को लेकर गंभीर आरोप लगाए. उन्होंने कहा कि यह कार्यक्रम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रायोजित है और आदिवासी पहचान, संस्कृति और अस्मिता को कमजोर करने की कोशिश का हिस्सा है. सुखदेव भगत के अनुसार, यह सिर्फ सांस्कृतिक आयोजन नहीं बल्कि आदिवासी समाज की मूल पहचान को प्रभावित करने की राजनीतिक पहल हो सकती है. कांग्रेस का दावा है कि आदिवासी समुदाय की धार्मिक और सामाजिक संरचना में हस्तक्षेप की कोशिश की जा रही है.

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सरना-सनातन एक नहीं- रामेश्वर उरांव

पूर्व मंत्री रामेश्वर उरांव ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि आदिवासियों को हिंदू बताने की कोशिश गलत है. उन्होंने सवाल उठाया कि यदि आदिवासियों को हिंदू माना जाएगा, तो उन्हें किस वर्ण व्यवस्था में रखा जाएगा. उन्होंने कहा कि हम हिंदू कतई नहीं हैं. सरना-सनातन एक नहीं है. साथ ही उन्होंने अलग सरना धर्म कोड की मांग दोहराई. रामेश्वर उरांव ने यह भी कहा कि धर्म परिवर्तन के आधार पर आदिवासियों का ST दर्जा खत्म करना संविधान की भावना के खिलाफ होगा. उनके बयान से साफ संकेत मिला कि कांग्रेस डीलिस्टिंग के मुद्दे को आदिवासी धार्मिक पहचान से जोड़कर देख रही है.

राजेश कच्छप बोले- डीलिस्टिंग आदिवासियों को कमजोर करने की कोशिश

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कांग्रेस विधायक दल के उपनेता राजेश कच्छप ने आरोप लगाया कि डीलिस्टिंग के जरिए आदिवासियों के अधिकारों को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है. उनका कहना था कि आदिवासी पहचान धर्म से नहीं बल्कि समुदाय और परंपरा से तय होती है. उन्होंने कहा कि अनुसूचित जनजाति का दर्जा खत्म करने की बहस आदिवासी समाज में असुरक्षा की भावना पैदा कर सकती है. इसी कारण कई आदिवासी संगठन भी ‘जनजाति सांस्कृतिक समागम’ का विरोध कर रहे हैं.

क्या है डीलिस्टिंग विवाद और क्यों बढ़ रही राजनीतिक बहस?

डीलिस्टिंग का मतलब है—धर्म परिवर्तन कर चुके आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति (ST) की सूची से बाहर करने की मांग. समर्थकों का तर्क है कि धर्म बदलने के बाद आरक्षण और जनजातीय लाभ जारी नहीं रहने चाहिए. वहीं विरोध करने वाले मानते हैं कि आदिवासी पहचान जन्म, संस्कृति और समुदाय से जुड़ी होती है, धर्म से नहीं.

झारखंड में यह मुद्दा इसलिए संवेदनशील है क्योंकि यहां लंबे समय से सरना कोड, आदिवासी पहचान और स्थानीय अधिकार की राजनीति प्रभावी रही है. ऐसे समय में जब राज्य में भाषा विवाद और पहचान आधारित बहस पहले से जारी है, डीलिस्टिंग का मुद्दा राजनीतिक ध्रुवीकरण को और बढ़ा सकता है. आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि ‘जनजाति सांस्कृतिक समागम’ और डीलिस्टिंग की बहस केवल सामाजिक विमर्श तक सीमित रहती है या झारखंड की राजनीति में बड़ा चुनावी मुद्दा बनती है.

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